आर्थिक सर्वेक्षण 2011-12: चुनौतियां भारी-समाधान का इंतजार

आर्थिक सर्वेक्षण 2011-12 में सरकार ने यह माना है कि गत वर्ष में कीमत स्थरता और आर्थिक संवृद्धि दो प्रमुख चुनौतियां रही हैं। सरकार दावा करती है कि इस वर्ष के अंत तक आते-आते खाद्य मुद्रा स्फीति को शून्य तक पहुंचाया जा सका है। अंतर्राष्ट्रीय उठक-पठक का हवाला देते हुए सरकार ने पिछले 9 वर्षों में (2008-09 के अपवाद को छोड़कर) 6.9 प्रतिशत की सबसे कम आर्थिक संवृद्धि अनुमानित होने पर भी लगभग संतोष जताया है। सरकार ने स्वीकार किया है कि आर्थिक सर्वेक्षण 2010-11 में 9 प्रतिशत आर्थिक संवृद्धि की अपेक्षा रखी थी। यदि ऐसा हो पाता तो अर्थव्यवस्था की काफी समस्याएं कम हो जाती। आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि यदि हम अर्थव्यवस्था के विविध क्षेत्रों को देखें तो कृषि और सहायक गतिविधियों में 2.5 प्रतिशत, सेवा क्षेत्र में 9.4 प्रतिशत, और उद्योगिक क्षेत्रों में 3.9 प्रतिशत की आर्थिक संवृद्धि प्राप्त करने का अनुमान है।

पिछला वर्ष देश और दुनिया के लिए एक कठिन वर्ष माना जा सकता है। एक ओर स्टैण्डर्ड और पुअर्स द्वारा अमेरिका की रेटिंग में लगातार दो बार कमी के बाद अमेरिकी मंदी ने फिर से सिर उठाना शुरू किया, तो दूसरी ओर पहले से ही संप्रभुता के हृास की समस्या झेलते हुए ग्रीस, पुतर्गाल, इटली सरीखे विभिन्न देशों में आर्थिक संकट और ज्यादा गहराने लगा। अमेरिकी सरकार को अपने पुराने ऋणों को चुकाने के लिए और ऋण लेने की जरूरत पड़ गई, और ओबामा प्रशासन को अमेरिकी संसद के सामने ऋण की सीमा बढ़ाने की गुहार लगानी पड़ी। सरकारी ऋणों के बोझ से दबे ग्रीस और पुतर्गाल के आर्थिक संकट के दबाव में उन्हें यूरोपीय समुदाय के अन्य देशों की शर्ताें के सामने नतमस्तक होना पड़ा। अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक जगत में इस उठा-पटक से भारत को मिलने वाला विदेशी निवेश, विशेषतौर पर विदेशी संस्थागत निवेश निश्चित रूप से प्रभावित हुआ है।

लगातार बढ़ती अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और कमजोर होते रूपये के कारण मुद्रा स्फीति की समस्या पहले से ज्यादा विकट हुई है। हाल ही के कुछ महीनों में कृषि के बेहतर नतीजों और फल सब्जियों के संतोषजनक उत्पादन के चलते खाद्य मुद्रा स्फीति थोड़ी थमी है, लेकिन देश में मुद्रा स्फीति अभी भी भयंकर स्थिति में है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में पिछले 21 महीनों में लगातार 13 बार वृद्धि करने के कारण जीडीपी की संवृद्धि दर कम हो रही है और पिछली तिमाही में तो ‘ग्रोथ’ के अनुमान घट कर मात्र 6.1 प्रतिशत ही रह गया है। उद्योग क्षेत्र की आर्थिक संवृद्धि में भारी कमी रिकार्ड की गई है और यह पिछली दो तिमाईयों में मात्र 0.4 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जो भारी चिंता का विषय है। बढ़ती ब्याज लागतों के कारण उद्योगों की लागत बढ़ रही है। पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती अंतर्राष्ट्रीय कीमतें उद्योगों की मुश्किलें और बढ़ा रही हैं।

हालांकि सरकार खाद्य मुद्रा स्फीति घटते का दंभ भर रही है, लेकिन कृषि विकास के धीमेपन के चलते खाद्य मुद्रा स्फीति फिर से सिर उठा सकती है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार कृषि का कुल जीडीपी में योगदान मात्र 13.9 प्रतिशत ही रह गया है। पिछले दो दशकों से सरकार कृषि से पूरी तरह विमुखत होती जा रही है। केंद्र सरकार के कुल बजट का मात्र 1 प्रतिशत ही कृषि पर खर्च हो रहा है। सरकार की इस अनदेखी के चलते कृषि विकास बाधित हो रहा है और कृषि उत्पादन में अप्रयाप्त वृद्धि, खाद्य पदार्थोें की कमी और बढ़ती खाद्य कीमतों को सबब बन रही है।

देश में आर्थिक संवृद्धि को बढ़ाने के लिए मांग बढ़ाने की जरूरत है। देश में मांग को बरकरार रखने के लिए महंगाई को बांधते हुए, देश में निवेश के वातावरण को पुष्ट करना होगा। देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी है। पिछले कुछ वर्षों से सड़क निर्माण काफी हद तक रूका हुआ है। देश में बिजली उत्पादन की नई क्षमताएं भी काफी कम निर्माण हो रही है। खेती के लिए सिंचाई परियोजनाओं की गति भी मंद है। नये भंडार गृह और कोल्ड स्टोरेज की भी देश में भारी कमी है। यह सत्य है कि सरकार के पास इन परियोजनाओं के लिए धनाभाव है, लेकिन उस कारण से इन परियोजनाओं को रोका नहीं जा सकता। जरूरी है कि सरकार निजी क्षेत्र के सहयोग से, टैक्सों में कमी ओर सब्सिडी के माध्यम से इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में सहयोगी बनें। इससे दो लाभ होंगे - एक इस माध्यम से देश में मांग बढ़ेगी और दूसरी ओर ढांचागत विकास से देश के विकास को गति मिलेगी।

डाॅ. अश्विनी महाजन
एसोसिएट प्रोफेसर, पीजीडीएवी कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
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