कम घातक नहीं है सिंगल ब्रांड में विदेशी निवेश

एकल (सिंगल) ब्रांड खुदरा में विदेशी निवेश की अनुमति सर्वप्रथम 51 प्रतिशत की सीमा तक फरवरी 2006 में प्रदान की गई। बहु (मल्टी) ब्रांड में विदेशी निवेश देश में व्यापक विरोध के कारण अभी भी प्रतिबंधित है। देश के खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का पहला अनुभव तभी आ गया था जब थोक व्यापार की आड़ में ‘कैश एण्ड कैरी’ थोक व्यापार में विदेशी निवेश को अनुमति दे दी गई थी। सैद्वांतिक रूप से तो इसे अनुमति दे दी गई थी, लेकिन पहले इस क्षेत्र में विदेशी निवेश सरकारी अनुमति के माध्यम से ही संभव था। लेकिन वर्ष 2006 से अब इसे स्वचालित मार्ग से कर दिया गया। नवंबर 2011 में केन्द्रीय केबिनेट ने सिंगल ब्रांड खुदरा में विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दिया और मल्टी ब्रांड में भी 51 प्रतिशत की सीमा तक विदेशी निवेश को अनुमति प्रदान करने का निर्णय ले लिया।

लगभग सभी गैर कांग्रेस राजनीतिक दलों, व्यापारी संगठनों, सामाजिक श्रम एवं किसान संगठनों के प्रबल विरोध के चलते सरकार को मल्टी ब्रांड में 51 प्रतिशत को दी जाने वाली अनुमति से तो अपने पैर पीछे खीचने पडे। लेकिन इसी शोरगुल में सिंगल ब्रांड में विदेशी निवेश के मुद्दे पर देश में बहस सही दिशा में नही चलाई जा सकी। इसलिए देश के विभिन्न क्षेत्रों पर सिंगल ब्रांड में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश के कारण पड़ने वाले दुष्प्रभावों की सही संदर्भों में चर्चा हो ही नहीं पाई। इस शोरगुल का लाभ उठाते हुए सरकार ने जल्दबाजी में सिंगल ब्रांड में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश के निर्णय का राजपत्रित आदेश जारी कर दिया।

सिंगल ब्रांड में विदेशी निवेश का मतलब
पहले तो सिंगल ब्रांड में 100 प्र्रतिशत विदेशी निवेश का अभिप्राय समझना होगा। सिंगल ब्रांड में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश का मतलब है कि एक ब्रांड वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने ब्रांड के नाम से 100 प्रतिशत स्वामित्व वाले स्टोर खोलने की अनुमति। सिंगल ब्रांड स्टोर में कंपनी अपने एक ब्रांड की तमाम वस्तुएं बेच सकती हैं। ये वस्तुएं इन कंपनियों द्वारा स्वयंनिर्मित हो सकती हैं, अथवा उनके लेबल वाली किसी अन्य उत्पादक द्वारा निर्मित वस्तु। इसके अतिरिक्त वे एक ब्रांड की अपनी सेवाओं की भी बिक्री कर सकती हैं। खाद्य उत्पादों के क्षेत्र में पिज़ा, हट, मैक्डाॅनल, के.वी.सी. कुछ उदाहरण हैं। फिलिप्स, सैमसंग, सी.डी., एल.जी., नोकिया इत्यादि प्रमुख ब्रांड हैं। वाॅक्सवैगन, निरचन, टोयटा, बी.एम.डब्ल्यू कुछ प्रमुख आटोमोबाईल ब्रांड हैं।

बहुराष्ट्रीय खाद्य श्रंखलाओं के आने के दुष्परिणाम
खाद्य क्षेत्र में पिजा हट, के.एफ.सी., मैक्डाॅनल इत्यादि श्रंखलाओं के 100 प्रतिशत स्वामित्व वाले रेस्टोरेंट खुलने के आम तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था पर और विशेष तौर पर इस क्षेत्र में संलग्न उद्यमियों पर भारी दुष्परिणामों की आशंका है। यदि हम दुनिया के अन्य देशों के अनुभव देखें तो पता चलता है कि इन श्रंखलाओं के आने के बाद इंग्लैंड मे ंचलने वाले छोटे रेस्टोरेंट और बिक्री केंद्र काफी मात्रा में बंद हो गये, जिसके कारण जो लोग वहां अपना छोटा-मोटा व्यवसाय खाने-पीने की दुकान के रूप में चलाते थे, बेरोजगार हो गये। सर्वविदित ही है, इंग्लैंड में बसे भारतीय इस प्रकार के काम हाथों में ज्यादा संलग्न थे। कोई कारण नहीं कि यह अनुभव भारत में दोहराया न जाये। हम जानते हैं लाखों लोग खाने पीने की दुकानों खाद्य वस्तुओं की दुकानों जैसे ढाबों, चाईनीज और दक्षिण भारतीय व्यंजनों की दुकानों/ठेली और इसके अतिरिक्त आलू टिक्की, चाट पापड़ी के खोमच्चों में रोजगार पा रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इस क्षेत्र में आने से ये सभी रोजगार गायब हो सकते हैं।

हाल ही में वर्ष 2006 को बनाये गये फूड सेफ्टी एण्ड स्टैंडर्ड एक्ट के संदर्भ में फूड सेफ्टी एण्ड स्टैंडर्ड नियमावली 2011 का संदर्भ भी साथ लें, तो इस क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का संभावित दुष्प्रभाव ज्यादा समझ में आता है। नियमावली में खाने पीने का सामान बिक्री करने वालों पर काफी कडे नियम लागू किये गये हैं। जिनको छोटे विक्रेता निभा नहीं सकता। ये नियम सफाई से लेकर खाद्य मानकों तक है। किसी बड़ी कंपनी के लिए इन मानकों के अनुसार काम करना संभव हो सकता है, लेकिन छोटे विक्रेताओं के लिए ऐसा संभव नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि एक निश्चित रणनीति के तहत ऐसे कानून ऐसे समय में बनाये गये हैं, जब विदेशी कंपनियों को भी इस क्षेत्र में आमंत्रित किया जा रहा है। ऐसे में इन छोटी खाने पीने की दुकानों पर यह आरोप मड़ा जायेगा कि चूंकि वे मानकों पर पूरे नहीं उतरते हैं इसलिए उनका बंद होना ही ठीक है। इस प्रकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुला बाजार उपलब्ध हो जायेगा।

इलैक्ट्राॅनिक्स और टेलीकाॅम पर गिरेगी और गाज
सिंगल ब्रांड में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश के पूर्व में सरकार के निर्णय के कारण उनके ब्रांडों के स्टोरों के खुलने के कारण हमारे टेलीकाॅम और इलैक्ट्राॅनिक्स उद्योग का पहले की खासा नुकसान हो चुका है। यह दुर्भाग्य का विषय है कि हमारा देश जो आज अंतरिक्ष विज्ञान, और प्रौद्योगिकी, आई.टी. और साॅफ्टवेयर, मिसाईल प्रौद्योगिकी में दुनिया का सिरमौर देश बन चुका है, इस क्षेत्र में उत्पादों में अपने अच्छे ब्रांडों को स्थापित नहीं कर पाया है। विदेशों से टेलीकाॅम उपकरणों, इलैक्ट्राॅनिक्स के साजों समान भारी आयात की निर्भरता के चलते, इस वस्तुओं के आयात कई गुणा बढ़ चुके हैं। आज विदेशों से सस्ते चीनी माल की बाढ़ को हम रोक नहीं पा रहे हैं। इसका कारण यह है कि इस क्षेत्र में हम अपने ब्रांड विकसित नहीं कर पाये। हमारे देश में आज मोबाईल कनैक्शन 50 करोड़ से अधिक हैं लेकिन आज भी हमारे बाजारों में भारतीय ब्रांडों की विशेष उपस्थिति नहीं हैं, घरेलू इलैक्ट्राॅनिक्स और अन्य साजों समान विदेशी ब्रांडों ने भारतीय बाजारों पर पहले से कब्जा किया हुआ है। सुरक्षा खतरों के बावजूद भी भारत चीन से टेलीकाॅम उपकरणों के आयातों पर रोक लगाने की हिम्मत नहीं दिखा पा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कुछ किया नहीं गया तो टेलीकाॅम उपकरणों के आयात कहीं तेल के आयातों के बिल को भी पार न कर जायें।

पहले से ही विदेशी प्रतिस्पद्र्धा की मार झेल रहे टेलीकाॅम और इलैक्ट्राॅनिक्स उद्योग के लिए सिंगल ब्रांड में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश और घातक हो सकता है।

वस्त्र/परिधान उद्योग के लिए मडराते खतरें
लागत कुषलता के आधार पर भारतीय वस्त्र उद्योग ने अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में पिछले कुछ समय से अपनी जबरदस्त पकड़ बनायी हुई है और बड़ी मात्रा में भारत से वस्त्रों का निर्यात विदेषों में किया जाता है। सरकार के इस निर्णय से यह प्रवृत्ति बदल जायेगी और भारत में विदेषी ब्रांडों के वस्त्रों एवं परिधानों का आयात शुरू हो जायेगा। 100 प्रतिषत विदेषी निवेष वाले विदेषी ब्रांडों जैसे रिबोक, नाईक, एडीदास इत्यादि के पूर्ण स्वामित्व वाले स्टोर खुलने से विदेषों से भारत में वस्त्र आयात शुरू हो जायेगा। अभी तक भारत में अधिकतर भारतीय परिधानों के ब्रांड ही बिकते है। विदेषी कंपनियों द्वारा अपनी दुकानें खोलने से भारत के ब्रांड अपने बाजार खो सकते है क्योंकि विदेषी स्टोर भारत के ब्रांड बेचने वाले नहीं हैं।

अंतर्राष्ट्रीय आॅटोमोबाईल ब्रांड करेगें भारतीय ब्रांडों के विकास को अवरूद्ध
आॅटोमोबाईल क्षेत्र भारत की आर्थिक समृद्धि, विषेष तौर पर औद्योगिक समृद्धि का वाहक रहा है। टाटा मोटर्स, महेंद्रा एण्ड महेंद्रा, मारूति, बजाज, हीरो-होण्डा इत्यादि भारत के प्रमुख आॅटोमोबाईल ब्रांड है। भारत के इन ब्रांडों ने लागत कुषलता के आधार पर न केवल भारत में अपना स्थान बनाया है, बल्कि बड़ी मात्रा में भारत से कारों, दुपहिया स्कुटरों और अन्य वाहनों का कई विकासषील देषों और यहां तक की विकसित देषों में भी भारी निर्यात होता है। भारत में अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों के लिए स्टोर खोलने की अनुमति से भारत में ही भारत के ब्रांडों को विदेषी ब्रांडों से भारी प्रतिस्पद्र्धा करनी पड़ेगी। जिसका असर भारत के आॅटोमोबाईल क्षेत्र के विकास पर पड़ सकता है।

भ्रामक है लघु उद्योगों से 30 प्रतिषत अनिवार्य खरीद की शर्त
सरकार एकल और बहु ब्रांड खुदरा व्यापार के फायदों को गिनाने का काम लगातार कर रही है, लेकिन इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से देष में आयातों की बाड़ के विषय पर सरकार मौन दिखाई देती है। सरकार द्वारा एक भ्रामक प्रचार किया जा रहा है कि विदेषी कंपनियों को अनिवार्य रूप से लघु और कुटीर उद्योगों से न्यूनतम 30 प्रतिषत खरीद करनी होगी लेकिन अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य विषेषज्ञ यह बात मानने के लिए तैयार नहीं। उनका कहना है कि सरकार का यह निर्णय विष्व व्यापार संगठन के स्तर पर मान्य नहीं होगा, क्योंकि भारत सरकार ने विष्व व्यापार संगठन में एक बाध्यकारी समझौता किया हुआ है जिसके अनुसार सरकार देषी और विदेषी स्रोतों के बीच कोई भेद-भाव नहीं कर सकती। एक बार बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में आने की अनुमति मिलने के बाद यदि विष्व व्यापार संगठन से इस प्रकार का निर्देष आता है तो भारत के पास अपने लघु उद्योगों को बचाने को कोई रास्ता नहीं बचेगा। फेडरेषन आॅफ इंडियन माईक्रो, स्माल एण्ड मिडियम इंटरप्राईसिस द्वारा व्यक्त की हुई आषंकाएं सत्य सिद्ध हो जायेंगी कि खुदरा क्षेत्र में विदेषी निवेष आने से भारत के लघु उद्योगों को भारी नुकसान होगा। इस प्रकार भारत सरकार का यह तर्क कि सिंगल ब्रांड में विदेषी निवेष आने से देष में रोजगार के अवसर बढ़ेगें, सही नहीं है।