बजट 2012-13: चुनौतियाँ भारी - समाधान का अभाव

15 मार्च 2012 को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2011-2012 में देश की आर्थिक समस्याओं के लिए अन्तर्राष्ट्रीय कारणोंको जिम्मेदार ठहराने की बात को आगे बढ़ाते हुए अपने बजट भाषण में भी वित्तमंत्री ने देश में घटती आर्थिक संवृद्धि दर के लिए अन्तर्राष्ट्रीय उठापठक का ही हवाला दिया है। सरकार ने पिछले 9 वर्षों में (2008-09 के अपवाद को छोड़कर) 6.9 प्रतिशत की सबसे कम आर्थिक संवृद्धि अनुमानित होने पर भी लगभग संतोष जताया है। सरकार ने स्वीकार किया है कि आर्थिक सर्वेक्षण 2010-11 में 9 प्रतिशत आर्थिक संवृद्धि की अपेक्षा रखी थी। यदि ऐसा हो पाता तो अर्थव्यवस्था की काफी समस्याएं कम हो जाती। आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि यदि हम अर्थव्यवस्था के विविध क्षेत्रों को देखें तो कृषि और सहायक गतिविधियों में 2.5 प्रतिशत, सेवा क्षेत्र में 9.4 प्रतिशत, और औद्योगिक क्षेत्रों में 3.9 प्रतिशत की आर्थिक संवृद्धि प्राप्त करने का अनुमान है।

पिछला वर्ष देश और दुनिया के लिए एक कठिन वर्ष माना जा सकता है। एक ओर स्टैण्डर्ड और पुअर्स द्वारा अमेरिका की रेटिंग में लगातार दो बार कमी के बाद अमेरिकी मंदी ने फिर से सिर उठाना शुरू किया, तो दूसरी ओर पहले से ही संप्रभुता के हृास की समस्या झेलते हुए ग्रीस, पुतर्गाल, इटली सरीखे विभिन्न देशों में आर्थिक संकट और ज्यादा गहराने लगा। अमेरिकी सरकार को अपने पुराने ऋणों को चुकाने के लिए और ऋण लेने की जरूरत पड़ गई, और ओबामा प्रशासन को अमेरिकी संसद के सामने ऋण की सीमा बढ़ाने की गुहार लगानी पड़ी। सरकारी ऋणों के बोझ से दबे ग्रीस और पुतर्गाल के आर्थिक संकट के दबाव में उन्हें यूरोपीय समुदाय के अन्य देशों की शर्ताें के सामने नतमस्तक होना पड़ा। तेल उत्पादक देखें में राजनैतिक अस्थिरता के चलते बढ़ती तेल कीमतें वे भी भारत समेत पुरी दुनिया को प्रभावित किया है। अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक जगत में इस उठा-पटक से भारत को मिलने वाला विदेशी निवेश, विशेषतौर पर विदेशी संस्थागत निवेश निश्चित रूप से प्रभावित हुआ है।

लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय कारणों से कही ज्यादा अर्थव्यवस्था का कुप्रंबधन देश की समस्याओं के लिये जिम्मेदार है। बजट में बताया गया है कि वर्ष 2011-2012 में राजकोषीय घाटा जी.डी.पी. का 5.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। गौरतलब है कि 2011-2012 का बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री ने कहा था कि राजकोषीय घाटा 4.6 प्रतिशत रहेगा। यानि जो राजकोषीय घाटा 4.13 लाख करोड़ रूपये अनुमानित किया गया था वह बढ़कर अब 5.22 लाख करोड़ रूपये पहुँच गया है। बढ़ता हुआ राजकोषीय घाटा देश में मुद्रास्फीति के बढ़ने का मुख्य कारण बन रहा है। एक तरफ राजकोषीय घाटा पिछले वर्ष के अनुमान से कहीं आगे बढ़ गया है,जी.डी.पी. की अनुमानित वृद्धि दर भी 9 प्रतिशत घटकर मात्र 6.9 प्रतिशत ही रह गई है। अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों में संवृद्धि दर प्रभावित हुई है लेकिन सबसे ज्यादा असर औद्योगिक उत्पादन पर पड़ा है जहाँ पिछली दो तिमाहियों में संवृद्धि दर घटकर मात्र 0.4 प्रतिशत ही रह गई है।

बढ़ते हुए राजकोषीय घाटे और बढ़ती मंहगाई के लिये जिम्मेदार अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन के बारे में वित्तमंत्री चुप हैं। वास्तव में राजकोषीय घाटा बढ़ने से जब उसकी भरपाई अतिरिक्त मुद्रा छापकर की जाती है तो उसका असर कीमतों पर पड़ता है। बढ़ती मंहगाई के कारण देश विकास बाधित होता है। हम जानते है कि पिछले कुछ वर्षों से बढ़ती मंहगाई से घबराकर भारतीय रिजर्व बँक लगातार व्याज दरों में वृद्धि कर रहा है। बढ़ती व्याज दरों के कारण देश में उत्पादन लागत बढ़ती है और औद्योगिक उत्पादन बाधित होता है। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ती तेल कीमतें उद्योगों की समस्या और अधिक बढ़ा रही हैं। पहले से ही मुद्रास्फीति की मार झेल रहे उद्योगों और उपभोक्ताओं पर वित्तमंत्री करों का भारी बोज लाद दिया है। सेवा कर को बढ़ाकर 12 प्रतिशत और वस्तुओं पर करों में भारी वृद्धि करते हुए वित्तमंत्री ने मुद्रास्फीति के समस्या को और बढ़ा दिया है।

बजट में वित्तमंत्री मांग को बढ़ाकर आर्थिक संवृद्धि बढ़ाने की बात करते है। इसमें कोई दो राय नही है कि देश में मांग को बढ़ाने भारी जरूरत है। देश में मांग बढ़ाने के लिए उपभोक्ता मांग और निवेश मांग दोनों को बढ़ाना होगा। लेकिन दोनों प्रकार की मांग को बढ़ाने के लिए जरूरी है कि ब्याज दरों को कम किया जाय। आज बढ़ती ब्याज दरें मध्यम वर्ग के लिए मुसीबत का कारण बनी हुई है। एक ओर तो पहले से लिए गये ऋणों पर इ.एम.आई. तो बढ़ ही रही है, नये ऋणों पर पहले से कही ज्यादा इ.एम.आई देनी पड़ रही है। ऐसे मे घरों और उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ाने में कठिनाई आ रही है। उधर निवेश मांग भी घट रही है क्योंकि अब निवेश करना पहले जैसा सस्ता नहीं है। इसलिए बजट में चाहे मांग आधारित विकास की बात तो कही गई है लेकिन धरातल पर परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं है।

देश में मांग को बरकरार रखने के लिए महंगाई को बांधते हुए, देश में निवेश के वातावरण को पुष्ट करना होगा। देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी है। पिछले कुछ वर्षों से सड़क निर्माण काफी हद तक रूका हुआ है। देश में बिजली उत्पादन की नई क्षमताएं भी काफी कम निर्माण हो रही है। खेती के लिए सिंचाई परियोजनाओं की गति भी मंद है। नये भंडार गृह और कोल्ड स्टोरेज की भी देश में भारी कमी है। बजट 2012-2013 में ढाँचागत विकास के लिये करों कुछ छुट अवश्य दी गई है लेकिन वह अपर्याप्त दीखाई देती है। यह सत्य है कि सरकार के पास इन परियोजनाओं के लिए धनाभाव है, लेकिन उस कारण से इन परियोजनाओं को रोका नहीं जा सकता। जरूरी है कि सरकार निजी क्षेत्र के सहयोग से, टैक्सों में कमी ओर सब्सिडी के माध्यम से इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में सहयोगी बनें। इससे दो लाभ होंगे - एक इस माध्यम से देश में मांग बढ़ेगी और दूसरी ओर ढांचागत विकास से देश के विकास को गति मिलेगी।

हालांकि सरकार खाद्य मुद्रा स्फीति घटाने का दंभ भर रही है, लेकिन कृषि विकास के धीमेपन के चलते खाद्य मुद्रा स्फीति फिर से सिर उठा सकती है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार कृषि का कुल जीडीपी में योगदान मात्र 13.9 प्रतिशत ही रह गया है। पिछले दो दशकों से सरकार कृषि से पूरी तरह विमुख होती जा रही है। केंद्र सरकार के कुल बजट का मात्र 1 प्रतिशत ही कृषि पर खर्च हो रहा है। सरकार की इस अनदेखी के चलते कृषि विकास बाधित हो रहा है और कृषि उत्पादन में अपर्याप्त वृद्धि, खाद्य पदार्थोें की कमी और बढ़ती खाद्य कीमतों को सबब बन रही है।

सामाजिक सेवाओं पर सरकारी खर्च बढ़ाने की जरूरत है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, नारी एवं बालविकास इत्यादि पर खर्च नहीं बढ़ रहा है। हर बजट में सामाजिक क्षेत्र पर खर्च बढ़ाने के लिए बड़ी-बड़ी बातें की जाती है, लेकिन उस सबके बावजूद सामाजिक सेवाओं पर खर्च 9 प्रतिशत के आसपास बना हुआ है। जबतक शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान नही दिया जायेगा तबतक देश के मानव संसाधनों का विकास संभव नहीं। सन्तोष का विषय है कि इस बजट में कुपोषण की समाप्ति के लिए कुछ कदम उठाने की बात की गई है।

डॉ. अश्विनी महाजन
एसोसिएट प्रोफेसर, पीजीडीएवी कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
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