विकास के लिए शुभ नहीं है रेल बजट 2012-13

रेल मंत्री के रूप में पहली बार अपना बजट पेश करते हुए दिनेश त्रिवेदी ने स्वयं ही स्वीकार किया है कि भारतीय रेलवे अत्यंत कठिनाई के दौर से गुजर रही है। इस कठिनाई की भूमिका यह है कि पिछले 8 बजटों में रेल के यात्री किराये और भाड़ों में कोई वृद्धि नहीं की गई। स्वयं रेलवे की परिचालन लागत भी इस दौरान काफी बढ़ी है। 5 वर्ष पूर्व 2007-08 में रेलवे की परिचालन लागत मात्र 41,033 करोड़ रूपये थी, जो 2011-12 के बजट अनुमानों के अनुसार 73,650 करोड़ रूपये तक पहंुच गई। इस कालखंड में मात्र पेंशन पर ही खर्च लगभग 8 हजार करोड़ से बढ़कर 16 हजार करोड़ तक पहुंच गया है।

गौरतलब है कि पिछले एक दशक में जीवन लागत दुगनी से भी अधिक हो चुकी है, लेकिन रेलवे मंत्रियों ने माल भाड़े और यात्री किराए में अनुपातिक रूप से वृद्धि न करने की ठान रखी थी और स्वयं की इस संबंध में प्रशंसा भी करते थे। रेलवे के स्वास्थ्य का एक संकेत परिचालन अनुपात होता है। परिचालन अनुपात से हमारा अभिप्राय है कि रेलवे को 100 रूपया कमाने के लिए कितना व्यय करना पड़ता है। 2008-09 में यह अनुपात 90.5 था जो बढ़कर 2009-10 में 94.7 हो गया। वर्ष 2010-11 की पहली छःमाही में यह बढ़कर 125 तक पहुंच गया था। परिचालन अनुपात का बढ़ना चिंता का प्रमुख कारण है। क्योंकि ईंधन लागत, वेतन लागत (विशेषतौर पर छठे वेतन आयोग के कारण) और अन्य प्रकार की लागतों में लगातार वृद्धि हो रही है। अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को भी पूरा न कर सकने की स्थिति में रेलवे की आधुनिकीकरण की तमाम योजनाएं कागजों तक सिमट कर रह गयी हैं। मात्र दिल्ली डिवीजन के ही रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण की 240 करोड़ रूपये की योजना पर धन की कमी के कारण अमल नहीं हो पा रहा है। देश में लगभग 7000 रेलवें स्टेशनों की हालत में सुधार की भारी आवश्यकता है। हालांकि पिछले एक वर्ष में माल भाडे में की गई वृद्धि के चलते परिचालन अनुपात पुनः 95 तक पहुंच चुका है, लेकिन फिर भी उसमें सुधार की भारी जरूरत है। बजट में यद्यपि रेल मंत्री ने इस वर्ष के अंत तक परिचालन अनुपात को घटाकर 84.5 और 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक 74 फीसदी तक लाना का अनुमान बताया है। इसका मतलब यह हैै कि अभी तक रेलवे को 100 रूपये कमाने के लिए 95 रूपये खर्च करने होते है जिसे घटाकर 74 रूपये तक लाने का अनुमान बताया गया है।

प्रशंसा का विषय है कि रेलवे को कंगाली जैसी स्थिति से बाहर लाने के लिए यात्री किरायों में कुछ वृद्धि करना तय किया गया है। हालांकि यह वृद्धि 2 पैसे प्रति किलोमीटर से लेकर 30 पैसे प्रति किलोमीटर तक की सीमित है, फिर भी यात्री किराये और माल भाडे से कुल आमदनी पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान 104927 करोड़ रूपये से 28625 करोड़ रूपये बढ़कर 133552 करोड़ रूपये हो जायेगी। इससे लगभग कंगाली की स्थिति से रेलवे कुछ बाहर आ पायेगी। इस कंगाली के चलते हाल ही में रेल मंत्रालय द्वारा केन्द्र सरकार से रेलवे के लिए 2100 करोड़ रूपये की ऋण राशि की मांग की गई थी। पिछले लगभग एक दशक से भी अधिक समय से रेलवे भरपूर आमदनी करता रहा है और साथ ही साथ केन्द्र सरकार को भी खासी रकम लाभांश के रूप में देता रहा है। माना जा रहा है कि वित्तीय संकट के चलते रेलवे अपनी चालू परियोजनाओं को पूरा नहीं कर पा रहा है। हालांकि भारतीय रेल किसी भी अन्य प्रकार के परिवहन से कहीं सस्ता साधन है, फिर भी भारतीय रेलवे कभी किसी भारी घाटे में नहीं रही। पिछले लगभग एक दशक से भी अधिक समय से भारतीय रेलवे एक लाभकारी उपक्रम के नाते उभरी है और इससे सरकारी राजस्व को भी भारी लाभ हुआ। लेकिन वर्ष 2010-11 में रेलवे की वित्तीय व्यवस्था काफी खराब हो गई और रेलवे का घाटा असहनीय हो गया। वर्ष 2007-2008 में रेलवे के पास 19,000 करोड़ रूपये के नकद अधिकोष था, जिसका बहुत बड़ा हिस्सा मई 2010 तक समाप्त हो गया और रेलवे के पास मात्र 5,000 करोड़ का ही अधिकोष बचा। अप्रैल से दिसम्बर 2010 के दौरान रेलवे के वित्तीय परिणाम उत्साहजनक नहीं थे और यह माना जाता है कि वर्ष 2010-11 का राजस्व लक्ष्य भी प्राप्त नहीं हो सका। इससे विदित है कि रेलवे का वित्तीय स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं है और सितम्बर माह आते-आते नकद अधिकोष मात्र 75 लाख रूपये रह चुके थे, जिसके चलते वित्त मंत्रालय से 2100 करोड़ रूपये के ऋण की मांग की गई। इसके अतिरिक्त रेलवे वित्त निगम लिमिटेड द्वारा 10000 करोड़ रूपये के बांड भी जारी करने की घोषणा भी 2011-12 के रेल बजट में की गई थी।

अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जहां देश में सड़कों की लम्बाई आजादी के बाद 4 लाख किलोमीटर से ग्यारह गुणा बढ़कर 44 लाख किलोमीटर पहुंच गयी, रेलवे लाइनों का विस्तार 54000 किलोमीटर से बढ़कर मात्र 20 प्रतिशत से भी कम बढ़कर 64000 किलोमीटर तक ही पहुंच सका। यही नहीं कि भारतीय रेल 230 लाख यात्रियों को रोज ले जाती है और हर वर्ष 2650 लाख टन वस्तुएं इसके द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जायी जाती हैं, भारतीय रेल परिवहन क्षेत्र में लागतों को कम करने के लिए बहुत जरूरी साधन है। रेलवे का माल भाड़ा सड़क के माल भाड़े से मात्र एक तिहाई ही है। लंबी दूरी की यात्रा में तो रेलवे का कोई विकल्प ही नही है, कम दूरी की यात्रा में भी रेलवे के किराए बस की यात्रा किराए से आधे ही रहते हैं। इस प्रकार रेलवे का विकास देश के परिवहन के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है।

देश में सस्ता परिवहन उपलब्ध कराने के संबंध में रेलवे का कोई सानी नहीं है। रेलमंत्री के अनुसार रेलवे के आधुनिकीकरण के लिए 5.6 लाख करोड़ रूपये की जरूरत है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में रेलवे के विकास के लिए 7.35 लाख करोड़ रूपये का निवेश किया जाना है। रेल बजट में 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 2.5 लाख करोड़ रूपये की बजटीय सहायता की उम्मीद रखी गई है। आम बजट में सरकार पर पहले से ही खर्च घटाने का दबाव है इसलिए रेलवे के विकास के लिए भी आम बजट पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।

सरकार का लोकलुभावन दृष्टिकोण रेलवे के विकास के रास्ते में आ रहा है। हालांकि किराये भाड़े में वृद्धि न करने की जिद तो टूटी है लेकिन अभी भी लागत वृद्धि के अनुपात में किराये नहीं बढ़ाये गये हैं। आम जन के लिए रेलवे की सुविधाओं में सुधार और रेलवे के विस्तार के लिए किराए की संरचना का युक्तिकरण नितांत आवश्यक है।

डाॅ. अश्विनी महाजन
एसोसिएट प्रोफेसर, पीजीडीएवी कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
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