सरकारी असमंजस का आर्थिक सर्वेक्षण 2012-13

बजट 2013-14 का आगाज देता हुआ आर्थिक सर्वेक्षण 2012-13 संसद में पेश हो चुका है। पहले अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और उसके बाद सरकार के अपने केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने 2012-13 की प्रत्याषित ग्रोथ रेट को घटाकर 5 प्रतिषत कर दिया तो सरकार के पास आर्थिक सर्वेक्षण में कोई अन्य आंकड़ा देना संभव नहीं था। लेकिन साथ ही सरकार ने ग्रोथ रेट मंद होने को एक खतरे की घंटी जरूर बताया। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से औद्योगिक उत्पादन की ग्रोथ लगभग शून्य चल रही है। पिछले आर्थिक सर्वेक्षण ने 2012-13 के लिए 7.6 प्रतिषत ग्रोथ की अपेक्षा बताई थी। इसका मतलब यह है कि सरकार के अनुमान पूर्णतया गलत सिद्ध हो चुके हैं। हालांकि 2013-14 के लिए आर्थिक सर्वेक्षण में 6.1 प्रतिषत से 6.7 प्रतिषत ग्रोथ की बात कही गई है, लेकिन इसकी प्रमाणिकता तो समय ही बता पायेगा। हमारी युवा जनसंख्या का लाभ देष को मिल सके और उनके लिए रोजगार के नए अवसर जुटाए जा सकें, इसके लिए आर्थिक सर्वेक्षण में एक अलग अध्याय जोड़ना, सुखद अनुभूति देता है। लेकिन हमें समझना होगा कि इसके लिए सरकार को वर्तमान विकास माॅडल को बदलकर रोजगारमुखी बनाना होगा। मार्च 2013 तक मुद्रास्फीति की दर घटकर 6.2 से 6.6 फीसदी तक होने की उम्मदी जताई गई है।

आंकड़ों की रस्मअदायगी के साथ ही साथ आर्थिक सर्वेक्षण से यह अपेक्षा रहती है कि वह बताए कि अगले साल के लिए सरकार की आर्थिक नीतियों का रोडमैप कैसा होगा? बीतते साल 2012-13 में सरकार ने कुछ अंधाधुंध आर्थिक फैसले लिए। पेट्रोलियम पदार्थों की सब्सिड़ी पर कुल्हाड़ी सरीखा आघात करते हुए डीजल की कीमतें बढ़ाई गई, सब्सिड़ी युक्त रसौई गैस की उपलब्धता घटाई गई, खुदरा में विदेषी निवेष को अनुमति और इंष्योरेंष और पेंषन फंडों में विदेषी निवेष के रास्ते चैड़ा करने जैसे कुछ महत्वपूर्ण फैसले आर्थिक सुधारों के नाम पर किए गए। आर्थिक सर्वेक्षण 2012-13 उन फैसलों को ओर आगे बढ़ाने और डीजल की कीमतों में वृद्धि करने का आगाज भी दे रहा है।

देष इस समय दो प्रकार के महत्वपूर्ण घाटों का दंष झेल रहा है। एक है राजकोषीय घाटा, और दूसरा है विदेषी भुगतान शेष का घाटा। पिछले साल तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने अपने बजट प्रस्तावों के माध्यम से आमदनी बढ़ाकर और खर्चें घटाकर राजकोषीय घाटे को 5.3 प्रतिषत तक लाने की बात कही थी। गौरतलब है कि 2011-12 में यह घाटा 6 प्रतिषत के लगभग पहुंच गया था। बीतते साल 2012-13 में विदेषी निवेषकों पर नकेल कसकर कर वसूलने की राजनीतिक इच्छाषक्ति का पूर्णतया अभाव रहा, 2जी. स्पेक्ट्रम नीलामी से भी कुछ खास हासिल नहीं हो पाया और सारा दारोमदार सब्सिड़ी घटाने पर ही रहा। आने वाले साल 2013-14 में भी ऐसा लगता है कि सब्सिड़ी पर कुल्हाड़ी ओर तेजी से चलेगी।
पिछले लगभग 3 वर्षों में महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है और आम आदमी का जीना दूभर हो रहा है। दो अंको में जा रही महंगाई की दर के चलते सरकार लगभग बदहवासी की स्थिति में है। उसपर घटती ग्रोथ के कारण अर्थव्यवस्था पर काले बादल मंडरा रहे हैं। जैसा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण और आर्थिक सर्वेक्षण से यह स्पष्ट हो रहा है कि सरकार इन तमाम मुश्किलों के लिए वैश्विक मंदी को दोषी ठहरा रही है। यह सही है कि देश में तेल की बढ़ती कीमतें अंतराष्ट्रीय कारणों से हैं, लेकिन देश की तमाम समस्याओं के लिए वैश्विक मंदी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सरकार का अर्थव्यवस्था का कुप्रबंधन भी काफी हद तक इसके लिए जिम्मेदार है। गौरतलब है कि वर्ष 2008 में आई वैश्विक मंदी से भारतीय अर्थव्यवस्था इस कदर प्रभावित नहीं हुई थी। उस समय सरकार ने इस बाबत अपनी पीठ भी थपथपाई थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था और विशेषतौर पर भारतीय बैंकिंग एवं वित्तीय व्यवस्था दुनिया से अलग है। ऐसे में अमरीकी और यूरोपीय बैंकों के धराशायी होने और मंदी का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर अत्यंत न्यूनतम रहा और भारत की विकास दर 6.7 प्रतिशत से भी अधिक रही। इसलिए हर समस्या को वैश्विक मंदी के साथ जोड़कर देखना सही नहीं है।

देश इस समय जिस एक अन्य भयंकर समस्या से गुजर रहा है, और वो है भुगतान शेष में भारी घाटे की समस्या। पिछले वर्ष 2011-12 में भुगतान शेष का घाटा 78 अरब डालर रहा, जो जीडीपी का 4.4 प्रतिशत था। 2012-13 की दूसरी और तीसरी तिमाही में यह घाटा जीडीपी के क्रमशः 5.4 प्रतिशत और 6.0 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। ऐसा लगता है कि भुगतान शेष का घाटा 100 अरब डालर को पार कर जाएगा। गौरतलब है कि 1990-91 में जब भारत की अर्थव्यवस्था एक गंभीर भुगतान संकट से गुजर रही थी, तब भी यह घाटा मात्र 10 अरब डालर से कम का था, जो उस समय की जीडीपी का मात्र 3.2 प्रतिशत ही था। यानि अब समस्या कई गुणा गंभीर है। फर्क केवल इतना है कि उस समय देश के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार नहीं थे, जबकि अब देश के पास 270 अरब डालर के विदेशी मुद्रा भंडार हैं। लेकिन भुगतान की परिस्थिति यदि इसी प्रकार से बनी रही तो विदेशी मुद्रा भंडार समाप्त होते देर नहीं लगेगी। पिछले कुछ समय से भुगतान संकटों के चलते देश का रूपया लगातार गिर रहा है।

चुनावी साल की मजबूरियां

इन सभी परिस्थितियों में, जबकि वित्तमंत्री के पास बजट द्वारा कुछ कर सकने में कोई खास संभावनाएं दिखाई नहीं देती, एक मानसिक दबाव अवश्य रहेगा कि चुनावी वर्ष में आम जनता को खुशफहमी में कैसे रखा जाए। उसके लिए सरकार ने पहले से ही कैश सब्सिडी का शगुफा छोड़ दिया है। इस प्रकार नकद सब्सिडी के माध्यम से वोट बटोरने की कोशिश यह बजट जरूर कर सकता है। इसके साथ ही साथ सरकारी हल्कों में किसानों के लिए एक और ऋण माफी की बात भी चल रही है। ‘कैग’ द्वारा हाल ही में इस संबंध में किए गए खुलासों के बाद, शायद इस बात पर कुछ रोक लगेगी। नौकरीपेशा लोग महंगाई के चलते आयकर की सीमा बढ़ाने की चाहत रखते हैं, लेकिन उनके लिए सबसे जरूरी बात यह रहेगी कि सरकार महंगाई पर किस कदर रोक लागा पायेगी। सुपर अमीरों पर सुपर टैक्स, खाद्य पदार्थों की कीमतों पर नियंत्रण, इंडस्ट्री की ग्रोथ बढ़ाने के लिए एक्साईज ड्यूटी में कमी आदि कुछ ऐसे फैसले हैं, जिन पर आम आदमी की निगाह जरूर रहेगी।

डाॅ. अश्विनी महाजन
एसोसिएट प्रोफेसर, पीजीडीएवी कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
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