जी.एम. खाद्य फसलों के खुले परीक्षण की अनुमति - जनता के साथ वायदा खिलाफी

केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी अनुमोदन समिति द्वारा जी.एम. खाद्य फसलों के खुले परीक्षण की अनुमति दिए जाने के फैसले की खबर स्वदेशी जागरण मंच के लिए अतयंत अविश्वसनीय एवं पीड़ादायक है। गौरतलब है कि जैव प्रौद्योगिकी अनुमोदन समिति द्वारा दिनांक 18 जुलाई 2014 को चावल, चना, गन्ना, बैंगन, सरसों समेत कई खाद्य फसलों के खुले परीक्षण की अनुमति प्रदान की गई है।

भारत के लोगों, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सरकार को चुना, वे स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। लोगों ने भारतीय जनता पार्टी को उनके नेताओं द्वारा रैलियों में दिए गए भाषणों और चुनाव घोषणा पत्र में लिखित रूप से किए गए वायदों के आधार पर सत्ता सौपी है। जैव संवर्धित खाद्य फसलों के संदर्भ में पार्टी ने दृढ़ता से चुनाव घोषणा पत्र में यह लिखा था कि ’’आनुवंशिक रूप से संवर्धित (जी.एम.) खाद्य को बिना वैज्ञानिक जांच पड़ताल के अनुमति नहीं दी जायेगी। इसमें देखा जायेगा के उत्पादन के दौरान मृदा पर और जैव वैज्ञानिक रूप से उपभोक्ताओं पर क्या प्रभाव पड़ा।’’ चुनाव घोषणा पत्र 7 अप्रैल 2014 को जनता के लिए जारी किया गया। न तो भारत सरकार और न ही जैव प्रौद्योगिकी अनुमोदन समिति ने अभी तक यह स्पष्ट किया है कि वैज्ञानिक परीक्षण कौन से और कब किए गए और न ही यह बताया है कि 7 अप्रैल 2014 एवं 18 जुलाई 2014 जब जी.एम. खाद्य फसलों के खुले परीक्षण की अनुमति दी गई है, के बीच परिस्थितियों में क्या अंतर आ गया है।

स्वदेशी जागरण मंच ध्यान दिलाना चाहता है कि जैव संवर्धित के खुले परीक्षण पर लगी रोक स्वदेशी जागरण मंच, किसानों, वैज्ञानिकों, उपभोक्ता संगठनों एवं अन्य हितधारकों के लंबे संघर्ष का परिणाम था। माननीय उच्चतम न्यायालय की भी इस संदर्भ में स्पष्ट राय यह रही है कि जनता एवं मृदा के स्वास्थ्य को खतरे में डालते हुए किसी भी प्रकार का जल्दबाजी पूर्ण निणर्य सही नहीं है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने भी जैव संवर्धित खाद्य फसलों के खुले परीक्षण पर तब तक रोक लगाने के लिए सिफारिश की थी, जब तक सरकार उचित नियामक एवं सुरक्षा तंत्र को स्थापित नहीं करती, और ऐसा अभी तक नहीं किया गया है। कृषि संबंधी संसदीय स्थायी समिति, जिसमें भारतीय जनता पार्टी के सदस्य भी शामिल थे, ने अगस्त 2012 को जी.एम. खाद्य फसलों पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहा था। सर्वविदित है कि जैव संवर्धित फसलों के बारे में कंपनियों के उत्पादकता बढ़ने, मृदा स्वास्थ्य एवं मानव जीवन पर कोई खतरा न होने के दावे सही नही है। जैव संवर्धित फसलों की उत्पादकता अधिक होने का कोई भी वैज्ञानिक तथ्य उपलब्ध नहीं है। सरकार का कर्तव्य है कि वह अपनी विश्वसनीय संस्थाओं के द्वारा किए गए परीक्षणों एवं अध्ययनों के आधार पर अपनी समझ निर्माण करे, न कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किए गए दावों को आंख मूंदकर स्वीकार करें। सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय तथा संसदीय स्थाई समिति जैसे संवैधानिक संस्थाओं की राय को महत्व देना चाहिए, न कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा अपने हित साधन के लिए दी गई रपटों का।

स्वदेशी जागरण मंच सरकार से अनुरोध करता है कि जैव प्रौद्योगिकी अनुमोदन समिति द्वारा जी.एम. फसलों के खुले परीक्षण की अनुमति पर तुरंत रोक लगाए। स्वदेशी जागरण मंच सरकार से यह भी आग्रह करता है कि वह जी.एम. खाद्य फसलों के उपयोग के कारण कृषि भूमि की उर्वरकता तथा मानव एवं अन्य जीवों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कुप्रभावों को समझने के लिए एक योग्य समिति का गठन करके सही जानकारी प्राप्त करने के संदर्भ में स्वयं पहल करें। सरकार का यह प्रथम दायित्व है कि वह देश की जैव विविधता, भूमि की उर्वरक क्षमता, खाद्य सुरक्षा तथा जनस्वास्थ्य को किसी भी प्रकार से हानि न पहुंचने दे।

डाॅ. अश्वनी महाजन
अखिल भारतीय सह-संयोजक