आम बजट 2014-15 पर प्रेस विज्ञप्ति

यूपीए सरकार के 10 साल के आर्थिक कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और एफडीआई पोषित आर्थिक संवृद्धि के माॅडल में गरीबों की दुर्गति निहित थी, जिसके कारण पिछले 10 सालों में बेरोजगारी, विशेष तौर पर युवाओं में, इतनी बढ़ी कि आज देश में 25 से 34 आयु वर्ग में 4.7 करोड़ लोग बेरोजगार हो चुके हैं। उस शासन का अंत करते हुए देश की जनता ने अच्छे दिनों की आस में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश की बागडोर सौंपी है। यह जरूरी है कि हमारी 30 प्रतिशत जनसंख्या जो गरीबी रेखा से नीचे रहती है, उसको कमाने के पूरे अवसर मिले। जनगणना के आंकड़े बताते है कि आज के भूमंडलीकरण के इस युग में गरीबों, वंचितों, दलितों और आदिवासियों की जमीनें छिन रही हैं। इस प्रवृत्ति को रोकने की जरूरत है, इसके लिए आज के विकास का माॅडल बदला जाए। एफडीआई और बड़े काॅरपोरेट घरानों पर आश्रित विकास, रोजगार विहीन विकास है, गरीबी को बढ़ाने वाला है और वंचितों को उनके बचे खुचे संसाधनों से भी च्युत करने वाला है। 10 जुलाई 2014 को संसद में प्रस्तुत बजट नई सरकार का पहला नीति दस्तावेज है। इससे अपेक्षा यह थी कि देश के समक्ष चुनौतियों, विशेषतौर पर मंहगाई, बेरोजगारी, मैन्यूफेक्चरिंग में गिरावट और रूपये को मजबूत करने संबंधी उपाय किए जायेंगे और इन सबके माध्यम से अच्छे दिनों की शुरूआत हो सकेगी।

स्वदेशी जागरण मंच यह मानता है कि वर्तमान सरकार को जो अर्थव्यवस्था विरासत में मिली है उसकी सेहत अच्छी नहीं है। भारी बेरोजगारी के अलावा सरकारी खजाना भी खाली है। हालांकि वित्तमंत्री ने कहा कि वे इस कारण से अपने मनमुताबिक आवंटन नहीं कर पायें। इसलिए संभव है कि सभी प्रकार की अपेक्षाएं इस बजट से पूर्ण न हो पाएं।

लेकिन 10 जुलाई को संसद में प्रस्तुत बजट नई सरकार के रोजगार युक्त विकास के माॅडल के वायदे के अनुरूप नहीं है। यह सही है कि इस बजट में विशेष आर्थिक क्षेत्रों को बढ़ावा देने, 8 राष्ट्रीय निवेश एवं मैन्यूफेक्चरिंग जोन बनाने दिल्ली, मुंबई, इंडस्ट्रीयल काॅरीडोर समेत 4 इंडस्ट्रीयल काॅरीडोरों का निर्माण, मुख्य मैन्यूफेक्चरिंग उद्योगों में अतिरिक्त क्षमता के निर्माण समेत कई उपाय बताए गए हैं, लेकिन रोजगार निर्माण के लिए नीतिगत बदलाव करने में यह बजट सफल नहीं कहा जा सकता।

बजट में मंहगाई दूर करने के उपायों का भी अभाव दिखाई देता है। आज मंहगाई का प्रमुख कारण खाद्य पदार्थाें का अभाव है। उसके लिए खेती और किसान के लिए विशेष प्रयास होने चाहिए थे। दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछली सरकार की भंाति इस सरकार ने इस बजट में भी कृषि के लिए मात्र 1 प्रतिशत से भी कम का आवंटन किया है। किसानों को ज्यादा ऋण देने की बात कही गई है, उर्वरा के परीक्षण की भी बात हुई है। लेकिन वास्तव में खेती को लाभप्रद बनाने के लिए किसान को उचित मूल्य मिलना और उसकी लागत को घटाना जरूरी है, इसके बारे में कोई प्रावधान नहीं है। सर्वविदित है कि डेयरी आज किसान के लिए अतिरिक्त आमदनी का महत्वपूर्ण स्रोत है। लेकिन डेयरी विकास के लिए भी बजट में पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। जरूरत इस बात की है कि डेयरी को भी कृषि का दर्जा दिया जाता।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछली सरकार की भांति इस सरकार ने भी बजट के माध्यम से एफडीआई और पोर्टफोलियो निवेश की नीति को ही आगे बढाया है। देश में इस बात पर लगभग मतैक्य है कि बीमा क्षेत्र में 26 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति के बाद बीमा कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं का शोषण एवं लूटखसोट तो हुई ही है, साथ ही बीमा की प्रीमियम दरों में भी भारी वृद्धि हुई है। ऐसे में विदेशी निवेश की सीमा को 49 प्रतिशत करते हुए सरकार क्या संकेत देना चाहती है, स्पष्ट नहीं है।

प्रतिरक्षा के क्षेत्र में भी हालांकि सरकार ने 49 प्रतिशत के विदेशी निवेश के साथ भारतीय प्रबंधन की अनिवार्यता की बात कही है, लेकिन इस क्षेत्र में विदेशी निवेश से संबंधित देश के कई वर्गों में काफी आपत्तियां हैं। इस संबंध में विचार विमर्श एवं राष्ट्रीय बहस की जरूरत है।

स्वदेशी जागरण मंच सरकार से अनुरोध करता है कि पिछली सरकार के रोजगार विहीन माॅडल को तिलांजलि देते हुए देश में रोजगार बढ़ाने वाले, गरीबी को दूर करने वाले माॅडल को अपनाए। प्रतिरक्षा और बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की नीति पर पुनर्विचार करें। पीपीपी माॅडल के नाम पर अनावश्यक निजीकरण, जिससे उपभोक्ताओं का शोषण होने की संभावना हो, से बचा जाए। अभी तक अपनाई गई एफडीआई और पोर्टफोलियो निवेश की नीति के फायदे एवं नुकसानों पर एक श्वेत पत्र जारी हो और तब तक विदेशी निवेश की घोषित नीतियों को स्थगित रखा जाए।

डाॅ. अश्वनी महाजन
(अखिल भारतीय सहसंयोजक)