बजट पूर्व परिचर्चा - जनहित राष्ट्रहित में अपेक्षाएं

दीनदयाल शोध संस्थान में ‘बजट-पूर्व परिचर्चा’ के अवसर पर प्रेस को जारी

बजट पूर्व परिचर्चा - जनहित राष्ट्रहित में अपेक्षाएं

फरवरी 2014 को पिछली सरकार के वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम् ने जब अपना अंतरिम बजट पेश किया तो उन्होंने स्वयं इस बात को स्वीकार किया था कि अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी नहीं है। हम देखते हैं कि पिछले तीन वर्षों में अर्थव्यवस्था लगातार सुस्त बनी हुई है। मैन्यूफैक्चरिंग की ग्रोथ जो 2007-08 में 15.6 प्रतिशत थी घटकर ऋणात्मक 0.7 प्रतिशत तक पहुंची हुई दिखाई देती है। इन्फ्रास्ट्रक्चर के तमाम प्रकल्प ठप्प पड़े हुए है। जीडीपी की ग्रोथ रेट पिछले 2 वर्षों में औसत 4.5 प्रतिशत के आसपास दिखाई देती है। पिछले 3 वर्षों में महंगाई की दर पिछले 2-3 दशकों के रिकार्ड तोड़ते हुए 2 अंकों पर पहुंच गयी और खाने पीने की चीजों की महंगाई तो उससे भी कहीं ज्यादा थी। इस बीच रूपया भी कमजोर हुआ, क्योंकि विदेशी व्यापार का असंतुलन खासा बढ़ चुका था। उधर बेरोजगारी अपने वीभत्स रूप में पहुंच चुकी है। हाल ही में प्रकाशित जनगणना के आंकड़ों के अनुसार आज हमारे देश में 25 से 29 आयु वर्ग में बेरोजगारी 18 प्रतिशत है और कुल मिलाकर देश में 4.7 करोड़ युवा (25 से 34 आयु के बीच) बेरोजगार हैं। आदिवासियों में बेरोजगारी की दर 19 प्रतिशत और दलितों में 18 प्रतिशत है। आदिवासी युवाओं में बेरोजगारी 22 प्रतिशत और दलितों में 21 प्रतिशत है।

अत्यंत गहमा-गहमी वाले 16वें लोकसभा के इन चुनावों में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में नरेन्द्र मोदी ने चुनावों के बाद अच्छे दिन लाने का वादा किया था। गरीब अपनी हालत सुधरने का स्वप्न संजो रहा है, तो बेरोजगार रोजगार के अवसर पाने की अपेक्षा रखता है। मध्यम वर्ग समेत सभी महंगाई से निजात पाना चाहते हैं, तो देश का उद्योग जगत चाहता है कि जल्दी से अर्थव्यवस्था में सुस्ती कम हो और देश ऊंची ग्रोथ प्राप्त कर पाये। स्वभाविक ही है कि देश के सामने खड़ी चुनौतियों को लांघ कर ही अच्छे दिन आ सकते हैं।

वस्तुिस्थित

सही नीयत होने पर भी उपलब्धियों की संभावनाएं वास्तविक आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। मसलन यदि महंगाई की बात की जाए, तो देश में महंगाई रूपए की कमजोरी के कारण है ही, देश में खाने-पीने की चीजों की कमी भी उसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। सरकार के भारी-भरकम खर्च और राजस्व में अपेक्षित वृद्धि न होने के कारण उसे मजबूरन रिजर्व बैंक से उधार लेना पड़ता है और रिजर्व बैंक को उसके लिए अतिरिक्त नोट छापने पड़ते हैं। जाहिर है कि ज्यादा नोट छापने से मुद्रा का प्रसार बढ़ता है एवं महंगाई और ज्यादा बढ़ जाती है।

10 जुलाई को संसद में वर्ष 2014-15 का बजट पेश किया जाएगा। फरवरी माह में पिछली सरकार के वित्त मंत्री ने अंतरिम बजट पेश किया था। जब पी. चिदम्बरम् ने अंतरिम बजट में यह कहा था कि वर्ष 2013-14 के लिए राजकोषीय घाटे को 4.6 प्रतिशत तक सीमित कर लिया गया है, तो भी किसी ने उनकी बात को माना नहीं था। सब को पता था कि वर्ष 2013-14 के खर्चों के कई खर्चों को वर्ष 2014-15 के लिए टाल दिया गया था, भविष्य में पब्लिक सेक्टर कंपनियों से मिलने वाले लाभांशों को पहले ही मंगा लिया गया था और कई खर्चों को छुपा भी लिया गया था। जानकारों का मानना है कि वर्ष 2013-14 का राजकोषीय घाटा वास्तव में 7 प्रतिशत के आसपास था, जिसे छिपाने का प्रयास किया गया। जाहिर है कि इन परिस्थितियों में स्थिति कहीं अधिक विकट है। उधर इराक में आंतरिक युद्ध के कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, महंगाई की परिस्थितियों को और विकट बना सकती हैं।

सुस्त अर्थव्यवस्था का दर्द

ग्रोथ की लगातार ऊंची दर के बाद ऐसे में इस सुस्त अर्थव्यवस्था को गति देना सरकार की प्राथमिकता में अव्वल दर्जें पर रखना होगा। पिछले काफी समय से महंगाई के चलते ब्याज दरों को घटाना संभव नहीं हो पाया है। ऐसे में मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ हो या इन्फ्रास्ट्रक्चर की, दोनों में हम पिछड़े हैं। सरकार को तमाम ऐसे उपाय अपनाने होंगे, जिससे मैन्युफैक्चरिंग में गति आए। पिछले काफी समय से रियल्टी (जायदाद) का क्षेत्र पिछड़ा है, जिसके चलते सीमेंट, लोहा, अन्य भवन निर्माण सामग्री की मांग तो घटी ही है, रोजगार के अवसर भी कम हुए हैं। गृह निर्माण और सड़क और रेल समेत इन्फ्रास्ट्रक्चर को प्रोत्साहन देकर सरकार मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में एक नई जान फूंक सकती है। याद रखना होगा कि यह सब होने के बावजूद भी इसके परिणाम तुरंत दिखाई देने वाले नहीं हैं।

रूपए की बदहाली

एक लम्बे समय से हमारा भुगतान शेष का घाटा लगातार बढ़ता रहा है। 2000-01 से 2002-03 तक, जब भुगतान शेष फायदे में चला गया था, के बाद यह लगातार घाटे में चल रहा है। 2012-13 में यह घाटा 89 अरब डालर तक पहुंच गया था। हालांकि पिछले साल सोने के आयातों पर रोक लगाने के बाद उसमें कुछ सुधार हुआ है, लेकिन यह अभी भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है। उधर हमारे विदेशी कर्जों की देनदारियों निकट आने के कारण रूपए पर दबाव और ज्यादा बढ़ा है। रूपए की बदहाली को थामना इस सरकार के लिए एक अन्य बड़ी चुनौती है। गौरतलब है कि हमारा व्यापार घाटा बहुत ज्यादा है, क्योंकि हमारे आयात तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि निर्यात सुस्त बने हुए हैं। निर्यातों की बढ़ने की संभावनाएं ज्यादा न होने के कारण आयातों को रोकना ही समझदारी है। गौरतलब है कि चीन से आज केवल खिलौने, इलेक्ट्रोनिक का सामान और दूसरी उपभोक्ता वस्तुएं ही नहीं, बल्कि पावर प्लांट और प्रोजेक्ट गुड़स भारी मात्रा में आ रही है, जिसके कारण चीन के साथ 40 अरब डाॅलर से भी ज्यादा व्यापार घाटा ही नहीं बल्कि हमारे छोटे बड़े तमाम प्रकार के उद्योग उससे प्रभावित हो रहे हैं। विदेशी भुगतान की समस्या से निपटने को जो आसान मार्ग अभी तक पिछली सरकार ने दिखाया वह था एफ.डी.आई, पोर्ट फोलियो निवेश और बाजारी ऋण। लेकिन इस नीति के दुष्परिणाम अब आने श्ुारू हो गए हैं। यदि इसी प्रकार की आर्थिक नीति जारी रहती है तो वह हमें ऐसे अंधे कुएं की तरफ धकेल देगी, जिससे बचाव का कोई रास्ता नहीं बचेगा। जरूरत इस बात की है कि आयातों खासतौर पर चीन से होने वाले आयात शुल्क बढ़ाते हुए एवं अन्य प्रतिबंध लगाकर रोक लगे। चीन से आयातों को प्रतिबंधित करते हुए हम रूपए की बदहाली को तो रोक ही सकते है, साथ ही मैन्यूफैक्चरिंग को भी एक नया जीवनदान दे सकते है। रूपया मजबूत हो इसके लिए जरूरी है कि ब्राजील की तर्ज पर विदेशी संस्थागत निवेशकों के लाभों पर टैक्स लगाया जाए और साथ ही साथ उन पर कम से कम 3 साल का लाॅक इन पीरियड लागू हो।

राष्ट्रहित में बजट से अपेक्षाएं

यह सही है कि विकट परिस्थितियों के बावजूद महंगाई को रोकना, रोजगार को बढ़ाना, गरीबों की हालत में सुधार और अर्थव्यवस्था को गति देना, सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। महंगाई को रोकने के लिए सरकार को मुद्रा के प्रसार को रोकना होगा या यूं कहें कि अपने खर्चों को थामना होगा। वास्तव में महंगाई का मुख्य कारण पिछली सरकार की लोकलुभावन योजनाओं पर किया जा रहा भारी खर्चा है। पहले किसानों की कर्ज माफी (जिसके बावजूद छोटे किसानों पर कर्जा बदस्तूर रहा), बिना उपयुक्त योजना के मनरेगा जैसी स्कीमें (जिसके नुकसान सर्वविदित हैं), सड़ी गली सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर आधारित खाद्य सब्सिडी (जिसका लाभ वास्तविक गरीबों तक पहुंचता ही नही), डीजल सब्सिडी के नाम पर लग्जरी कारों के लिए सस्ता डीजल जैसे तमाम ऐसे खर्चे हैं जो देश का राजकोषीय घाटा बढ़ाने का काम करते है। ऐसे में सामाजिक कल्याण को हानि पहुंचाए बिना सरकार को इन खर्चों को युक्तिसंगत बनाना होगा। नरेगा को खेती के साथ जोड़कर सरकार किसान को श्रमिक उपलब्ध करा सकती है और साथ ही अपने खर्च को कम कर सकती है। सड़ी-गली सार्वजनिक वितरण प्रणाली के आधार पर खाद्य सुरक्षा कानून से कुछ हासिल नहीं होने वाला। यह सरकारी धन के दुरूपयोग का रास्ता ही बना रहेगा। खाद्य सुरक्षा की योजना को दुरूस्त करना होगा। लक्जरी कारों के लिए डीजल की सब्सिडी को समाप्त करना वास्तव में एक जरूरी कदम है, जो सरकार जितनी जल्द उठाए, उतना ही अच्छा है।

रोजगार को बढ़ाने के लिए हमें विदेशी निवेश की मानसिकता से बाहर आते हुए अपने लघु और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की बात सोचनी चाहिए। दशकों पहले लघु उद्योगों के लिए एक्साईज ड्यूटी से छूट के लिए तय उत्पादन की सीमा 1 करोड़ को बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही चूंकि लघु और कुटीर उद्योग भारी रोजगार का सृजन करते हैं, इसलिए उन्हें रोजगार सृजन के लिए और अधिक प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से रोजगार के अनुपात में करों में छूट और सब्सिडी मिलने का प्रावधान होना चाहिए। डेयरी और खाद्य प्रसंस्करण में रोजगार सृजन और गरीबी घटाने की अपार संभावनाएं हैं। विडंबना का विषय है कि डेयरी क्षेत्र जो न केवल रोजगार, गरीबी उन्नमूलन और खाद्य सुरक्षा का एक मुख्य स्रोत है, अभी भी खेती की परिभाषा में शामिल नहीं है। ऐसे में किसानों को दुधारू पशु खरीदने के लिए सस्ते दर पर ऋण उपलब्ध नहीं हो पाता। ऐसे में डेयरी को खेती की परिभाषा में शामिल करते हुए उसे भी 4 प्रतिशत की दर से ऋण उपलब्ध कराने का प्रावधान होना चाहिए।

देश में एक तरफ बिजली की कमी है तो दूसरी ओर बिजली उत्पादन बढ़ाने के लालच में पर्यावरण की आहूति दी जा रही है। नदियों के अविरल प्रवाह को रोका जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि बिजली उत्पादन बढ़ाने के लिए आम लोगों को सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने के लिए सब्सिडी और अन्य प्रकार के प्रोत्साहन दिए जाए।

उधर अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र बजट में अपने लिए कुछ चाह रहा है। बजट में वित्त मंत्री से अपेक्षाएं रखी जा रही हैं कि वे आयकर में छूट की सीमा बढ़ा देंगे, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्चा बढ़ जाएगा, सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर में ज्यादा खर्चा करेगी। लेकिन सरकार के पास संसाधन बढ़ाने के विशेष अवसर न होने के कारण आयकर छूट बढ़ाना या जरूरी खर्च भी बढ़ाना शायद संभव न हो। गौरतलब है कि 17.63 लाख करोड़ रूपए के अंतरिम बजट में 7.65 लाख करोड़ रूपए तो मात्र ब्याज, सब्सिडी और सरकारी प्रशासन के लिए थे। 2.24 लाख करोड़ रूपए का रक्षा बजट था। शिक्षा, स्वास्थ्य, स्त्री एवं बाल विकास, अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों समेत सामाजिक सेवाओं के लिए बजट का मात्र 9.22 प्रतिशत ही रखा गया था, कृषि पर कुल बजट का 0.75 प्रतिशत आवंटित हुआ था। ऐसे में इस बजट के माध्यम से अच्छे दिन लाना तो शायद संभव न हो, लेकिन यह जरूर है कि यह सरकार नीतियों की दिशा को सही रखते हुए ईमानदारी से काम करे, तो शायद अगले दो वर्षों में कुछ अच्छे दिन आने की संभावनाएं बन सकती हैं।