प्रस्ताव-1 (हिन्दी) — कुरूक्षेत्र राष्ट्रीय सभा

स्वदेशी जागरण मंच
13वीं राष्ट्रीय सभा
कुरूक्षेत्र (हरियाणा) - 12-14 नवंबर 2016

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति निरस्त कर, श्वेत पत्र जारी हो

भारत सरकार ने अपने दो वर्ष के कार्यकाल पूर्ण करने के पश्चात 7 जून 2016 से ‘समेकित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति’ की घोषणा कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार के द्वारा चलाये जा रहे ‘मेक एन इंडिया’ के नीतिगत अभियान के अंतर्गत यह घोषणा की गई। संबंधित दस्तावेजों में इस नीति के घोषित उदेश्य को विकास को गति देने के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को घरेलू पूंजी, उच्च प्रौद्योगिकी तथा कौशल विकास के सहायक व पूरक के रूप में प्रोत्साहित/आकर्षित करना बताया जा रहा है।

कुछ क्षेत्रों में विदेशी निवेश को अनुमति देना तथा शेष क्षेत्रों में घरेलू उद्योगों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर अनुमति न देने की अब तक नीति को पलटकर सरकार ने अब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए हर क्षेत्र के द्वार खोल दिए है। इस नीति के अंतर्गत एक निषिध सूचि भी जारी की गई है जिसमें उन क्षेत्रों के नाम दर्ज है जिनमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति नहीं दी जायेगी।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा निवेश खुदरा व्यापार, पशुपालन, रक्षा, खाद्य उत्पाद, जेनेरिक दवा, सुरक्षा एजेंसियों, ई-वाणिज्य और व्यावहारिक रूप से हर क्षेत्र में आ सकता है। यह निवेश ग्रीनफील्ड परियोजनाओं में प्रत्यक्ष रूप में या ब्राउन फील्ड के माध्यम से घरेलू उद्योगों को अपने हाथ में लेने के रास्ते से भी संभव हो सकता है। और इस निवेश की सीमा 100 प्रतिशत तक भी संभव है, केवल कुछ मामलों को छोड़कर जहां यह सरकारी अनुमति या स्वचालित रूप से आ सकता है। इन सब में कृषि क्षेत्र में 100 फीसदी तक दी गई अनुमति खास तौर पर चिंता का विषय है। बागवानी, पशुपालन, सब्जी उत्पादन, बीज तथा रबर, कॉफी, पॉम व जैतून के तेल में विदेशी कंपनियों को एकाधिकार स्थापित करने की अनुमति देना विचलित करने वाला है। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि विदेशी कंपनियां आकर भारत में हमारे कृषि योग्य भूमि को कब्जा सकती है और सब्जियों की खेती, फूलों की खेती, मछली पालन, बीज के उत्पादन में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ का एकाधिकार और नियंत्रण बनाने के लिए अनुमति दी गई है और ये कंपनियां सब्जियां उत्पादन कर सकती है और कुत्ता-बिल्ली सहित पशुधन को भी नियंत्रित कर सकती है।

ये सभी क्षेत्र संवेदनशील हैं, लेकिन भारत सरकार आम आदमी के प्रति असंवेदनशील रवैया अपना रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनिया को बहुपक्षीय निवेश गारंटी एसोसिएशन (एमआईजीए) सहित अंतरराष्ट्रीय अदालत में भारत सरकार के खिलाफ केस दायर करने के लिए भी कानूनी अधिकार प्रदान किया जाएगा। किसान इससे प्रभावित होकर अपनी भूमि को बेचने के लिए आकर्षित हो सकता है। यह तो हमारी प्रभुसत्ता पर सीधा हमला है।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इस नीति के साथ-साथ भारत सरकार कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता करने की तैयारी भी कर चुकी है। इन समझौतों के तहत भी सरकार विदेशी कंपनियों (प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष करो में रियायतों के साथ) को अनियंत्रित अधिकार दे रही है।

कुल मिलाकर विदेशी निवेश की अनुमति देकर कृषि, खुदरा व्यापार, प्रतिरक्षा क्षेत्र, वित्तीय एवं सेवा क्षेत्र के समझौता किया गया है। यह समझौता देष के लिए अहितकारी सिद्ध होने वाला है। देष की प्रभुसत्ता, बेरोजगारी, आत्मनिर्भरता, देशी उद्योग, खासकर लघु एवं मंझले उद्योग (एमएसएमई) क्षेत्र भी विदेशी कंपनियों के मुकाबले में पिछड़ जायेगें। संस्कृति पर कुप्रभाव तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ के चलते सामाजिक और राजनैतिक ढ़ांचे में निहित खतरों के साथ-साथ काफी मात्रा में मुद्रा का बाहर जाना चिंता का विषय है।

हाल में हुए अनेक अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मतलब नई फैक्टरी, नया कार्यालय, नया नर्माण और नई नौकरियां नहीं होता, अपितु इससे बौद्धिक संपदा (आई.पी.आर.) के हस्तांतरण से कॉरपोरेट कर में छूट हो जाती है और एकाधिकार प्राप्त कर मुनाफे को अप्रत्यशित रूप से बढ़ाना होता है।

स्वदेशी जागरण मंच का मानना है कि इस नीति के चलते भारत सदैव आयात करने वाला देश ही बना रहेगा। अतः इस नीति को तुरंत निरस्त कर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से संबंधित सभी आदेश वापिस लिये जाये। 1991 से लेकर आज तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर एक श्वते पत्र जारी हो और तक तक इससे संबंधित निर्णयों पर रोक लगाई जाये।