12th National Convention, Jodhpur (Raj.) — Resolution 2 (H)

‘मेड बाई भारत’ से ही देश का विकास संभव



स्वदेशी जागरण मंच इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त करता है कि विगत 24 वर्षों में आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत आयातों में उदारीकरण से आज जहाँ देश आयातित वस्तुओं के बाजार में बदल गया है, वहीं विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को प्रोत्साहन देते चले जाने से देश के सगंठित क्षेत्र के उत्पादन तंत्र के दो तिहाई से भी अधिक अंश पर विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का स्वामित्व व नियन्त्रण होता चला गया है।

आयातों में अथाह बढ़ोतरी के कारण ही सरकार को चालू खाते के घाटे की पूत्र्ति के लिये नये-नये क्षेत्रों मंे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों को राष्ट्रीय हितों के विपरीत शत्र्तों पर प्रोत्साहन देना पड़ रहा है। अधिकांश उद्योगों में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश के स्वतः अनुमोदन की नीति के परिणामस्वरूप देश के औद्योगिक उत्पादन तंत्र में 2/3 से अधिक विदेशी कम्पनियों का वर्चस्व हो गया है। शीतल पेय, टूथपेस्ट, जूते के पाॅलिश से लेकर टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर, स्वचालित वाहन, सीमेन्ट सहित दूर संचार व ऊर्जा उत्पादन संयंत्रों के निर्माण तक के 2/3 भाग पर आज विदेशी कम्पनियां हावी हैं। प्रश्न यह उभरता है कि इस देश के उत्पादन के साधनों पर अब किसका नियंत्रण होगा? भारतीयों का अथवा विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का?

उदाहरणतः वर्ष 1999 के पूर्व देश में सारा सीमेन्ट भारतीय स्वदेशी उद्यम बनाते थे। देश में निर्माण कार्यों में उछाल आने की आशा में यूरोप के छह बडे़ सीमेन्ट उत्पादकों ने दक्षिण पूर्व एशिया के कोरिया आदि देशोें से सस्ती सीमेन्ट भेजना कर प्रारंभ कर हमारे देश में स्थानीय सीमेन्ट उत्पादकों को दबाब में लाकर उनको उद्यम बिक्री को बाध्य करके आज हमारी आधी से अधिक सीमेन्ट उत्पादन क्षमता पर कब्जा कर लिया है। टाटा के टिस्को के सीमेन्ट के कारखाने और देश भर में फैले एसीसी व गुजरात अम्बुजा आदि के संयंत्रों के यूरोपीय कम्पनियों लाफार्ज व हाॅलसिम द्वारा अधिग्रहण के बाद आज देश की दो तिहाई सीमेन्ट उत्पादन क्षमता यूरोपीय सीमेन्ट उत्पादकों के स्वामित्व व नियंत्रण में गयी है। सौर ऊर्जा जनन के क्षेत्र में विदेशी निवेश व आयात उदारता के कारण देश के सुस्थापित उद्यम भी बंद हो रहे हैं। सूती वस्त्रोंद्योग के निर्यातों में भारत बांग्लादेश से भी पिछड़ रहा है।

इसी प्रकार आर्थिक सुधारों के प्रारम्भ होने पर प्रथम पीढ़ी की दूर संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश सर्वथा स्वावलम्बी था और हमारी प्रौद्योगिकी मोटोरोला व सीमेन्स जैसी यूरो-अमेरिकी कम्पनियों के समतुल्य थी। लेकिन, आयात उदारीकरण के कारण और उन्नत प्रौद्योगिकी के विकास की ओर उपेक्षा के कारण देश दूसरी, तीसरी व चैथी पीढ़ी की दूर संचार प्रौद्योगिकी में पूरी तरह पराश्रित हो गया है। यही स्थिति उच्च प्रौद्योगिकी के अन्य क्षेत्रों में भी हो रही है। इसीलिये उत्पादक उद्योगों के कुल वैश्विक उत्पादन (World manufacturing) में भारत का अंश मात्र 2.04 प्रतिशत ही है, जबकि इसमें चीन का अंश 23 प्रतिशत है। वर्ष 1992 में चीन का अंश भी मात्र 2.4 प्रतिशत ही था। आज उसने अमेरिका को भी 17.5 प्रतिशत के साथ विश्व में दूसरे स्थान पर पहुँचा कर उत्पादक उद्योगों के उत्पादन (World manufacturing) में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। यह सब हमारे उदार आयातों व विदेशी निवेश को दिये जा रहे अनुचित प्रोत्साहन का परिणाम है, हम इतने पिछड़ते जा रहे हैं।

कई उद्योगों में हमारा आज विश्व के उत्पादन में अत्यन्त स्वल्प व हास्यास्पद अंश है, यथा वैश्विक जलपोत निर्माण (world ship building) में हमारा मात्र 0.01 प्रतिशत अंश ही है। जबकि हम विश्व के चैथे बड़े स्पात उत्पादक देश हैं, 6100 किमी लम्बी हमारी तट रेखा है और 2009 में हमारा अंश कम से कम 1.4 प्रतिशत तो था। दूसरी और दवा उद्योग में उचित वातावरण प्रदान करने से आज विश्व के कुल औषधि उत्पादन में हमारा अंश 10 प्रतिशत होने से हम विश्व की फार्मेसी (Pharmecy of the world) कहलाते है और विश्व के जरूरतमन्द लोगों के लिये सस्ती दवाओं का विश्व में एकमेव स्त्रोत है। वहाँ आज हम हम यूरो-अमेरीकी दबाव में बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के नाम पर स्वदेशी उद्यमों के विकास का मार्ग अवरूद्ध करते जा रहे हैं। अन्य भी अनेक विधिक परिवर्तनों से छोटे उद्यमों के लिए ऐसी बाधाये खड़ी की जाती रहीं हंै, कि सभी क्षेत्रों मंे छोटे उद्यमियों के लिये कारोबार में कई बाधायें अनुभव की जा रही हैं। इसी क्रम में सौर व पवन ऊर्जा के क्षेत्र में आगामी 5 वर्षों में देश में 10 लाख करोड़ का निवेश अपेक्षित है। इसलिए सामान्य उपभोक्ता उत्पादों से अवसंरचना क्षेत्र पर्यन्त ‘मेड बाई इंडिया’ का अनुसरण कर देश में ही सभी उत्पादों व ब्राण्ड़ों के प्रवर्तन को समर्थन देना होगा।

इसलिये स्वदेशी जागरण मंच आवाहन करता है कि देश के इलेक्ट्रोनिक्स सेमीकण्डक्टर उद्योग सौर ऊर्जा संयंत्र उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग से लेकर वस्त्रोद्योग पर्यन्त सभी उद्योगों के क्षेत्र में कार्यरत उद्यम संगठित होकर उनके अपने उद्योग सहायता संघों (Industry Consortium) का विकास कर मेड बाई इण्डिया उत्पाद व ब्राण्ड विकसित करंें। आज देश में 400 प्रमुख उद्योग संकुल (Major Industry Clusters) 7000 लघु संकुल (Minor Clusters) हैं। इन उद्योग संकुलों (Industry Clusters) को उद्योग सहायता संघों (Industry consortiums) में बदलना, उनके लिये प्रौद्योगिकी विकास सहकारी संघों या प्रौद्योगिकी विकास सहकारी समझौतों की योजना करना आदि मेड बाई इण्डिया के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए आज की अनिवार्य आवश्यकता है।

वस्तुतः देश के प्रत्येक उद्योग केन्द्र पर उद्योग संकुलों एवं सभी उद्योगों यथा सूचना प्रौद्योगिकी उद्योगों व सौर ऊर्जा संयंत्र निर्माताओं से लेकर वस्त्राद्योग, इलेक्ट्रोनिक्स व सेमिकण्डक्टर उद्योग आदि सभी क्षेत्रों में उत्पादकों के स्व-नियामक ‘मेड बाई इण्डिया फोरम या संघ’ विकसित करके ही विदेशी प्रतिस्पद्र्धा का सामना कर उनके प्रभाव व वर्चस्व को सीमित करने का एक श्रेयस्कर मार्ग सिद्ध हो सकता है। समाज में स्वदेशी भाव जागरण के साथ-साथ स्वदेशी उद्यमों को विेदशी उद्यमों के सम्मुख बेहतर स्पद्र्धाक्षम बनाने के लिये संगठित करने के लिए आवाहन करता है। साथ ही सरकार को भी चेतावनी देता है कि आयात व विदेशी निवेश प्रोत्साहन से मेक इन इंडिया के स्थान पर मेड़ बाई इंडिया के श्रेयस्कर मार्ग को प्रोत्साहन दे।