12th National Convention, Jodhpur (Raj.) — Resolution 3 (H)

राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन हो





व्यक्ति के व्यक्तित्व को, समाज की पहचान को एवं देश की प्रतिष्ठा को निखारने का एक सशक्त साधन है, शिक्षा। इसी उद्देश्य से शिक्षा-नीति निर्धारित हो तो वह अधिक परिणामकारी व फलदायी होगी इसमें कोई संदेह नही। स्वदेशी जागरण मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन भारत की शिक्षा व्यवस्था मे लगातार एवं बार-बार हो रही विभिन्न दलों की राजनैतिक दखलदांजी के कारण शिक्षा नीति में आयी विसंगतियों के प्रति अपनी चिन्ता प्रकट करता है।

व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके नैतिक चरित्र एवं आचरण से निखरता है। विज्ञान एवं मनोविज्ञान सम्मन यह बात विश्वव्यापी स्वीकृति प्राप्त कर चुकी है कि शरीर, प्राण, मन, बुद्धि एवं आत्मा के सन्तुलित विकास के द्वारा मनुष्य के अन्तर्निहित गुणों के प्रगटीकरण हेतु मातृभाषा के माध्यम से योगाधारित शिक्षा ही सर्वश्रेष्ठ है। छब्म्त्ज् ने यद्यपि योग के महत्व को समझकर उसे पाठ्यक्रम में समाहित किया है परन्तु उसे मातृभाषा को शिक्षा के माध्यम के नाते स्वीकृत कर इस विसंगति को दूर करने की पहल भी की जानी चाहिए।

समरस समाज ही संगठित एवं स्वावलंबी बन पाता है। सामाजिक समरसता में शिक्षा की भूमिका भी तब ही प्रभावी हो पायेगी जब समाज के सभी तबकों, जाति-पंथो, संप्रदायांे, विभिन्न भाषा-भाषियों आदि के सभी स्त्री-पुरूषों को समान रूप से शिक्षा उपलब्ध हो। शिक्षा के नाम पर व्यापार करने वाले एवं विदेशी निवेश के बल पर भारत की शिक्षा व्यवस्था में पैठ जमाने वाले व्यक्ति, संगठन तथा संस्थान समाज को अमीर एवं गरीब की शिक्षा के रूप में दो तबकों में बांट रही है। पंाथिक अल्पसंख्यक होने का लाभ उठाकर शिक्षा में मनमानी कर अवांछित विषय भी पढाये जा रहे है। इन सब विसंगतियों को दूर कर शिक्षा सर्वसमावेशी एवं सर्वसुलभ हो ऐसी नीति बने। यह आज भी महती आवश्यकता है।

विश्व दरबार में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के दहलीज पर खड़ा भारत उस प्रतिष्ठा को तब ही प्राप्त कर पायेगा जब वह अपनी शिक्षा व्यवस्था को ’’वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की अवधारणा के अनुरूप ढाल ले। राजनैतिक उथल-पुथल एवं सत्ता के उलटफेर से प्रभावित होती रहें तो शिक्षा अपनी वह महती भूमिका निभा नहीं पायेगी। अतः स्वदेशी जागरण मंच का यह राष्ट्रीय सम्मेलन मांग करता है कि भारत के प्रबुद्धजन एवं भारत सरकार इन सुझावों पर गंभीरतापूर्वक ध्यान दें एवं उसे क्रियान्वित करने हेतु उचित व्यवस्था करें -

1. आठवीं कक्षा तक किसी छात्र को अनुत्र्तीण न करने एवं दसवीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा को ऐच्छिक कर दिए जाने से शिक्षा में आ रही गिरावट को रोकने हेतु इस नियम को तत्काल प्रभाव से समाप्त करें।

2. सभी शासकीय एवं गैरशासकीय विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में आधारिक रचना, छात्र-शिक्षक अनुपात तथा अन्य सभी सुविधा के डिजीटलाईज्ड नियमन को अनिवार्य कर शिक्षा व्यवस्था को अनियमितता एवं भ्रष्टाचार से मुक्त करें।

3. स्वदेशी जीवन पद्धति, नैतिक शिक्षा अनुसंधान एवं सर्वसमावेशी पाठयक्रम, जिसमें तकनीकी शिक्षा, उद्योग पर शिक्षा कौशल विकास शामिल हो।

4. यह तभी सहज संभव हो पायेगा जब बार कांसिल या चार्टेर्ड एकांउटेंट संस्थान के भांति ग्राम सभा से लेकर सभी स्तरों पर शिक्षक एवं शिक्षाविदों के प्रतिनिधित्व के आधार पर स्वायत्त व स्वनियमनकारी ’राष्ट्रीय शिक्षा आयोग’ गठित हो तथा नीति निर्धारण से लेकर संचालन तक के सारे दायित्व निभाने का गुरूत्वपूर्ण कार्य उस आयोग को सौंप दिया जाए।