National Council Meeting Ahmedabad - Resolution-1 (H)

राष्ट्रीय परिषद, अहमदाबाद, गुजरात (5-6 मई, 2018)

प्रस्ताव-1
विकास नीति बदलने की जरूरत

वर्तमान और पूर्व की सरकारों का हमेशा यह दावा रहा है कि पिछले 27 वर्षों में अपनायी गई नई आर्थिक नीति के कारण जीडीपी ग्रोथ में भारी वृद्धि हुई है। नीति निर्माताओं का यह कहना है कि जीडीपी ग्रोथ से ही नवीन प्रौद्योगिकी का विकास होता है, रोजगार बढ़ता है और लोगों का जीवन स्तर सुधरता है। लेकिन उनके दावे गलत सिद्ध हो रहे हैं। उत्पादन बढ़ने के नाम पर विलासिता की वस्तुओं और अमीरों के उपभोग की सेवाओं का ही उत्पादन बढ़ रहा है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थामस पिकेटी का शोध बताता है कि पछले 354 वर्षों की जीडीपी ग्रोथ का 66 प्रतिशत हिस्सा ऊपरी 10 प्रतिशत लोगों द्वारा हथिया लिया गया और 29 प्रतिशत ऊपरी 1 प्रतिशत द्वारा। रोजगार निर्माण इसका सबसे बड़ा शिकार है। ओईसीडी का कहना है कि भारत में 15 से 29 वर्ष आयुवर्ग के 31 प्रतिशत युवा न तो शिक्षा या प्रशिक्षण में है और न ही रोजगार में है। यानि बेरोजगार हैं। यही नहीं, जीडीपी ग्रोथ के प्रति झुकाव के कारण पर्यावरण ही नहीं सांस्कृतिक मूल्यों के हृस के प्रति भी सरकारों की संवेदनशीलता समाप्त हो रही है। पर्यावरणीय असंतुलनों से मानव मात्र का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है।

पिछले कुछ समय में सरकार के द्वारा कौशल निर्माण, र्स्टाट-अप, मुद्रा योजना सहित अनेक प्रयासों से रोजगार के अवसर बढ़ाने की कोशिश हुई है, लेकिन बेरोजगारी आज भी एक भीषण समस्या बनी हुई है। इसका कारण यह है कि भूमंडलीकरण के युग में विकास का मॉडल, रोजगारविहीन मॉडल बनकर रह गया है। बढ़ता विदेशी आयात और उसके कारण बड़ा व्यापार घाटा, देश से रोजगार को दूसरे देशों में भेजने का साधन मात्र बनकर रहा गया है। विदेशी मुद्रा की कमी की भरपाई विदेशी निवेश से की जा रही है, जिसके कारण देश के संसाधनों पर भी विदेशी काबिज होते जा रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जितना रोजगार निर्माण हो रहा है, उससे कहीं ज्यादा रोजगार के अवसर वे नष्ट कर रहे हैं। उधर ‘आर्टिफिशल इंटेलिजेंस’ और अंधाधुंध मशीनीकरण के चलते और अधिक रोजगार नष्ट हो रहे हैं।

स्वदेशी जागरण मंच की राष्ट्रीय परिषद की स्पष्ट मान्यता है कि यदि यह नीति जारी रही तो रोजगार सृजन नहीं हो पायेगा। एक ऐसी विकास की नीति बने, जिसमें जीडीपी ग्रोथ में उत्पादन में वृद्धि के साथ रोजगार में वृद्धि और विकेंद्रीकरण निहित हो। जहां लघु उद्यम काम कर सकते हैं, बड़े उद्योगों का प्रवेश वहां वर्जित हो। यानि एक बार फिर से लघु उद्योगों के लिए उत्पाद आरक्षित किये जायें और साथ ही साथ नीतिगत हस्तक्षेप के साथ लघु उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाये। उद्योगों में रोजगार निर्माण के लिए सरकारी मदद मिले, ताकि लोग बिना कारण मशीनीकरण की ओर न बढ़ें। कौशल निर्माण के कार्यक्रम की समीक्षा करते हुए उद्योगों के लिए आवश्यक कौशल निर्माण का विकास किया जाये। सरकार द्वारा रोजगार बढ़ाने हेतु कर्मचारी भविष्य निधि में सहयोग की योजना का स्वदेशी जागरण मंच स्वागत करता है।

देश में ऐसे विशेषज्ञों की कमी नहीं जो पश्चिम के इस विचार से अभीभूत हैं कि गांवों में रोजगार नहीं बढ़ाया जा सकता और इसलिए लोगों को गांव और कृषि से बाहर किया जाना चाहिए। नीति निर्माता, जो लगभग इन विशेषज्ञों से सहमत हैं, वे गांव और किसान की हालत को सुधारने हेतु अपेक्षित प्रयास नहीं करते। परिणाम यह है कि कर्ज में डूबे लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यह क्रम थम ही नहीं रहा। हर बार किसानों की ऋण माफी, कृषि समस्या का हलमान लिया जाता है। कृषि में घटते रोजगार के कारण ‘मनरेगा’ पर खर्च बढ़ता जाता है। स्वदेशी जागरण मंच की राष्ट्रीय परिषद यह मांग करती है कि देश की सभी राज्य सरकारें और केंद्र सरकार, कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने हेतु अपेक्षित प्रयास करें। दाल, तिलहन, फल-फूल, सब्जी, खुंभ, बांस और अन्य लाभकारी फसलों, जिनमें रोजगार निर्माण की अधिक संभावनायें है, को बढ़ावा दिया जाये। खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी एव मुर्गी पालन, मछली पालन सहित गैर-कृषि कार्यों को प्रोत्साहन देकर अपार मात्रा में रोजगार के अवसर बढ़ाये जा सकते हैं, उसके लिए प्रयास हों।

बांस को वनोत्पाद की श्रेणी से अलग करने, मछली पालन और डेयरी में संलग्न लोगों (चाहे वे भूमिहीन भी हों) को किसान क्रेडिट कार्ड उपलब्ध कराने के फैसलों का स्वदेशी जागरण मंच की राष्ट्रीय परिषद स्वागत करती है। साथ ही साथ मांग करती है कि डेयरी, मछली पालन, मशरूम उत्पादन, मुर्गी पालन, आदि को भी कृषि की श्रेणी में रखकर उन्हें रियायती दरों पर ऋण उपलब्ध करवाया जाये। साथ ही आग्रह करती है कि उपरोक्त सभी क्षेत्रों में रोजगार सृजन के रास्ते में आने वाली कठिनाईयों को दूर किया जाये।