National Council Meeting at Bhopal — Resolution 2

सस्ती दवाओं व चिकित्सा सेवाओं से चिकित्सा की सर्व सुलभता आवश्यक

देश में जीवन शैली जन्य रोगों सहित विविध रोग अत्यन्त तीव्र गति से बढ़ रहे हैं। सभी प्रकार के रोगों के सकल वैश्विक रोग भार (World's disease burden) का 21 प्रतिशत भारत पर है। लेकिन, देश में चिकित्सा सेवाओं की अपर्याप्तता और चिकित्सा सुविधाओं के महंगा होने कारण बड़ी संख्या में लोगों को चिकित्सा सुलभ नहीं हो पा रही है। देश में रोकथाम योग्य रोगों (Preventable illness) व उनसे होने वाली असामयिक मृत्यु की बढ़ती घटनाओं के कारण ही प्रतिवर्ष 6 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की क्षति हो रही है, जिसका मूल्य 9-10 लाख करोड़ रूपये वार्षिक से भी अधिक है। वस्तुतः चिकित्सा पर सार्वजनिक व्यय आज हमारे घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत से कम है। यह विश्व के अन्य प्रमुख देशों की तुलना में सबसे 5 प्रतिशत के वैश्विक माध्य Global Median से अत्यन्त कम है। इसलिये बड़ी संख्या में रोगियों व उनके परिजनों को ही चिकित्सा लागत का बड़ा भाग वहन करना पड़ता है। परिणामतः विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज देश में ऊँची चिकित्सा लागतों के कारण प्रतिवर्ष 2.2 प्रतिशत लोग निर्धनता रेखा से नीचे जा रहे हैं एवं बड़ी संख्या में परिवार ऋणग्रस्त होते जा रहे हैं।

देश की जन-स्वास्थ्य सांख्यिकी के अनुसार आज देश में जीवन शैली जन्य रोग यथा उच्च रक्त चाप, हृदयावरोध, श्वास रोग, मस्तिष्कगत रक्तस्राव जन्य पक्षाघात, मलाशय का कैंसर, मधुमेह, गठिया, मोटापा, निद्रानाश, स्मृतिनाश, स्वलीनता, नशावृत्ति आदि अनेक रोग व मनोविकार तेजी से बढ़े हैं। देश में प्रतिवर्ष 58 लाख लोगों की मृत्यु हृदय व फेफड़े के रोगों, टाइप 2 के मधुमेह व कैंसर जैसे असंक्रामक रोगों से हो रही हैं, जिनकी रोकथाम संभव है। देश आज विश्व की हृदय रोग, मधुमेह, गठिया आदि की राजधानी कहलाने लगा है। आज देश में 6.13 करोड़ मधुमेह के रोगी है और 11.1 प्रतिशत पुरूषों व 10.8 प्रतिशत महिलाओं में रक्त शर्करा (ब्लड शूगर) अत्यंत बढ़ी हुयी है। भारत में उच्च रक्त शर्करा वाले लोगों का यह अनुपात पड़ौसी देशों श्रीलंका, बांग्लादेश व नेपाल आदि से भी उच्च है। हृदय रोग तो आज देश में महामारी की सीमा तक बढ़ता जा रहा है।

देश की अधिकांश चिकित्सा सुविधायें, चिकित्सकों की उपलब्धता एवं विशेषज्ञों की सुलभता आदि बड़े नगरों में ही केन्द्रित हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में उपलब्ध सुविधाओं का भी सुचारू संचालन नहीं होने से देश के अधिकांश क्षेत्रों में प्रभावी चिकित्सा की यथेष्ट सुलभता नहीं है। इसलिये नगरीय क्षेत्र में लगभग 70 प्रतिशत व ग्रामीण क्षेत्र के 63 प्रतिशत लोगों को चिकित्सा हेतु निजी क्षेत्र पर निर्भर रहना पड़ता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 53 प्रतिशत लोग सार्वजनिक क्षेत्र की चिकित्सा सेवाओं से असन्तोष के कारण निजी क्षेत्र की सेवाओं का उपयोग करने को बाध्य होते हैं। विगत दस वर्षों में औसत चिकित्सालयीन व्यय (average hospitalization costs) लगभग 3 गुनी हुयी है। यह प्रचलित मुद्रास्फीति से कहीं अधिक है।

चिकित्सा लागत में वृद्धि का एक महत्वपूर्ण कारण, आवश्यक दवाओं में कीमत नियंत्रण का अभाव है। पिछली सरकार के शासनकाल में आवश्यक दवाओं की कीमतों में नियंत्रण को निष्प्रभावी बना दिया गया था। स्वदेशी जागरण मंच की यह राष्ट्रीय परिषद सरकार से मांग करती है कि आवश्यक दवाओं में लागत आधारित की कीमत नीति को बिना देरी लागू करे। एक ओर सरकारी खर्च में कमी से स्वास्थ्य सेवाओं में निजीकरण के कारण चिकित्सा लागत बढ़ी है, तो दूसरी ओर सरकारी नीतियों पर विदेशी कंपनियों के प्रभाव के कारण, अनावश्यक टीकाकरण को बढ़ावा मिला है, जिससे आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं में कटौती हो रही है।

देश में प्रति हजार जनसंख्या पर सार्वजनिक क्षेत्र में 1 शैय्या की उपलब्धता भी नहीं है। श्रीलंका में प्रति हजार जनसंख्या पर सार्वजनिक क्षेत्र में 3.1 चिकित्सालय शायिकायें (hospital beds) हैं, चीन में 3, थाईलैण्ड में 2.2, ब्राजील में 2.4, अमेरिका में 3.1 इंग्लैण्ड में 3.9 है। भारत में यह मात्र 0.95 है जो विश्व के प्रमुख देशों में न्यूनतम है। इस संबंध में विश्व औसत 2.9 है। देश में प्रति दस हजार जनसंख्या पर 7 ऐलोपेथी चिकित्सक ही उपलब्ध है। कुछ राज्यों में तो प्रति चिकित्सक रोगी अनुपात 27 से 28 हजार तक आता है। यथा महाराष्ट्र में प्रति चिकित्सक रोगी अनुपात 27,790 व बिहार में 28,391 है। देश में पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों का भी व्यापक चलन है। इसलिये प्रभावी स्वास्थ्य व चिकित्सा व्यवस्था की दृष्टि से सभी चिकित्सा प्रणालियाँ का समेकित व समन्वित विकास आवश्यक है।

वर्ष 2005 में पेटेंट कानून में परिवर्तन से अब 1995 के बाद की आविष्कृत औषधियाँ उत्पाद पैटेंट प्रावधानों के कारण अत्यंत महंगी होती जा रही है। हमारे पेटेंट कानून का पुनः मानवोचित सिद्धान्तों के अनुरूप संशोधित किया जाना चाहिये। महंगी दवाओं के उत्पादन हेतु स्वतः अनिवार्य अनुज्ञापन के प्रावधान किये जाने चाहिये। साथ ही जेनेरिक औषधियों को प्रोत्साहन, उनके प्रभावी मूल्य नियंत्रण व उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने हेतु नियमित परीक्षण की आवश्यक है। वर्ष 2004 तक उत्पाद पेटेंट के स्थान पर प्रक्रिया पेटेंट के प्रावधान होने से ही देश विश्व की फार्मेसी कहलाता है।

स्वदेशी जागरण मंच का मानना है कि चिकित्सा के मद पर केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के साथ-साथ चिकित्सा सेवाओं का दूरस्थ व ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तार किया जाना एवं उनका वहाँ सुचारू संचालन आवश्यक है। महिला स्वास्थ्य, शिशु व जननी स्वास्थ्य व वरिष्ठजनों सहित सभी वर्गों को सब प्रकार की स्वास्थ्य सेवाएँ न्यायपूर्वक एवं सहजता से उनके निकटतम स्थान पर सुलभ होनी चाहिये। साथ ही देश में सभी प्रकार के चिकित्सा उपकरण, विविध प्रत्यारोपित की जाने वाली चिकित्सा सामग्रियों व उपभोग में आने वाली सामग्रियों के मूल्य बहुत ऊँचे हैं। चिकित्सा हेतु उनके भारी व विभेदकारी मूल्य और जाँचों की ऊँची लागतें भी नियंत्रित की जानी आवश्यक हैं। मंच सरकार से आग्रह करता है कि सभी प्रणालियों की औषधियों के प्रमापीकरण, गुणवत्ता परीक्षण मूल्य नियंत्रण एवं सर्वसुलभता के लिये उचित वैधानिक, नीतिगत, प्रक्रियागत एवं नियामक व्यवस्थागत सुधार व उनमें पारदर्शिता लानी आवश्यक है।

समर्थ, सक्षम व समृद्ध भारत के निर्माण हेतु सभी नागरिकों का निरामय होना आवश्यक है। इस हेतु जहाँ एक ओर प्रत्येक व्यक्ति को स्वास्थ्यप्रद आहार-विहार व जीवन शैली अपनाने पर ध्यान देना चाहिये वहीं आवश्यकता पड़ने पर प्रत्येक नागरिक को समुचित उपचार सहजता से निःशुल्क व न्यायपूर्वक या उसके द्वारा वहन करने योग्य शुल्क पर सुलभ होना चाहिये।