Resolution-4 (Madurai Sammelan)-H

13वां राष्ट्रीय सम्मेलन, 18,19,20 जनवरी 2019 (मदुरै, तमिलनाडू)

प्रस्ताव-4
स्वदेशी विकास माॅडल ही समाधान

आज भारत चीन को भी पछाड़ते हुए दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन चुका है, और हमारी जीडीपी (विनिमय दर के अनुसार) 2.8 खरब डालर हो जाने के बाद भारत दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। क्रयषक्ति क्षमता के आधार पर तो हमारी जीडीपी 9.4 खरब डालर हो जाने के फलस्वरूप भारत, अमरीका और चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है।

लेकिन इन सबके बावजूद आज भी भारत एक ऐसा देष है, जहां भूख से पीड़ित दुनिया के सबसे ज्यादा लोग रहते हंै। पिछले वर्ष ही श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार हमारी बेरोजगारी 2017 में 183 लाख से बढ़ती हुई 2018 तक 186 लाख हो गई। यूपीए शासन के दौरान औद्योगिक उत्पादन सूचकांक जो स्थिर हो गया था या घट रहा था, पिछले चार वर्षों से लगातार बढ़ने लगा है। उसके बावजूद बेरोजगारी की दर या तो स्थिर है अथवा थोड़ी बढ़ी है।

चाहे जीडीपी के प्रतिशत के रूप में राजकोषीय घाटा हो अथवा विदेशी भुगतान घाटा, लगभग सभी आर्थिक संकेतक नियंत्रण में है। भारतीय रूपया जो तेल की कीमतों के बढ़ने के कारण कुछ कमजोर जरूर हुआ था, अब फिर से मजबूती पकड़ने लगा है। वर्तमान सरकार के शासन में पूर्व के 10 सालों के यूपीए शासन के भ्रष्टाचार पर लगाम भी लगी है। इस बारे में भी संदेह नहीं है। लेकिन इसके बावजूद भी गरीबी, असमानताओं और बेरोजगारी पर निर्णायक असर दिखाई नहीं दे रहा।

स्वदेशी जागरण मंच की स्पष्ट मान्यता है कि देश से गरीबी दूर करने, गांवों की हालत सुधारने, असमानताओं को हटाने और बेरोजगारी समाप्त करने के लिए विकास के बारे में सोच में आमूलचूल परिवर्तन लाना जरूरी है। आज विदेशी निवेश पर निर्भर करते हुए जीडीपी बढ़ाने के विकास माॅडल के चलते गरीबी और बेरोजगारी इसलिए दूर नहीं हो पा रही, क्योंकि यह रोजगारहीन विकास का माॅडल है, जिससे जीडीपी बढ़ने के बावजूद उसके लाभ मजदूरों और गरीबों तक नहीं पहुंच पा रहे।

साथ ही साथ यह माॅडल पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर विचार नहीं करता। बढ़ते शहरीकरण, जल, वायु, मृदा सहित सभी प्रकार के पर्यावरण प्रदूषण और प्रकृति के शोषण और उस सबके कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन और वैश्विक उष्णता का विषय जीडीपी आधारित विकास माॅडल के संज्ञान में नहीं रहता।

भारत में ही नहीं, दुनिया भर में विकास के इस विकृत माॅडल के चलते दुनिया भर में असमानतायें बढ़ रही हैं, रोजगार का क्षरण हो रहा है।

स्वदेशी जागरण मंच की स्पष्ट मान्यता है कि विकास का स्वदेशी माॅडल, जिसमें विदेशी निवेश पर निर्भरता न्यूनतम हो, जिसमें अपने लघु उद्योगों का संरक्षण हो, जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खासतौर पर किसान की अनदेेखी न हो, जिसमें उत्पादन के साथ-साथ रोजगार, समानता और विकेंद्रीकरण पर ध्यान हो, वही हमारे रोजगार, गरीबों के कल्याण और सभी क्षेत्रों के विकास की आधारभूत शर्त है।

पिछले लगभग 25 सालों से ज्यादा समय से भूमंडलीकरण और उदारीकरण के नाम पर जिस प्रकार से आयातों को मुक्त रूप से आने देने की नीति ने हमारा व्यापार घाटा और भुगतान घाटा भारी रूप में बढ़ा दिया है। इस घाटे के कारण विदेशी निवेश पर हमारी निर्भरता भयंकर रूप से बढ़ गई है। विदेशी भुगतान की समस्या के चलते विदेशी कर्ज भी बढ़े और हमारे रूपये का भी भारी अवमूल्यन देखने को मिला। रूपये के अवमूल्यन ने हमारे भुगतान घाटे को ओर अधिक बढ़ाने का काम किया।

आज आवश्यकता इस बात की है कि चीन और शेष विश्व से आयातों की बाढ़ आने के कारण जो व्यापार घाटा बढ़ा है, उसे नियंत्रित किया जाये। पिछले एक वर्ष में सरकार ने जो इलैक्ट्रानिक, टेलीकाॅम, वस्त्र और गैर जरूरी आयातों पर आयात शुल्क बढ़ाया गया है, जो स्वागत योग्य है। उसके अपेक्षित परिणाम मिल रहे है, यहीं नहीं सरकार द्वारा एंटी डंपिंग डयूटी और मानक लगाकर भी आयातों को रोकने का प्रयास हुआ है। इस कार्य को और आगे बढ़ाने की जरूरत है।

विदेशी निवेश के कारण भारत से रायॅल्टी, ब्याज, डिविडेेंट, वेतन, टेक्नीकल फीस आदि के नाम पर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा का बर्हिगमन हो रहा है, जो हमारे रूपये को और कमजोर कर रहा है। इसलिए विदेशी निवेश और आयातों पर अपनी निर्भरता को कम करने की जरूरत है। आयात कम करते हुए घरेलू उत्पाद द्वारा उनकी पूर्ति करने से मैन्यूफेक्चिरिंग क्षेत्र में रोजगार को बढ़ाया जा सकता है। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्र में मत्स्यन, मुर्गी पालन, पशु पालन, मशरूम उत्पादन, फल-सब्जी उत्पादन, बांस और उसके उत्पाद, खाद प्रसंस्करण द्वारा रोजगार के अवसरों को बड़ी मात्रा में बढ़ाया जा सकता है।

मोदी सरकार द्वारा मुद्रा योजना, जनधन, स्टार्ट-अप, कौशल विकास इत्यादि के माध्यम से रोजगार के नये अवसर जुटाये जा रहे है। गरीबों, विशेषतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली, आवास, कुकिंग गैस, शौचालय आदि के माध्यम से उनके जीवन स्तर को सुधारने की कोशिश तो हुई है, साथ ही साथ किसानों की आमदनी को दुगना करने हेतु न्यूनतम समर्थन मूल्य, गांवों में रोजगार वृद्धि, बीज, खाद और प्रौद्योगिकी पहुंच बढ़ाकर विपणन में सुधार आदि भी सराहनीय कदम है। लेकिन ये प्रयास सराहनीय होने के बावजूद पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ नीति नियंताओं को विकास के बारे में अपनी सोच को बदलना होगा और इस मानसिकता से बाहर आना होगा कि विकास विदेशी पूंजी और संसाधानों से ही हो सकता है। हमें विकास के मानको को बदलना होगा। स्वदेशी जागरण मंच का मानना है कि जीडीपी विकास का मानक नहीं हो सकता, हमें समझना होगा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, जंगल के अनुपात में वृद्धि, मृदा का संवर्धन, स्वास्थ्य, रोजगार निर्माण, प्रदूषण में कमी, सभी विकास के मानकों में शामिल होने चाहिए।

स्वदेशी जागरण मंच का यह राष्ट्रीय सम्मेलन सरकार से आह्वान करता है कि -
1. विकास की किसी भी नीति निर्माण अथवा उसमें बदलाव से पहले इस पर विचार हो कि क्या वह नीति रोजगार, गरीब, विकेंद्रीकरण और पर्यावरण के लिए उचित है, अथवा नहीं।
2. आज जब भूमंडलीकरण के नाम पर अपनाई गई नीतियों के चलते ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की प्रति व्यक्ति आय में 12.3 गुणा का अंतर हो चुका है, सरकार बजटीय प्रावधान करते हुए किसानों और गांवों की हालत सुधारने के लिए काम करें।
3. लघु और कुटीर उद्योगों में विकास को केंद्र में रखते हुए राष्ट्रीय मैन्यूफेक्चरिंग नीति बनाई जाए। बड़े उद्योगों, विशेषतौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हित साधन करने वाली नीतियों से बचा जाए। एमएसएमइ्र की परिभाषा में बदलाव करने वाले विधेयक को वापिस लिया जाए। लघु उद्योगों तथा लघु व्यवसायों को तहस-नहस करने वाली ई-काॅमर्स कंपनियों को प्रतिबंधित किया जाए। लघु उद्योगों के लिए उत्पादों को आरक्षित करने की नीति वापिस लाई जाए। सरकारी खरीद में लघु उद्योगों को प्राथमिकता की नीति को कड़ाई से लागू किया जाए। विकेंद्रित खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए।
4. विकेंद्रित विकास को बढ़ावा दिया जाए।