Thiruvantharam Resolution-1 (Hindi)

जनसुविधाएं उपलब्ध कराने के दायित्व से न बचे सरकार (प्रस्ताव-1)

स्वदेशी जागरण मंच शिक्षा, स्वास्थ्य, पेय जल, बिजली और यातायात जैसी जनसुविधाओं की बढ़ती हुई कीमत के कारण गरीब जनता को हो रही असुविधा से बहुत चिंतित है। उदारीकरण के नाम पर सरकार न केवल इन क्षेत्रों को निजी क्षेत्र में लाभ कमाने के लिए खोल रही है, अपितु अपने मूल दायित्व से भी मुंह मोड़ रही है।


भारत जैसे विकासशील देश में आवश्यक जनसुविधाओं को बाजार के हवाले करना अपराध सरीखा है। इसी कारण से यह एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बनता जा रहा है, जैसा कि हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। यह सत्य है कि सर्वशिक्षा, व्यापक स्वास्थ्य सेवा, पेय जल तथा यातायात के बढ़ते हुए खर्चे को वहन करना केवल सरकार के ही बूते की बात है। निजी क्षेत्र की सहभागिता आवश्यक प्रतीत होती है, किन्तु यह सहभागिता पारदर्शी तथा शोषण मुक्त होना चाहिए।


शिक्षा तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनियन्त्रित निजीकरण, आमजन के लिए अभिशाप बना हुआ है। निजी क्षेत्र के लोग सरकार से सस्ती जमीन, रियायती दरों पर अन्य सुविधाएं प्राप्त तो करती है, परन्तु उपभोक्ता को मनमानी कीमत पर यही सुविधाएं उपलब्ध कराती है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह समान शिक्षा के अवसर सारे देश को उपलब्ध कराए। किन्तु जानकार लोगों द्वारा प्रस्तुत रपटों में स्पष्ट रूप से रेखांकित हो रहा है कि निजी शिक्षा संस्थान ऊंची फीस लेकर भी स्तरीय शिक्षा देने में असमर्थ रही हैं। दूसरी तरफ, सरकारी संस्थानों में भी शिक्षा का स्तर प्रतिदिन गिरता जा रहा है, जिसके कारण बाजारी ताकतों को शोषण के लिए अवसर उपलब्ध हो जाते है। दुर्भाग्य से ये शिक्षा संस्थान प्रमाण पत्र धारक असमर्थ नौजवानों की फौज उपजा रहे हैं। शिक्षा क्षेत्र में इस मुनाफाखोरी की छूट ने विदेशी शिक्षा संस्थानों को भी भारत की ओर असमान्य रूप से आकर्षित किया है। वे भारत में आने के लिए लालायित है और अपनी सरकारों के माध्यम से भारत सरकार पर दबाव बना रहे हैं।


सरकार का यह प्राथमिक दायित्व है कि लोगों को उच्चस्तरीय शिक्षा शोषण मुक्त व्यवस्था से उपलब्ध कराएं। ऐसी व्यवस्था के अभाव में विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को अच्छी शिक्षा से वंचित रखा जा रहा है। सरकारी स्कूलों में योग्य शिक्षक शौचालय, स्वच्छता, प्रयोगशाला तथा पुस्तकालय जैसी आवश्यक सुविधाओं का अभाव है। इसका परिणाम यह हुआ कि असमानताजनक गला-काट प्रतियोगिता में भारतीय विद्यार्थी लगातार पिछड रहे है और बेरोजगारी बढ़ रही है। यह दृश्य विज्ञान एवं तंत्र क्षेत्र में ज्यादा स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।


स्वास्थ्य क्षेत्र का हाल भी इससे भिन्न नहीं है। एक तरफ तो भारत में स्वास्थ्य पर्यटन काफी तेजी से बढ़ रहा है। दूसरी तरफ देश के गरीब बीमारों को निजी अस्पतालों एवं बीमा कंपनियों के अपवित्र गठजोड़ के कुचक्र में पिसना पड़ रहा है। तेजी से फैल रहे पंचतारा अस्पतालों से गरीब जनता तो वंचित है ही, परन्तु अपने जीवन भर की पूंजी को निकट संबंधियों के उपचार के लिए इन अस्पतालों में आनेवाले मजबूर मरीजों को अमानवीय ढंग से लूटा जा रहा है। ऐसी रपटें भी उपलब्ध है कि किसानों की आत्महत्या का एक प्रमुख कारण इलाज तथा शिक्षा के लिए लिया गया कर्ज है। प्रधानमंत्री ने भी अपने वक्तव्य में इसके साथ सहमति जताई है।


जहां कहीं एम्स जैसे अच्छे सरकारी अस्पतालों में थोड़ी बहुतस्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध है, वह भी प्रभावी राजनेता एवं नौकरशाह अपने तथा अपने परिवारों के लिए उपयोग करते हैं। यहां पर भी गरीब जनता को मार झेलनी पड़ती है। ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की दशा तो ओर दयनीय है।


पैसे की कमी के कारण देश के अनेक उच्च संस्थानों में खोज के प्रोजेक्टों को बंद करना पड़ रहा है। विश्वविद्यालय एवं वैज्ञानिक संस्थाओं को आवश्यक धनराशि उपलब्ध नहीं कराने के कारण इन संस्थानों से निकलने वाले खोज पत्रों का स्तर काफी नीचे रह जाता है। सरकार को बिना देर किए स्तरीय खोज को बढ़ावा देने के लिए विदेशी शिक्षा संस्थानों को इजाजत देने से पहले आवश्यक धनराशि उपलब्ध करानी चाहिए, ताकि देश की युवा शक्ति का शोषण रोका जा सके।


स्वच्छ पेय जल की उपलब्धि तो देश की जनता के लिए एक स्वप्न मात्र बनकर रह गया है। दिल्ली जैसे देश की राजधानी में भी मानव विकास सूचकांक के अनुसार मात्र 53 प्रतिशत दिल्लीवासियों को घरों में पानी कुछ समय के लिए ही प्राप्त होता है। राष्ट्रीय स्तर पर तो हालत ओर भी दयनीय है। ऐसे में सरकार पेय जल के वितरण को निजी हाथों में सोफकर जनता के शोषण का नया मार्ग प्रशस्त कर रही है।

सरकारी निजी साझेदारी के तहत बनाए गए मार्गों ने देशवासियों पर एक ओर बोझ लाद दिया है। मनमाने ढंग से टोल टैक्स की दरें तय करके खाने पीने के समान से लेकर व्यक्ति के आने-जाने को महंगा कर दिया गया है।


इस परिप्रेक्ष्य में स्वदेशी जागरण मंच मांग करता है िक-

1. सरकार शिक्षा स्वास्थ्य, पेय जल, बिजली और गैर शोषणकारी यातायात सुविधाएं उपलब्ध कराने की अपनी मौलिक जिम्मेवारी का वहन करते हुए लोगों को, विशेष तौर पर गरीबों को ये सुविधाएं उपलब्ध कराएं।

2. सरकार तथाकथित गरीबों के हितों के नाम पर वास्तव में विदेशी और अन्य कंपनियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से नए-नए कानून बनाने की जिद से बाहर आकर वास्तव में गरीब और वंचितों के हितों की रक्षा के लिए पारदर्शिता के साथ कानून बनाएं।

3. सभी सरकारी निजी साझेदारी परियोजनाआंे की निष्पक्ष जांच कराई जाए और गलतियों के लिए जिम्मेवार लोगों को दंडित किया जाए।

4. सरकारी निजी साझेदारी परियोजनाआंे के संदर्भ में कैग की सिफारिशों का सम्मान करते हुए उन्हंे लागू कराया जाए।

5. सरकारी लीज की शर्तों को न मानने वाली निजी कंपनियों को दी जा रही छूटों को तुरत प्रभाव से वापिस लिया जाए।