Thiruvantharam Resolution-2 (Hindi)

बाली में राष्ट्रीय िहतों से समझौता (प्रस्ताव-2)

बाली (इंडोनेिशया) में संपन्न िवश्व व्यापार संगठन का मंत्री स्तरीय सम्मेलन मंे जो हुआ वह दुःखद था। भारत सरकार ने कृिष तथा व्यापार सुिवधा समझौते सिहत देश के िहतों के साथ िखलवाड़ िकया। सरकार ने यह बदले में कुछ िलए िबना ही करने की िहमाकत की है। सरकार इसको देष के िलए जीत बता रही है। उसका कहना है िक बाली में हुए समझौते के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आ रही दिक्कतों को समाप्त िकया गया है तथा भारत के खाद्य सुरक्षा कानून को समर्थन िमला है।


इस समझौते के अनुसार भारत द्वारा खाद्य सुरक्षा हेतु दी जाने वाली सब्िसडी मान्य 10 प्रितषत की सीमा को लांघने के बाद भी अब चुनौती नहीं दी जायेगी। परन्तु सरकार देषवािसयांे को यह बताने से कतरा रही है िक इस समझौते के अनुसार समझौते की ितिथ (6 दिसंबर 2013) तक खाद्य सुरक्षा उद्देश्य से जो सार्वजिनक भंडारण कार्यक्रम चल रहे हैं या घोिषत कार्यक्रम िजनकी अिधसूचना नहीं हुई है, अब लागू नहीं पायेंगे। यही नहीं इस समझौते में खाद्य सुरक्षा के िलए परंपरागत खाद्यान्नों को ही शािमल िकया गया है। लेिकन यिद भिवष्य में खान-पान की आदतें बदलती हैं, तो नए प्रकार के खाद्य पदार्थों को उस खाद्य सुरक्षा के प्रावधानों में शािमल नहीं िकया जा सकेगा। यही नहीं यह समझौता इस प्रकार से बना है िक यिद अनजाने में भी सब्िसडी प्राप्त खाद्यान्न िनर्यात बाजार में चले जाते हैं, तो भी उसको िववािदत माना जाएगा।


समझौते के प्रारंभ से ही वािणज्य मंत्री आनंद शर्मा सख्त रवैया लेते हुए घोषणा कर रहे थे िक शांित धारा (पीस़ क्लाॅज) भारत को मान्य नहीं है। 5 िदसंबर को सम्मेलन स्थल पर उन्होंने भारत की खाद्य सुरक्षा को अिवचारणीय बताया। उन्होंने यह भी कहा िक िवष्व व्यापार संगठन के वर्तमान कानून गैर बराबरी और शोषण करने वाले हैं तथा िवकासषील देषों के प्रित भेदभावपूर्ण है। उन्होंने 1986-88 की कीमतों को आधार वर्ष मानने को भी दोषपूर्ण बताया। 1988 के बाद खाद्यान्नों की कीमतों में बेतहाषा वृद्िध हुई है। अतः िवष्व व्यापार संगठन के िनयमों में संषोधन करने की आवष्यकता है।


लेिकन 5 िदसम्बर की रात को कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए िक भारत के रूख में नरमी आ गई और भारत ने तमाम तर्कों को दरिकनार कर िदया और समझौते का अंितम ड्राफ्ट तैयार हो गया और वह घोिषत हो गया।


समझौते का जो अंितम मसौदा तैयार हुआ है, उसके अनुसार शांित धारा में पारदर्िशता का प्रावधान लागू िकया गया है, िजसके अनुसार भारत सिहत सभी िवकासशील देशों को अपनी सार्वजिनक भंडारण पर सब्िसडी के बारे में तमाम सब्िसडी के बारे में सम्पूर्ण जानकारी डब्ल्यू.टी.ओ. को देनी होगी और डब्ल्यू.टी.ओ. की कृिष कमेटी उस जानकारी का मुआयना करेगी। इस प्रावधान का मतलब यह था िक, इस दौरान भारत को हर वर्ष डब्ल्यू.टी.ओ. के समझ अपने समस्त खाद्य सुरक्षा खर्च की मात्रा, संरचना और उसके िलए एजेंिसयों का ब्यौरा देना होगा और यह स्वीकार भी करना होगा िक वे िनयमानुसार सब्िसडी की सीमा से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। यही नहीं अन्य सदस्य देश भारत के कार्यक्रमों का िनरीक्षण कर सकेंगे (यािन गलती पाए जाने पर उसे िववाद में घसीटा जा सकेगा)। देश के अंदरूनी मामलों में इस प्रकार की िवदेशी नजर और हस्तक्षेप संम्प्रभुता के क्षरण का द्योतक है।


गौरतलब है िक यह समझौता (कृिष पर समझौते) पर लागू है, सब्िसड़ी एवं प्रितषोधात्मक उपाय समझौते पर नहीं। िजसके कारण गैरइरादतन ही सही, तय सीमा को पार करने का, िनर्यात को प्रभािवत करने का आरोप लगाकर इसे इसे िववािदत घोिषत िकया जा सकता है।


िपछले छः सम्मेलनों से दोहा िवकास वार्ताओं की आशा बनी हुई थी, िजसके अनुसार डब्ल्यू.टी.ओ. में हुए अभी तक के समझौतों में िवकासशील देशों को जो असमान व्यवहार िमल रहा था और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में उन्हें नुकसान झेलना पड़ रहा था, उसका िनराकरण हो सकेगा। लेिकन इस समझौते के बाद अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सुिवधा का जो समझौता िकया गया है, उसके अनुसार अब आगामी वार्ताओं को दोहा चक्र से लगभग बाहर कर दिया गया है, जिसके चलते अमरीका और यूरोप के देश अब अपने मन मुताबित दोहा चक्र को समाप्त करवाते हुए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में नए मुद्दें शािमल करवाने में सफल हो जायेंगे।


बाली में िजस व्यापार सुिवधा के समझौते को अंितम रूप से मान्य िकया गया है, वह वास्तव में िवकिसत देशों से आने वाले साजोसमान के िलए तमाम प्रकार की सुिवधाओं का समझौता है। इसका मतलब यह है िक अब बंदरगाहों पर प्रक्रियाओं को कम करना होगा, िजससे अमीर देशों से आने वाले आयात सुविधापूर्वक भारत में प्रवेश कर सकें। गौरतलब है िक भारत में आज अंतर्राष्ट्रीय व्यापार घाटा जीडीपी के 10 प्रतिशत से ज्यादा पहुंच चुका है, िजसके चलते हमें भुगतान संकट से जूझना पड़ रहा है और रूपया िदन-प्रितिदन कमजोर होता जा रहा है। अमीर मुल्कों से आने वाले आयातों को तमाम सुविधायें देने से भारत में आयातों की बाढ़ आ सकती है, िजसके कारण भुगतान संकट और ज्यादा गहरा सकता है।


यही नहीं भारत समेत विकासशील देशों के लिए यह सुविधायें प्रदान करने के लिए तमाम प्रकार के ढ़ांचागत निवेश की जरूरत होगी, जिस पर अब भारी खर्च करना पड़ेगा। आज जब भारत समेत विकासशील देश अपने लोगों को बुनियादी सुविधायें भी नहीं दे पा रहे हैं, अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा इस समझौते को लागू करने के लिए खर्च करना पड़ेगा।


इस ड्राफ्ट (अंतिम फैसले) को जिसे भारत सरकार जीत का नाम दे रही है, वह वास्तव में भारत की हार है। जिस बात को जीत के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह है कि सब्सिडी संबंधी विवादों का अब स्थायी हल निकलने जा रहा है, वह है कि अब स्थायी हल निकलने तक भारत की खाद्यान्न भंडारण को विकसित देश चुनौती नहीं देंगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि अभी तक इस बाबत किसी देश ने भारत के खिलाफ कोई भी विवाद डब्ल्यू.टी.ओ. में डाला नहीं है। भविष्य में भी विकसित देशों के रूख के चलते इस बाबत कोई आशंका नहीं देखी जा रही थी।
यह समझौता वास्तव में खाद्यान्नों के आयात को बढ़ावा देगा और भारत के किसानों के हितों पर भीषण आघात करेगा। स्वदेषी जागरण मंच देष की संभ्रान्त जनता से अनुरोध करती है कि वे इस समझौते के कारण हुई हानि को समझे तथा वर्तमान यूपीए सरकार की घुटना टैक नीित का खुलकर िवरोध करे। स्वदेषी जागरण मंच को 11वां अिखल भारतीय सम्मेलन मांग करता है िक -

1. भारत सरकार बाली समझौते पर एक व्यापक दस्तावेज प्रस्तुत करे तथा देष को होने वाली हािन का बयौरा भी जनता के सामने रखे।

2. देशवािसयों से आह्वान िकया जाता है िक यिद सरकार ऐसा करने में िवफल रहती है तो एक व्यापक जनमत को प्रकट करके इस सरकार की गलत नीितयों का प्रखर विरोध करे।

3. जनता से यह भी आह्वान किया जाता है कि वे जागरूक रखकर लोकसभा चुनाव के बाद आने वाली सरकार पर इतना दबाव बनाए रखे िक वह देषिहतांे की तथा देष की संप्रभुता की रक्षा करना सुिनष्िचत करे।