Thiruvantharam Resolution-3 (Hindi)

आने वाली पीढि़यों के लिए पर्यावरण की रक्षा (प्रस्ताव-3)

पश्चिमी घाट भारतीय तटवर्तीय क्षेत्र के पश्चिमी तट से लगे पहाड़़ी कडि़यों को कहते हैं। यह उत्तर से गुजरात में ताप्ती नदी से शुरू होकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक जाती है जो 1600 किमी. तक है। यह 6 राज्यांें को छुती है जिनमें गुंजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडू शामिल हैं।


पश्चिमी घाट अपने घने जंगलों और शानदार जैव विविधता के कारण पूरे विश्व में जाना जाता है। विश्व के 34 सबसे अच्छे जैव विविधता वाले स्थानों में यह है तथा इनमंे भी 8 शानदार स्थानांें में यह है।


अपने घने जंगलों और मानसून के समय भारी वर्षा वाले स्थान होने के कारण दक्षिण भारत के लगभग सभी नदियां जैसे कृष्णा, गंगा, भाद्रा, कावेरी, पेरियार, सावरवती, काली, अघनशीनि आदि का यह उद्गम स्थल है तथा दक्षिण भारत को यह कृषि, उ़द्योग, ऊर्जा उत्सर्जन तथा दिन प्रति दिन की आवश्यकताओं के लिए जल मुहैया कराता है। दरअसल समुचे दक्षिण भारत की संपूर्ण अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और संस्कृति पश्चिम घाट के पर्यावरणीय स्वास्थ्य पर निर्भर करती है।


स्वतंत्रता के बाद पिछले 60 वर्षों में पश्चिमी घाट को विकास के नाम पर जैसे खनन, प्रदृषित औद्योगिक इकाईयों, हाइड्रो-इलैक्ट्रीकल और थर्मल ऊर्जा इकाईयों के द्वारा बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया गया है।


भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने मार्च 2010 में पश्चिमी घाट को बचाने के लिए विश्व के नामी पर्यावरणविद डाॅ. माधव गाडगिल, जो भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलौर के पर्यावरण अध्ययन केन्द्र के अध्यक्ष भी थे, के नेतृत्व में पश्चिमी घाट विशेषज्ञ समिति बनायी। इस समिति ने 2011 में अपनी रिपोर्ट दी। इस समिति ने बताया कि समूचे पश्चिमी घाट को पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र समझा जाना चाहिए। हालांकि विशेष क्षेत्रों के पर्यावरणीय संवेदनशीलता को अलग-अलग बांटते हुए समिति ने पूरे पश्चिमी घाट को पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र 1, 2 और 3 वर्र्गों में बांटा तथा इने बचाव के सुझाव दिया।


हालांकि केन्द्र सरकार ने खनन कंपनियों, रियल स्टेट लाॅबी, टिम्बर लाॅबी एवं अन्य काॅरपोरेट क्षेत्रों क दबाव में माधव गाडगिल रिपोर्ट को अस्वीकार कर डाॅ. कस्तुरी रंगन, जो पूर्व मंें इसरो के अध्यक्ष रहे हैं तथा वर्तमान में योजना आयोग के सदस्य हैं, के नेतृत्व में एक उच्च लेवल का कार्यदल बना दी जिसका काम माधव गाडगिल की रिपोर्ट पर विचार करना था। कस्तुरी रंगन समिति की रिपोर्ट ने माधव गाडगिल की रिपोर्ट को प्रभावहीन कर दिया। इसने पश्चिमी घाट को दो वर्गांे में सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक में बांटा। पश्चिम घाट के 63 प्रतिशत भाग को इसने सांस्कृतिक भाग माना जहां जनसंख्या घनत्व बहुत ही आधिक तथा जंगल के क्षेत्र कम थे। रिपोर्ट के अनुसार इसके बचाव की कोई जरूरत नहीं है। पश्चिमी घाट का 60,000 किमी यानि 37 प्रतिशत क्षेत्र को प्राकृतिक क्षेत्र माना गया है जहां जनसंख्या घनत्व कम तथा जंगल के क्षेत्र अधिक हैं। प्राकृतिक क्षेत्र को मजबूत बचाव तंत्र को जरूरत है। इस क्षेत्र मंें कर्नाटक के 1526 गांव तथा केरल क 126 गांव हैं।


आजकल बालू खनन और अन्य खनन गतिविधियां इस क्षेत्र में प्रतिबंधित है। 47 रेड कैटेगिरी के उद्योग भी प्रतिबंधित हैं। इस क्षेत्र के गांवों में बड़े निर्माण की गतिविधियां जैसे बिल्डिंग काॅम्पलेक्स और टाऊनशिप प्रतिबंधित है। इस रिपोर्ट के बाद केरल से जबरदस्त विरोध हुआ। सरकार और विपक्ष दोनों गठबंधनों के दलों ने कस्तुरी रंगन रिपोर्ट को यह कहकर विरोध कर रही है कि इससे प्राकृतिक क्षेत्र के गांवों का विकास प्रभावित होगा। अगर अन्य राज्य सरकारांे का भी यही रवैया रहा तो इस रिपोर्ट को लागू करना संभव नहीं होगा।


स्वदेशी जागरण मंच हमेशा विनाशकारी विकास के खिलाफ हमेशा खड़ा रहता है। यह हमेशा पर्यावरणीय सतत विकास का हिमायती रहा है। अतः तिरूवनंतपुरम का यह स्वदेशी जागरण मंच का सम्मेलन मांग करता है कि कस्तुरी रंगन समिति की रिपोर्ट को वापिस लिया जाए ओर माधव गाडगिल की रिपोर्ट को लागू किया जाए ताकि पश्चिमी घाट के पर्यावरण की रक्षा हो सके और इस क्षेत्र का जैव विविधता की रक्षा हो सके जिससे यह क्षेत्र सतत विकास करे और भारतवर्ष क लिए फायदेमंद हो सके।