Thiruvantharam Resolution-4 (Hindi)

नीित बदलो - देष बचाओ (प्रस्ताव-4)

पोखरण आण्विक विस्फोटों के बाद लगी वैश्विक पाबंदियों के दुष्प्रभावों पर मात देकर भारतीय अर्थव्यवस्था वर्ष 2001-02 से ऊंचाईयों की ओर अग्रसर रही और इसने विश्व को आष्चर्य एवं सदमे मंे डाल दिया। राष्ट्रीय बचत और निवेष बढ़ने लगा। इसके परिणामस्वरूप सकल घरेलू उत्पाद संवृद्धि दर वर्ष 2003-04 मंे 8 प्रतिषत पर पहुंच गयी। वर्ष 1977-78 के बाद पहली बार वर्ष 2001-02 और 2003-04 के बीच भारत ने चालू खाते में आधिक्य दर्ज किया। 3 वर्षों मंे यह आधिक्य कुल 22 बिलियन डाॅलर रहा। मौटे तौर पर यह लक्ष्य घरेलू बचत, निवेश और खपत के माध्यम से हासिल किया गया। भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की एकमेव ऐसी उभरती अर्थव्यवस्था रही, जिसने बिना किसी उल्लेखनीय विदेशी निवेश के इतनी ऊंची वृद्धि दर प्राप्त की।


वर्ष 2004-05 से स्थितियां बदल गयीं। अर्थव्यवस्था के लिए आंतरिकता के नजरिए के स्थान पर दृष्टि बाह्यवर्ती हो गयी। नई सरकार ने छोटी अवधि की स्टाॅक माॅर्केट पूंजी की ओर देखना आरंभ कर दिया, क्योंकि वैश्विक तरलता और पूंजी आयात बड़े पैमाने पर उपलब्ध था। इसने सरकार को अंधा बना दिया और वह अधिकाधिक आयात उदारीकरण के पीछे भागने लगी। इसके दुष्परिणाम 2008-09 के बाद तब सामने आए जब वैश्विक तरलता मंे शुष्कता आने लगी। 2004-05 से 2012-13 तक के चालू खाते का विश्लेषण दर्शाता है कि 2001-02 - 2003-04 के बीच का 22 बिलियन डाॅलर्स का आधिक्य, उसके बाद के 9 वर्षों में 339 बिलियन डाॅलर के चालू खाता घाटे में रूपान्तिरित हो गया। चालू खाते का घाटा फोरेक्स रिजर्व को खा गया और जो रूपया अगस्त 2012 में 45 रूपए प्रति डाॅलर था, वह अगस्त 2013 में औंधे गिरकर 68 रूपए प्रति डाॅलर हो गया। सरकार ने इसका दोष तेल मूल्यों और तेल तथा सोने के भारी आयात पर मढ़ना आरंभ कर दिया किन्तु 2004-05 के दौरान किये गए आयात का विश्लेषण दर्शाता है कि सरकार झूठ बोल रही है। इन 9 वर्षों में तेल का शुद्ध आयात और स्वर्ण आयात क्रमशः 815 बिलियन और 161 बिलियन डाॅलर था किन्तु एक वर्ष पूर्व औसतन 10 बिलियन डाॅलर्स की तुलना में इन वर्षांे में पूंजीगत वस्तुओं का आयात 587 बिलियन डाॅलर का रहा, जिसने भारतीय पूंजीगत वस्तु उद्योग को नष्ट कर दिया। वह 2011-12 में 10 प्र्रतिशत गिर गया। इसने मेन्युफेक्चेरिंग को 2007-08 के बाद 11 प्रतिषत के स्तर से गिराकर 4.5 प्रतिशत पर ला दिया। पूंजीगत वस्तुओं का आयात शून्य नेट आयात शुल्क की रियायती दर पर किया गया। 9 वर्षों की अवधि में जो कर रियायत दी गई वह 30 लाख थी। इसकी कीमत वर्ष 2007-08 तक 10 लाख करोड़ और 2008-09 से 2012-13 के बीच 20 लाख करोड़ रही। इस कर-रियायत के फलस्वरूप 9 वर्षों में 23 लाख करोड़ का मौद्रिक घाटा हुआ। इसलिए यह आर्थिक विध्वंस की अवधि रही। रूपए के मूल्य में गिरावट से पेट्रोल की कीमतें बढ़ गयीं और रूपए का मूल्य 45 रूपए प्रति डाॅलर से घटकर 62 रूपए प्रति डाॅलर हो जाने के कारण तेल का बिल 1,87,000 करोड़ रूपए बढ़ गया। इसका परिणाम भारी मुद्राप्रसार के रूप में हुआ। अनिवासी भारतीयांे ने अपने परिवारों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पिछले 9 वर्षों में 337 बिलियन डाॅलर्स भारत न भेजे होते तो भारत दिवालिया हो चुका होता। पिछले 9 वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था के घोर कुप्रबंध का उदाहरण हैं और इसके लिए जनता को चाहिए कि वह यूपीए सरकार को जवाबदेह माने।

1. अर्थव्यवस्था के आपराधिक कुप्रबंध के लिये यूपीए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए स्वदेशी जागरण मंच मांग करता है कि अंधाधुंध कर रियायती आयात की जांच की जाए, जिसने रूपए को आंेधे मुंह गिरा दिया, मुद्रा प्रसार बढ़ाया और अर्थव्यवस्था मंे संवृद्धि को बिगाड़ दिया।


2. आयात के लिए दी गई कर रियायतें वापिस ली जाएं और आयात दरांे को 2003-04 के स्तर पर लाया जाए।


3. वर्तमान सरकार की नीतियां सत्ता में आनेवाली सभी भावी सरकारों के लिए चेतावनी हैं कि वे अंधाधुंध कर रियायतों पर आधारित आयात उदारीकरण अपनाने से बाज आएं, बल्कि वे घरेलू पूंजीगत वस्तुओं के समुचित उत्पादन एवं घरेलू मेन्युफेक्चरिंग को बढ़ावा देने की नीतियां अपनाएं।


4. वर्तमान सरकार की स्टाॅक मार्केट और छोटी अवधि के कर्जांे के साथ विदेशी पूंजी के माध्यम से अंधाधुंध आयात ने भारतीय अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है तथा स्वदेशी जागरण मंच भावी सरकारों को चेतावनी देता है कि वे इस प्रकार की गैरजिम्मेदाराना आर्थिक नीतियां अपनाने से बाज आएं।


5. बजट दस्तावेजों में गंवाये गये राजस्व के रूप में वर्णित सभी कर रियायतों की समीक्षा की जाए, राजस्व एवं मौद्रिक घाटों को कम करने के लिए उन्हें वापिस लिया जाए और अधोसंरचना एवं अन्य विकास कार्यों के लिए संसाधनांे को जुटाया जाए।


6. जो भी सरकार सत्ता में आए वह घरेलू बचत, पूंजी निर्माण, मैन्यूफैक्चर के लिए कार्य करे, न कि संवृद्धि के लिए विदेशी पूंजी और विदेशी व्यापार की ओर देखें।


7. भावी सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जनता की आवश्यकताआंे की पूर्ति सरकारी कोष से हो, न कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करनेवाली वोट बैंक तैयार करने की लोकलुभावन योजनाआंे में जाए।