गुजरात में बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको ने कुछ आलू किसानों पर 1 करोड़ रुपये से ज्यादा के मुआवजे का मुकदमा ठोक दिया है. कंपनी का आरोप है कि किसानों ने उसके कॉपीराइट वाली खास किस्म के आलू का उत्पादन किया है. यह घटना साबित करती है कि उदारीकरण के दौर में देश के खेती-किसानी को किस तरह की चुनौती मिलने वाली है. सोशल मीडिया और राजनीतिक दबाव के बाद पेप्सिको किसानों से समझौते को राजी तो हो गई है, लेकिन उसका कहना है कि अगर किसान उगाई गई फसल उसे ही बेचें तो वह कोर्ट के बाहर सेटलमेंट करने को तैयार है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत में बीज का पेटेंट हो ही नहीं सकता और यह जानते हुए भी पेप्सिको अगर किसानों पर करोड़ों का मुकदमा कर रही है तो यह महज उन्हें धमकाने और दबाव में लेने की कोशिश है.

गौरतलब है कि बहुराष्ट्रीय फूड बेवरेज कंपनी पेप्सिको ने अहमदाबाद की कमर्शियल कोर्ट के जज एमसी त्यागी के पास याचिका दायर की थी कि चार किसानों द्वारा एफसी-5 टाइप के स्पेशल आलू की किस्म की अवैध खेती की जा रही है. पेप्सिको का आरोप है कि ये किसान आलू की उस किस्म का उत्पादन कर रहे थे, जिससे लेज चिप्स बनाए जाते हैं और इस पर कंपनी का कॉपीराइट है. पेप्सिको ने नुकसान के लिए प्रत्येक किसान से 1.05 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति की भी मांग की है. पिछले एक साल में पेप्सिको ने कुल 11 किसानों पर इस तरह का मुकदमा किया है.

ये वही आलू की किस्म है जिस पर पेप्सिको अपना पेटेंट होने का दावा कर रही है. इस आलू की खास बात ये है कि ये आलू साइज में बड़े होते हैं. साथ ही इसमें नमी दूसरे किस्म के आलू के मुकाबले कम होती है. जिस वजह से लेज ब्रांड के पोटैटो चिप्स बनाने में इनका इस्तेमाल किया जाता है.

पेप्स‍िको को समझना चाहिए यह अमेरिका नहीं है

कृषि मामलों के जानकार डॉ. देविंदर शर्मा कहते हैं, ‘भारत में बीज का पेटेंट हो ही नहीं सकता. यह अमेरिका नहीं है. यहां सिर्फ प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वेराइटीज ऐंड फार्मर्स राइट्स (PPVFR) के तहत किसी किस्म को विकसित करने वाले को कुछ अधिकार मिले हुए हैं. लेकिन इसके तहत कोई भी किसान किसी किस्म को उगा सकता है. इस पर कोई रोक नहीं है. अगर किसी किसान ने उस किस्म को अपना ब्रांड बताकर बेचा होता तो इस अधिकार का उल्लंघन होता. पेप्सिको इस बात को अच्छी तरह से जानती है. इसलिए छोटे-गरीब किसानों पर करोड़ रुपये का मुकदमा करने की मंशा सिर्फ उन्हें धमकाना और दबाव बनाने की कोशिश है. वे अमेरिका में किसानों पर करोड़ों डॉलर का मुकदमा करते रहे हैं, लेकिन भारत में ऐसा नहीं चल सकता. कंपनी PPVFR से संबंधित अथॉरिटी में भी शिकायत नहीं कर सकती, क्योंकि PPVFR ने भी स्पष्ट कर दिया है कि किसानों ने कानून का कोई उल्लंघन नहीं किया है.’

स्वदेशी जागरण मंच भी खफा

स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक डॉ. अश्वनी महाजन पेप्सिको की इस हरकत से काफी खफा दिखे. उन्होंने कहा कि स्वदेशी जागरण मंच इस मामले को काफी गंभीरता से ले रही है. उन्होंने कहा, ‘किसानों ने कुछ भी गलत नहीं किया है. इसके बाद भी अगर पेप्सिको को लगता है कि किसानों ने गलत किया है तो उसे प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वेराइटीज ऐंड फार्मर्स राइट्स (PPVFR) से जुड़ी अथॉरिटी में शिकायत करनी चाहिए. यह कोई नजीर न बन जाए, इसके लिए हम सचेत हैं. गुजरात सरकार से हमारा आग्रह है कि वह इस मामले में किसानों का साथ दे और इसमें एक पक्ष बने. उन्होंने कहा कि पेप्सिको ने जो समझौता प्रस्ताव रखा है वह भी ठेकेदारी को बढ़ावा देने वाला है. किसान उसका बंधुआ मजदूर नहीं है.’

महाजन ने कहा कि PPVFR अथॉरिटी में अगर किसान दोषी भी पाए जाते हैं तो नियम के मुताबिक उन्हें पैदावार कीमत का बेहद मामूली हिस्सा मुआवजे के रूप में देना होगा. एक करोड़ से ऊपर का मुकदमा किसानों पर करने के पीछे साफ मंशा दिख रही है कि कंपनी इन गरीब किसानों को धमकाना चाहती है और उन पर दबाव बनाना चाहती है.

पेप्सिको का समझौता प्रस्ताव

पेप्सिको ने इस कथि‍त पेटेंट वाले आलू की अवैध रूप से खेती किए जाने को लेकर हर किसान से मुआवजे की मांग की है. पेप्सिको ने अब किसानों के सामने अदालत के बाहर मामले में समझौते की बात रखते हुए कहा है कि उन्हें पेप्सिको से ही आलू की फसल के लिए बीज खरीदने होंगे और इस उत्पादन के बाद आलू पेप्सिको को ही बेचने पड़ेंगे.

पेप्सिको का दावा है कि साल 2016 में ही उसे भारत में इस आलू के उत्पादन का खास अधिकार मिला हुआ है. दूसरी तरफ, एक्ट‍िविस्ट का कहना है कि किसानों को किसी भी संरक्ष‍ित किस्म के बीज को बोने, उगाने और बेचने का पूरा अधिकार है. प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वेराइटीज ऐंड फार्मर्स राइट्स (PPVFR) में किसानों को यह अधिकार मिला हुआ है.

किसानों का कहना है कि मल्टीनेशनल कंपनी कि दादागीरी को नहीं चलने देंगे. किसानों का ये भी कहना है कि गांव में ये प्रथा होती है कि यहां जि‍स किसान की फसल अच्छी होती है, उस फसल के बीज वह दूसरे किसानों को देता है. किसी किसान ने जानबूझकर एफसी-5 किस्म का आलू नहीं उगाया था. साबरकांठा के रहने वाले किसानों बिपिन पटेल, छबिल पटेल, विनोद पटेल और हरिभाई पटेल ने कोर्ट में अपना पक्ष रखने के लिए वक्त मांगा है, जिसके बाद अब कोर्ट ने अगली सुनवाई 12 जून को रखी है.

एमएनसी बनाम किसान

जिन किसानों पर मुकदमा किया गया है वे 3-4 एकड़ की खेती वाले छोटे किसान हैं. किसानों का आरोप है कि पेप्सिको ने एक निजी जासूसी एजेंसी का सहारा लिया और कुछ लोगों ने उनके पास संभावित खरीदार के रूप में आकर गोपनीय तरीके से खेती का वीडियो बनाया और आलू का नमूना ले गए. कोर्ट ने मामले की जांच कर रिपोर्ट तैयार करने के लिए एक वकील को भी कोर्ट कमिश्नर के तौर पर नियुक्त किया है, ताकि वे सैंपल लेकर उसे विश्लेषण के लिए सरकारी लैब में भेजें.

इससे पहले 2018 में भी कंपनी ने अरावली जिले के 5 किसानों प्रभुदास पटेल, भारत पटेल, जीतू पटेल, विनोद पटेल और जिगर कुमार पटेल के खिलाफ मामला दर्ज कराया था. इस मामले की सुनवाई अभी तक अरावली जिला अदालत में चल रही है. मीडिया में आई खबरों के मुताबिक पेप्सिको ने कुल 11 किसानों पर मुकदमा किया है. शाबरकांठा के 4 किसानों के अलावा 5 अन्य किसानों पर 20-20 लाख रुपये का मुआवजा देने का मुकदमा किया गया है. बांसकाठा के दो किसानों पर भी मुकदमा किया गया है. गुजरात के बांसकांठा इलाके को राज्य का पोटैटो कैपिटल माना जाता है.

क्या है कानून में

PPVFR कानून में साफ कहा गया है कि किसानों को किसी रजिस्टर्ड वेराइटी के बीज सहित अपने पैदावार को सुरक्ष‍ित रखने, इस्तेमाल करने, बोने, फिर से बोने, आदान-प्रदान या बेचने का अधिकार है, बशर्ते वे बीज की ब्रांडिंग न करें.

सरकार का दखल

इस मामले में गुजरात सरकार पर भी दबाव बढ़ने लगा था. कांग्रेस नेता अहमद पटेल ने कहा था कि सरकार इस मसले पर अपनी ‘आंखें बंद नहीं रख सकती.’ इसके बाद गुजरात के डिप्टी सीएम नितिन पटेल ने कहा कि सरकार किसानों के साथ है और इस मुकदमे में एक पार्टी बनने का निर्णय लिया गया है. इस मामले में अगली सुनवाई 12 जून को है.

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