12TH NATIONAL CONVENTION – BHUBANESWAR (ODISHA)
26, 27, 28 DECEMBER 2014

Resolution – 1 H

बौद्धिक संपदा अधिकारों पर अमेरिकी चेतावनी, मात्रा एक दिखावा

विश्व की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में बौद्धिक संपदा अधिकारों ने विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत सन् 1995 में TRIPS समझौता होने के पश्चात एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर लिया है। अमेरिका की सकल आय का 35% और यूरोपीय यूनियन की सकल आय का 39% हिस्सा बौद्धिक सम्पदा आधारित व्यवसायों पर आधारित एवं उनसे प्राप्त होने के कारण अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के लिए यह एक गम्भीर मुद्दा बन गया है। इसलिए पश्चिमी देशो की ओर से भारत सहित अन्य विकासशील देशों पर इन देशों में लागू घरेलू बौद्धिक संपदा अधिकार कानूनों में उनके हित में बदलाव करने का लगातार भारी दबाव है। वर्तमान समय में भारत सरकार द्वारा बौद्धिक संपदा अधिकार नीति बनाए जाने की प्रक्रिया चलने और देश में लागू पेटेन्ट कानूनों में, विशेषकर निम्न 3 या 4 मुद्दों में भारत सरकार द्वारा बदलाव न किए जाने पर बडी दवा कम्पनियों के दबाव में अमेरिका द्वारा आर्थिक प्रतिबन्धों की धमकी के वातावरण में यह मुद्दा अत्यंत सम्वेदनशील हो गया है –

  1. पेटेंट कानून, 1990 की धारा 3३(डी) जिसके अन्तर्गत नोवार्टिस, स्विट्जरलैंड की औषधि के फर्जी आविष्कार की पेटेंट मान्यता रद्द की गई थी और माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा उक्त प्रावधान को TRIPs समझौते के पूर्ण रूपेण अनुरूप मानते हुए मान्य किया गया था।
  2. अनिवार्य लाइसेंसिग से सम्बन्धित प्रावधान, विशेषकर ‘नाटको’ कम्पनी को कैन्सर की दवा के उत्पादन की अनुमति दिए जाने के कारण, क्योंकि यह दवा जर्मनी की ‘बेयर’ कम्पनी द्वारा अत्यंत मंहगे दामों पर बेची जा रही थी।
  3. दवाईयों से सम्बन्धित तथ्यों की गोपनीयता रखने की अवैधानिक मांग जोकि ट्रिप्स समझौते की धारा 39.3 के अन्तर्गत भारत सरकार के औषधि नियंत्राण प्राधिकरण को सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवीयता के आधार पर उक्त दवाईयों के परीक्षण नतीजे भारतीय जेनरिक दवा कम्पनियों के साथ साझा करने से रोकती है।

इन मुद्दों के अलावा भी भारत सरकार को भारतीय पेटेंट कानून के वर्तमान में लागू अन्य प्रावधानों जिसमें पेटेंट दिए जाने से पूर्व विरोध दर्ज करना शामिल है, के सम्बन्ध में समझौता नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, भारत सरकार को ट्रिप्स समझौते के वर्तमान में लागू अनेक अहितकारी प्रावधानों की पूर्ण समीक्षा एवं विश्व व्यापार संगठन के सभी सम्बन्धित मंचों पर पर्यावरण एवं अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नवीन टैक्नोलोजी की सुगम उपलब्धता के साथ साथ इस सम्बन्ध में पुनः चर्चा की मांग करनी चाहिए। हमें शराब आदि उत्पादों से आगे बढ कर, दार्जिलिंग चाय, बासमती चावल, टैक्सटाइल उत्पादों और भारत के बहुत सारे अन्य मूल कृषि उत्पादों की भौगोलिक पहचान के संरक्षण की विशेष मांग करनी चाहिए।
हमें हमारी जैव विविधता, पारम्परिक ज्ञान और लोक गीत के संरक्षण हेतु भी वर्तमान में चल रहे दोहा प्रस्तावों के कार्यान्वयन के दौरान बिना चर्चा में नए बिन्दु जोडें, मांग करनी चाहिए।

भारत सरकार को नवोन्वेषण एवं सष्जनात्मकता की वृद्धि हेतु इस देश के वैज्ञानिकों और कारीगरों को उचित सम्मान देते हुए शोध एवं विकास पर किए जाने वाले सरकारी खर्च को बढाना चाहिए।