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वर्तमान ऊर्जा संकट के दौर में आर्थिक संयम की जरुरत 

By Dulichand Kaliraman • 22 May 2026
वर्तमान ऊर्जा संकट के दौर में आर्थिक संयम की जरुरत 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बचत मंत्र केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का मार्ग है। विदेशी मुद्रा भंडार जितना मजबूत होगा, भारत उतना ही आत्मनिर्भर, सुरक्षित और शक्तिशाली बनेगा। - दुलीचंद कालीरमन

 

आज पूरा विश्व अनेक प्रकार के संकटों से गुजर रहा है। कहीं युद्ध चल रहे हैं, कहीं आर्थिक मंदी का खतरा है, कहीं महंगाई बढ़ रही है और कहीं ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है। भारत भी इन वैश्विक परिस्थितियों से अछूता नहीं है। ऐसे समय में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों को “बचत, संयम और आत्मनिर्भरता” का संदेश दिया है। यह संदेश केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक सुरक्षा, विदेशी मुद्रा भंडार और ऊर्जा आत्मनिर्भरता से भी जुड़ा हुआ है।

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य और वर्तमान संकट

आज हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व की सबसे महत्वपूर्ण सामरिक जगहों में से एक है। यह वह समुद्री मार्ग है जहाँ से विश्व का लगभग 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में गैस गुजरती है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। यदि हॉर्मुज़ क्षेत्र में युद्ध, तनाव या संघर्ष बढ़ता है, तो तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे पेट्रोल, डीजल और एल.पी.जी. की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं तथा भारत का आयात बिल भी बढ़ जाएगा। ऐसी स्थिति में देश की विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव पड़ता है। इसलिए प्रधानमंत्री का “बचत और आत्मनिर्भरता” का संदेश आज और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

विदेशी मुद्रा भंडार का महत्व

विदेशी मुद्रा भंडार वह धनराशि होती है जिसे कोई देश विदेशी मुद्राओं और सोने के रूप में सुरक्षित रखता है। यह आर्थिक संकट के समय देश की सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 650-700 अरब अमेरिकी डॉलर के आसपास रहा है, लेकिन भारत अभी भी कच्चे तेल, एल.पी.जी., खाद्य तेल और सोने के आयात पर काफी निर्भर है। यदि वैश्विक संकट बढ़े और आयात महँगा हो जाए, तो विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से प्रभावित हो सकता है। इसलिए अनावश्यक आयात कम करना राष्ट्रीय आवश्यकता बन गया है।

प्रधानमंत्री के बचत मंत्र

1. सोना खरीदने को कुछ समय टालना

भारत दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण आयातक देशों में से एक है। भारत हर वर्ष लगभग 700 से 900 टन सोना आयात करता है, जिस पर 40 से 60 अरब अमेरिकी डॉलर तक खर्च हो जाते हैं।

यह विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी बोझ डालता है। यदि देशवासी कुछ समय के लिए अनावश्यक सोना खरीदना टाल दें, तो अरबों डॉलर की बचत हो सकती है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा। यह राशि देश के विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा में उपयोग की जा सकती है। 

संकट के समय अनावश्यक सोना खरीदना कम करना देशहित में आवश्यक कदम हो सकता है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और आर्थिक स्थिरता मजबूत होगी।

2. विदेश यात्राओं में संयम

विदेश पर्यटन पर भारतीय नागरिक हर वर्ष अरबों डॉलर खर्च करते हैं। यदि लोग अनावश्यक विदेश यात्राएँ कम करें और भारत के पर्यटन स्थलों को बढ़ावा दें, तो विदेशी मुद्रा देश में बचेगी तथा स्थानीय रोजगार को भी लाभ मिलेगा। इससे युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और संस्कृति से जुडने एवं समझने का भी अवसर मिलेगा। 

3. खाद्य तेल की कम खपत

भारत खाद्य तेल का बड़ा आयातक देश है। इसका आयात बिल 1.61 लाख करोड़ का है। यदि परिवार खाने में तेल का उपयोग थोड़ा कम करें, तो इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और लोगों का स्वास्थय भी बेहतर होगा।

4. जैविक और प्राकृतिक खेती

प्रधानमंत्री प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के आयात पर भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। जैविक खेती अपनाने से यह निर्भरता कम होगी तथा मिट्टी और पर्यावरण की रक्षा भी होगी। भारत कृषि प्रधान देश है, लेकिन आज भी रासायनिक उर्वरकों के लिए काफी हद तक विदेशों पर निर्भर है। यूरिया, डीएपी, पोटाश और अन्य उर्वरकों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। भारत हर वर्ष लगभग 15 से 20 अरब अमेरिकी डॉलर तक उर्वरकों और उनसे जुड़े कच्चे माल के आयात पर खर्च करता है। यह भुगतान विदेशी मुद्रा यानी डॉलर में किया जाता है।

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस और उर्वरकों की कीमतें बढ़ती हैं, तब भारत का आयात बिल और अधिक बढ़ जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पूरी दुनिया में उर्वरकों की कीमतों में भारी वृद्धि देखी गई थी। यदि भारत जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देता है, तो रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी और अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है।

5. पेट्रोल-डीजल की कम खपत और एल.पी.जी. के स्थान पर इंडक्शन चूल्हों का उपयोग

पश्चिम एशिया के संकट के कारण कच्चे तेल के दाम उच्चतम स्तर पर पहुँच गए हैं। लगातार सप्लाई बाधित हो रही है। आने वाले काफी समय तक स्थिति सामान्य होने की उम्मीद नहीं है। इसलिए विदेशी मुद्रा भण्डार पर अतिरिक्त बोझ और अनिश्चितता के वातावरण में जहाँ तक संभव हो हमें सार्वजनिक परिवहन को अपनाना होगा या कार-पूलिंग जैसी व्यवस्था से पेट्रोल-डीजल की खपत को कम करना होगा। भारत अपनी आवश्यकता का बड़ा हिस्सा एल.पी.जी. गैस विदेशों से आयात करता है। यदि हॉर्मुज़ क्षेत्र में संकट बढ़ता है, तो एल.पी.जी. की कीमतों में भी भारी वृद्धि हो सकती है।

ऐसी स्थिति में इंडक्शन चूल्हों का उपयोग एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। यदि परिवार धीरे-धीरे एल.पी.जी. के स्थान पर इंडक्शन आधारित खाना पकाने की व्यवस्था अपनाएँ, तो गैस आयात पर निर्भरता कम होगी। भारत सौर और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसलिए बिजली आधारित खाना पकाने की व्यवस्था भविष्य के लिए अधिक सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प बन सकती है।

युवाओं और समाज की भूमिका

देश के युवाओं को समझना होगा कि फिजूलखर्ची केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नुकसान भी है। यदि युवा वर्ग सादगी, बचत और स्वदेशी को अपनाए, तो भारत आर्थिक रूप से और अधिक मजबूत बन सकता है। परिवारों को बच्चों को बचपन से बचत, अनुशासन और राष्ट्रहित की शिक्षा देनी चाहिए। वर्तमान वैश्विक संकट, विशेषकर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव, हमें आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बनने की चेतावनी देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बचत मंत्र केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का मार्ग है। विदेशी मुद्रा भंडार जितना मजबूत होगा, भारत उतना ही आत्मनिर्भर, सुरक्षित और शक्तिशाली बनेगा।       

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