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बी.टी. बैंगन को फिर से भारत में प्रवेश दिलवाने के कुप्रयासों का विरोध जरूरी

Admin October 01, 2020

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह जीएम खाद्य फसलों के लिए द्वार खोलने की एक शुरुआत मात्रा है। जीएम फसलें व्यापक स्तर पर पूरी दुनिया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्राण में हैं। — भारत डोगरा

 

विश्व के अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक बार-बार यह चेतावनी दे चुके हैं कि जी.एम. फसलें बहुत हानिकारक हैं और इनमें भी जीएम खाद्य फसलें तो खाद्य व कृषि व्यवस्था के लिए बहुत ही खतरनाक हैं। भारत में पहली जीएम खाद्य फसल को प्रवेश दिलाने का पहला कुप्रयास बीटी बैंगन के रूप में 2009-10 में किया गया पर विभिन्न राज्य सरकारों, किसानों, नागरिकों व विशेषज्ञों के विरोध के आधार पर बीटी बैंगन को अस्वीकृत कर दिया व इस पर रोक (मोराटोरियम) लगा दी गई। पर जीएम खाद्य फसलों के साथ बहुत शक्तिशाली स्वार्थ जुड़े हैं। अतः शीघ्र ही नए सिरे से बीटी बैंगन को प्रवेश दिलवाने के कुप्रयास आरंभ हो गए हैं व यह कुप्रयास अब चरम की ओर बढ़ रहे हैं। इस स्थिति में एक बार फिर यह आवश्यक है कि कर्तव्यनिष्ठ नागरिक देश की कृषि व खाद्य व्यवस्था तथा पर्यावरण की रक्षा के लिए इन कुप्रयासों के विरोध में आगे आएं।

एक प्रचार यह किया गया है कि इस समय वर्ष 2020 में जो नई बी टी बैंगन किस्में लाई गई है वे बहुराष्ट्रीय कपंनी द्वारा विकसित नहीं है व अपने देश के संस्थानों द्वारा विकसित है। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह जी एम खाद्य फसलों के लिए द्वार खोलने की एक शुरुआत मात्र है व जीएम फसलें व्यापक स्तर पर पूरी दुनिया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में हैं।

कृषि व खाद्य क्षेत्र में जेनेटिक इंजीनियरिंग की टैक्नालाजी मात्र लगभग छः-सात बहुराष्ट्रीय कंपनियों (व उनकी सहयोगी या उप-कंपनियों) के हाथ में केंद्रित हैं। इन कंपनियों का मूल आधार पश्चिमी देशों व विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका में है। इनका उद्देश्य जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से विश्व कृषि व खाद्य व्यवस्था पर ऐसा नियंत्रण स्थापित करना है जैसा विश्व इतिहास में आज तक संभव नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट ने जैव तकनीक के ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक प्रो. पुष्प भार्गव को जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी (जी.ई.ए.सी) के कार्य पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त किया। प्रो. पुष्प भार्गव सेन्टर फार सेलयूलर एंड मालीक्यूलर बॉयलाजी हैदराबाद के पूर्व निदेशक रहे व नैशनल नॉलेज आयोग के उपाध्यक्ष रहे। जिस तरह जी.ई.ए.सी. ने बी टी बैंगन को जल्दबाजी में स्वीकृति दी डा. पुष्प भार्गव ने उसे अनैतिक व एक बहुत गंभीर गलती बताया।

विश्व ख्याति प्राप्त इस वैज्ञानिक ने देश को चेतावनी दी कि चंद शक्तिशाली व्यक्तियों द्वारा अपने व बहुराष्ट्रीय कंपनियों (विशेषकर अमेरिकी) के हितों को जेनेटिक रूप से बदली गई (जी.एम.) फसलों के माध्यम से आगे बढ़ाने के प्रयासों से सावधान रहे। उन्होंने इस चेतावनी में आगे कहा है कि इस प्रयास का अंतिम लक्ष्य भारतीय कृषि व खाद्य उत्पादन पर नियंत्रण प्राप्त करना है। उन्होंने कहा कि इस षडयंत्र से जुड़ी एक मुख्य कंपनी का कानून तोड़ने व अनैतिक कार्यों का चार दशक का रिकार्ड है। 

आज प्रो. पुष्प भार्गव नहीं है (कुछ समय पूर्व उनका देहान्त हुआ) पर उनकी चेतावनियों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। 

अनेक निष्ठावान वैज्ञानिकों ने बहुत स्पष्ट शब्दों में इस विषय पर अपने तथ्य व विचार सामने रखे हैं। जनहित के मामलों में मार्गदर्शन करने के लिए अनेक देशों के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक एक हुए व उन्होंने एक इंडिपेंडेंट साईंस पैनल (स्वतंत्र विज्ञान मंच) का गठन किया। इस पैनल ने जी.एम. फसलों पर एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज तैयार किया है। इस दस्तावेज के निष्कर्ष में कहा गया है - “जी.एम. फसलों के बारे में जिन लाभों का वायदा किया गया था वे प्राप्त नहीं हुए हैं व यह फसलें खेतों में बढ़ती समस्याएं उपस्थित कर रहीं हैं। अब इस बारे में व्यापक स्वीकृति है कि इन फसलों का प्रसार होने पर ट्रान्सजेनिक प्रदूषण से बचा नहीं जा सकता है। अतः जी.एम. फसलों व गैर जी.एम. फसलों का सह अस्तित्व नहीं हो सकता है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि जी.एम. फसलों की सुरक्षा या सेफ्टी प्रमाणित नहीं हो सकी है। इसके विपरीत पर्याप्त प्रमाण प्राप्त हो चुके है जिनसे इन फसलों की सेफ्टी या सुरक्षा संबंधी गंभीर चिंताएं उत्पन्न होती हैं। यदि इनकी उपेक्षा की गई तो स्वास्थ्य व पर्यावरण की क्षति होगी जिसकी पूर्त्ति नहीं हो सकती है, जिसे फिर ठीक नहीं किया जा सकता है। जी.एम. फसलों को अब दृढ़ता से रिजेक्ट कर देना चाहिए, अस्वीकृत कर देना चाहिए।”

इन फसलों से जुड़े खतरे का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष कई वैज्ञानिकों ने यह बताया है कि जो खतरे पर्यावरण में फैलेंगे उन पर हमारा नियंत्रण नहीं रह जाएगा व बहुत दुष्परिणाम सामने आने पर भी हम इनकी क्षतिपूर्त्ति नहीं कर पाएंगे। जेनेटिक प्रदूषण का मूल चरित्र ही ऐसा है। वायु प्रदूषण व जल प्रदूषण की गंभीरता पता चलने पर इनके कारणों का पता लगाकर उन्हें नियंत्रित कर सकते हैं, पर जेनेटिक प्रदूषण जो पर्यावरण में चला गया वह हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाता है। 

2009-10 में भारत में बीटी बैंगन के संदर्भ में जीएम के विवाद ने जोर पकड़ा तो विश्व के 17 विख्यात वैज्ञानिकों ने भारत के प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस बारे में नवीनतम जानकारी उपलब्ध करवाई। पत्र में कहा गया कि जीएम प्रक्रिया से गुजरने वाले पौधे का जैव-रसायन बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता हैं जिससे उसमें नए विषैले या एलर्जी उत्पन्न करने वाले तत्त्वों का प्रवेश हो सकता है व उसके पोषण गुण कम हो सकते हैं या बदल सकते हैं। जीव-जंतुओं को जीएम खाद्य खिलाने पर आधारित अनेक अध्ययनों से जीएम खाद्य से गुर्दे (किडनी), यकृत (लिवर) पेट व निकट के अंगों (गट), रक्त कोशिका, रक्त जैव रसायन व प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी सिस्टम) पर नकारात्मक स्वास्थ्य असर सामने आ चुके हैं।

इन वैज्ञानिकों ने बताया कि जिन जीव-जंतुओं को बीटी मक्का खिलाया गया उनमें प्रत्यक्ष विषैलेपन का प्रभाव देखा गया। बीटी मक्के पर मानसैंटो के अपने अनुसंधान का जब पुनर्मूल्यांकन हुआ तो अल्प-कालीन अध्ययन में भी नकारात्मक स्वास्थ्य परिणाम दिखाई दिए। बीटी के विषैलेपन से एलर्जी की रिएक्शन का खतरा जुड़ा हुआ है। बीटी बैंगन जंतुओं को फीड करने के अध्ययनों पर महको-मानसेंटो ने जो दस्तावेज तैयार किया, उससे लिवर, किडनी, खून व पैंक्रियास पर नकारात्मक स्वास्थ्य परिणाम विभिन्न जीव-जंतुओं पर (विशेषकर चूहे, खरगोश व बकरी पर) नजर आते हैं। अल्पकालीन (केवल 90 दिन या उससे भी कम) अध्ययन में भी यह प्रतिकूल परिणाम नजर आए जबकि जीवन-भर के अध्ययन से और भी कितने प्रतिकूल परिणाम सामने आते, इस पर प्रश्न खड़े हो गए हैं। 

जेनेटिक इंजीनियरिंग के अधिकांश महत्वपूर्ण उत्पादों के पेटेंट बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास हैं व वे अपने मुनाफे को अधिकतम करने के लिए इस तकनीक का जैसा उपयोग करती हैं, उससे इस तकनीक के खतरे और बढ़ जाते हैं। 

प्रो. पुष्प भार्गव ने जेनेटिक रूप से संवंर्धित (जेनेटिकली मोडीफाईड) या जीएम फसलों का बहुत स्पष्ट और तथ्य आधारित विरोध किया, व वह भी बहुत प्रखरता से। बिजनेस लाईन (नवंबर 5, 2015) में ‘द केस फॉर बैनिंग जीएम क्राप्स’ या ‘जीएम फसलों पर प्रतिबंध लगाना क्यों जरूरी है’ शीर्षक से उन्होंने एक महत्त्वपूर्ण लेख लिखा। इसमें उन्होंने लिखा, “आज बहुत से व संदेह से परे प्रमाण हैं कि जीएम फसलें मनुष्यों व अन्य जीवों के स्वास्थ्य के लिए, पर्यावरण व जैव विविधता के लिए हानिकारक हैं। (इनमें) प्रायः प्रयोग होने वाला बीटी जीन कपास या बैंगन के पौधों में प्रवेश कर उनकी संवृद्धि व विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है। जीएम खाद्यों के बारे में यह भी सिद्ध हुआ है कि इनसे चूहों में कैंसर होता है।”

उन्होंने आगे लिखा कि खतरनाक जीएम फसलों के खेत परीक्षणों का पर्याप्त व सही निरीक्षण नहीं होता है। विषैलेपन या अन्य महत्त्वपूर्ण पक्षों का सही ढंग से पता लगाने के लिए जरूरी चिन्ताओं व उसके अनुकूल जरूरी तैयारियों का अभाव है। 

प्रायः जीएम फसलों के समर्थक कहते हैं कि वैज्ञानिकों का अधिक समर्थन जीएम फसलों को मिला है पर प्रो. भार्गव ने इस विषय पर समस्त अनुसंधान का आकलन कर यह स्पष्ट बता दिया कि अधिकतम निष्पक्ष वैज्ञानिकों ने जीएम फसलों का विरोध ही किया है। साथ में उन्होंने यह भी बताया कि जिन वैज्ञानिकों ने समर्थन दिया है उनमें से अनेक किसी न किसी स्तर पर जीएम बीज बेचने वाली कंपनियों या इस तरह के निहित स्वार्थों से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं या प्रभावित रहे हैं।

इसी लेख में प्रो. भार्गव ने यह भी लिखा है कि केन्द्रीय सरकार के कुछ विभाग जीएम तकनीक के दुकानदारों जैसा व्यवहार करते रहते हैं व संभवतः उन्होंने जीएम बीज बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सांठ-गांठ से ऐसा किया है। 

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