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जरूरी है व्यापक ई-कॉमर्स नीति

Admin August 18, 2021

सेवा में
श्री अनुपम मिश्रा
संयुक्त सचिव, उपभोक्ता मामले विभाग,
उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, भारत सरकार

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 94 के तहत जारी किए गए उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020 के प्रस्ताव का स्वदेशी जागरण मंच स्वागत करता है। देश में नए ई-कॉमर्स दिग्गजों द्वारा प्रौद्योगिकी प्लेटफार्म के नाम पर चलाये जा रहे पूर्ण विकसित ई-कॉमर्स कंपनियों से आम उपभोक्ताओं को संरक्षण दिलाने में प्रस्तावित नियम एक मील का पत्थर जैसा है। इन प्रस्तावित नियमों पर आपके विभाग द्वारा मांगी गई टिप्पणी के संदर्भ में स्वदेशी जागरण मंच की ओर से कुछ अपेक्षित संशोधन निम्नानुसार हैः

1. उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020 का प्रस्ताव, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 94 के तहत जारी किया गया है। अधिनियम की धारा 2(7) में वर्णित ’उपभोक्ता’ की परिभाषा में वह व्यक्ति शामिल नहीं है, जो सामान को पुनर्विक्रय के लिए प्राप्त करता है या अन्य किसी वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए प्राप्त करता है या किसी भी व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए ऐसी सेवाओं का लाभ उठाता है।

स्पष्ट है कि अधिनियम के प्रावधान व्यापारियों और सेवा प्रदाताओं पर लागू नहीं होते हैं, जिसका उल्लेख पहले ही किया गया है, इसलिए अधिनियम के तहत बनाए गए नियम भी उन पर लागू नहीं होंगे। ऐसे में ई-कॉमर्स के दिग्गज कंपनियों द्वारा उनका शोषण किया जाता है तो इन नियमों के तहत उन्हें कोई सुरक्षा प्रदान नहीं की जा सकती। एक आम धारणा है कि ई-कॉमर्स नियम ई-कॉमर्स में शामिल सभी पक्षों पर लागू होते हैं, जो कि पूरा सच नहीं है। इसलिए यह सुझाव दिया जाता है कि इस पहलू को मंत्रालय द्वारा स्पष्टीकरण के माध्यम से स्पष्ट किया जाना चाहिए और डीपीआईआईटी को उन व्यापारियों और सेवा प्रदाताओं की सुरक्षा के लिए उपयुक्त नियम बनाना चाहिए जो वाणिज्यिक उद्देष्यों के लिए ई-कॉमर्स के माध्यम से सेवाओं का लाभ उठाते हैं।

हम यह रेखांकित करना चाहते हैं कि ऐसे कई व्यापारी और सेवा प्रदाता हैं, जिन्हें अपर्याप्त या गैर-मौजूद ई-कॉमर्स कानूनों के कारण कानून के तहत कोई सुरक्षा नहीं मिल रही है। छोटे व्यापारी (अमेज़न, फ्लिपकार्ट-वॉलमार्ट पर), उबर, ओला आदि के ड्राइवर और ज़माटो आदि में शामिल छोटे रेस्तरां (अर्बन क्लैप आदि पर), हेयरड्रेसर, बढ़ई, इलेक्ट्रीशियन आदि और कई अन्य कामगारों को इनके कारण गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ई-कॉमर्स दिग्गज, शोषण से बिल्कुल भी सुरक्षा नहीं रखते हैं। ऐसे में जाहिर है, उपभोक्ता संरक्षण कानून समाज के इन कमजोर वर्गों को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकते।

2. नया नियम 4 को शामिल कर प्रस्तावित संशोधन : ई-कॉमर्स संस्थाओं का पंजीकरण-

(ए) प्रस्तावित संशोधन में प्रत्येक ई-कॉमर्स इकाई जो भारत में काम करने का इरादा रखती है को डीपीआईआईटी के साथ पंजीकृत करने की आवश्यकता होती है। यह सुझाव दिया जाता है कि ’भारत में काम करने का इरादा’ शब्दों को ’भारत में उपभोक्ता को वस्तुओं या सेवाओं की आपूर्ति’ शब्दों में बदल दिया जाए। यह उन ई-कॉमर्स संस्थाओं को भी विनियमित करने में मददगार होगा, जो भारत में अपना कार्यालय स्थापित नहीं करते हैं, लेकिन भारतीय उपभोक्ताओं से बड़ी मात्रा में राजस्व की उगाही करते है।

(बी) बड़ी ई-कॉमर्स संस्थाओं का अनिवार्य पंजीकरण एक स्वागत योग्य कदम है, क्योंकि ऐसा होने से किसी कंपनी द्वारा आसानी से कोई गलत कार्य नहीं किया जा सकेगा। लेकिन, यह सुझाव दिया जाता है कि भारत में बहुत छोटे उपभोक्ता आधार वाली ई-कॉमर्स संस्थाओं को किसी भी कठिनाई से बचाने के लिए अनिवार्य पंजीकरण के लिए एक सीमा निर्धारित की जा सकती है। यह छोटे ई-कॉमर्स खिलाड़ियों को परिहार्य अनुपालनों से बचाएगा। छोटे ई-कॉमर्स खिलाड़ियों को परिभाषित करने के लिए एमएसएमई की परिभाषा को अपनाया जा सकता है।

(सी) डीपीआईआईटी को चूककर्ता ई-कॉमर्स संस्थाओं की पहचान करने के लिए एक निगरानी तंत्र भी बनाना चाहिए और ऐसे चूककर्ताओं को दंडित करने के लिए एक न्याय निर्णयन तंत्र भी होना चाहिए।

3. नियम 5 में प्रस्तावित संषोधन : ई-कॉमर्स संस्थाओं के कर्तव्य -

(ए) नियम 5 के उप-नियम (5) के खंड (ए) के स्पष्टीकरण के लिए ई-कॉमर्स इकाई को एक ’मुख्य अनुपालन अधिकारी’ नियुक्त करने की आवश्यकता है जो भारत का निवासी और नागरिक हो। इसी तरह, नियम 5 के उप-नियम (5) के खंड (बी) के स्पष्टीकरण के लिए ई-कॉमर्स इकाई को एक ’नोडल संपर्क व्यक्ति’ नियुक्त करने की आवश्यकता है जो भारत का निवासी और नागरिक हो और उप-नियम के खंड (सी) के लिए स्पष्टीकरण नियम (5) के उप नियम (5) के लिए ई-कॉमर्स इकाई को एक ’निवासी शिकायत अधिकारी’ नियुक्त करने की आवश्यकता है जो भारत का निवासी और नागरिक हो। ये नामित व्यक्ति नियम में दिए गए अपने संबंधित कार्यों के लिए जिम्मेदार होंगे।

यह सुझाव दिया जाता है कि कंपनी अधिनियम 2013 में शामिल ’डिफॉल्ट में अधिकारी’ की अवधारणा को ई-कॉमर्स नियमों में भी शामिल किया जाए, ताकि वे व्यक्ति जिनकी सलाह, निर्देश या निर्देश के अनुसार ई-कॉमर्स संस्थाएं कार्य करती हैं, उन्हें अधिनियम और ई-कॉमर्स नियमों के तहत किसी भी उल्लंघन के मामलां में वाद के दायरे में लाया जा सकता है।

(बी) उप-नियम (2) के पैरा (ई) को हटाया जा सकता है क्योंकि इसे उप-नियम (3) में दोहराया गया है।

4. नियम 3(1)(सी) के साथ पठित नियम 5 में उप-नियम(12) को शामिल करने का प्रस्तावित संषोधनः

शब्द “ऐसी ई-कॉमर्स इकाई के राजस्व को अधिकतम करने के इरादे से“ नियम 3 (1) (सी) में ’क्रॉस सेलिंग’ की परिभाषा से हटाया जा सकता है क्योंकि यह एक भ्रामक संदेश का संचार कर रहा है जो स्पष्ट रूप से प्रकटीकरण और सुलभ तरीके से, जैसा कि प्रस्तावित उप-नियम (12) में उल्लिखित है, केवल तभी दिया जाना चाहिए जब आषय राजस्व को अधिकतम करने का हो, अन्यथा नहीं।

5. उपनियम (14) से नियम 5 में प्रस्तावित संशोधन -

(ए) इन संशोधनों का इरादा फ्लैष बिक्री को हतोत्साहित करना प्रतीत होता है, जोकि उपभोक्ताओं को उनकी पसंद और अन्य तरीकों को सीमित करके प्रभावित करता है। हालांकि, किसी भी अस्पष्टता से बचने के लिए पैरा (ए) में ’कीमत में हेरफेर’ शब्द और पैरा (सी) में “हेरफेर करके उपयोगकर्ताओं को गुमराह करना“ शब्दों को और अधिक स्पष्टता दिये जाने की आवष्यकता है और इसके लिए मापदंडों को परिभाषित किया जा सकता है। निम्नलिखित अतिरिक्त पैराग्राफ (14) (सी) के बाद जोड़े जा सकते हैंः

(i) तृतीय पक्ष की समान सेवाओं या उत्पादों की तुलना में मार्केटप्लेस इकाई द्वारा या उसी उपक्रम से संबंधित किसी तीसरे पक्ष द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं और उत्पादों की रैंकिंग में अधिक अनुकूल व्यवहार करने से बचना चाहिए और ऐसी रैंकिंग के लिए निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण शर्तें लागू करना; तथा

(ii) विज्ञापनदाताओं और प्रकाषकों को उनके अनुरोध पर और निः शुल्क, गेटकीपर के प्रदर्षन मापने के उपकरण तक पहुंच और विज्ञापनदाताओं और प्रकाषकों के लिए विज्ञापन सूची का अपना स्वतंत्र सत्यापन करने के लिए आवष्यक जानकारी प्रदान करना; तथा

(iii) ऑनलाइन सर्च इंजन के किसी भी तीसरे पक्ष के प्रदाताओं को उनके अनुरोध पर, रैंकिंग, क्वेरी, क्लिक और देखने के लिए उचित, और गैर-भेदभावपूर्ण शर्तों पर अंतिम उपयोगकर्ताओं द्वारा मुफ्त और सषुल्क खोज के संबंध में डेटा प्रदान करना। 

(बी) आगे के प्रावधानों में यह शामिल करने की आवष्यकता है कि ई-कॉमर्स संस्थाओं द्वारा इन कार्यों, यदि कोई हो, की निगरानी कौन सा प्राधिकरण/नियामक करेगा।

(सी) पैरा (एफ) को निम्नलिखित पैराग्राफ से बदला जा सकता हैः “व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं के साथ प्रतिस्पर्धा में, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होने वाले किसी भी डेटा का उपयोग करने से बचना चाहिए, जो इन व्यवसाय के अंतिम उपयोगकर्ताओं सहित उन व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं द्वारा गतिविधियों के माध्यम से उत्पन्न होता है। उपयोगकर्ता, इसकी मूल प्लेटफ़ॉर्म सेवाओं के या इसके मुख्य प्लेटफ़ॉर्म सेवाओं के उन व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं द्वारा या इन व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं के अंतिम उपयोगकर्ताओं द्वारा प्रदान किए गए; और व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं, या किसी व्यावसायिक उपयोगकर्ता द्वारा अधिकृत तृतीय पक्षों को, प्रभावी, उच्च-गुणवत्ता, निरंतर और रीयल-टाइम एक्सेस और समेकित या गैर-एकत्रित डेटा के उपयोग के साथ, जो संदर्भ के लिए प्रदान किया गया है या उत्पन्न किया गया है, प्रदान करता है। और जब अंतिम उपयोगकर्ता सहमति से इस तरह के साझाकरण का विकल्प चुनता है तो उन व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं द्वारा प्रदान किए गए उत्पादों या सेवाओं से जुड़े अंतिम उपयोगकर्ताओं द्वारा प्रासंगिक कोर प्लेटफ़ॉर्म सेवाओं के उपयोग के बारे में; व्यक्तिगत डेटा के लिए, केवल प्रासंगिक कोर प्लेटफॉर्म सेवा के माध्यम से प्रासंगिक व्यावसायिक उपयोगकर्ता द्वारा पेष किए गए उत्पादों या सेवाओं के संबंध में किए गए उपयोग से सीधे जुड़े होने पर पहुंच और उपयोग प्रदान करें।“

6. प्रस्तावित उप-नियम (17) से नियम 5

पिछला अनुभव यह है कि प्रमुख ई-कॉमर्स बाजार अपने संबंधित पक्षों और सहयोगियों की मदद करने के लिए अपनी स्थिति का दुरुपयोग कर रहे हैं और सामान्य रूप से उपभोक्ताओं के लिए काम कर रहे छोटे आपूर्तिकर्ताओं का शोषण कर रहे हैं। प्रस्तावित नियम प्रमुख ‘स्थिति’ के साथ-साथ ’स्थिति का दुरुपयोग’ को परिभाषित नहीं करते हैं। इसलिए, यह सुझाव दिया जाता है कि प्रस्तावित नियम को निम्नलिखित पैरा से बदला जा सकता है :

“(17) कोई भी ई-कॉमर्स इकाई जो किसी भी बाजार में एक प्रमुख स्थान रखती है, प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 की धारा 4 की उपधारा (2) में प्रदान की गई स्थिति का दुरुपयोग नहीं करेगी।“

7. प्रस्तावित उप-नियम (19) से नियम 5ः

प्रमुख बाजार स्थानों के साथ पिछला अनुभव यह है कि उपभोक्ताओं को वस्तुओं या सेवाओं के वास्तविक आपूर्तिकर्ता के बारे में पूरी जानकारी प्रदान नहीं की जाती है और इसके अभाव में उपभोक्ता की षिकायतों का उचित निवारण नहीं हो रहा है। खरीददारों और विक्रेताओं के बीच संवाद करने के उद्देष्य से विक्रेताओं और उपभोक्ताओं की गोपनीयता से समझौता किए बिना, प्रस्तावित नियम को निम्नलिखित पैरा से बदला जा सकता हैः

“(19) प्रत्येक ई-कॉमर्स इकाई अपने इनवॉइस, नाम, पता और संपर्क विवरण स्पष्ट रूप से और प्रमुखता से उसी फ़ॉन्ट आकार में प्रदर्षित करे, जो ई-कॉमर्स इकाई का है।“

8. नए नियम 6 में प्रस्तावित संषोधन :

यह देखा गया है कि प्रमुख ई-कॉमर्स बाजार स्थानीय विक्रेताओं द्वारा मार्जिन के साथ बेचे जा रहे माल और तेजी से बढ़ने वाली वस्तुओं का डेटा एकत्र कर रहे हैं तथा लाभ का बटवारा या कमीषन का उच्च प्रतिशत प्राप्त करने के लिए इसे अपने संबंधित सहयोगियों को अपने ई-मार्केट प्लेस पर व्यापार करने के लिए प्रदान करते हैं। इसलिए, यह सुझाव दिया जाता है कि नियम 6 के उप नियम (6) के पैरा (ए) को निम्नलिखित से बदला जा सकता हैः

“(ए) सुनिश्चित करें कि यह अपने मंच के माध्यम से एकत्र की गई किसी भी जानकारी का उपयोग अपने अनुचित लाभ या विक्रेताओं को अनुचित नुकसान के लिए नहीं कर सकता है।“

9. यह सुझाव दिया जाता है कि निम्नलिखित को नियम (10) के रूप में शामिल किया जाए -

“उपभोक्ताओं के व्यापक हित में, ई-कॉमर्स मार्केट प्लेस तिमाही आधार पर अपनी वेबसाइट पर निम्नलिखित जानकारियों का खुलासा करेंगी -

(ए) उनके प्लेटफॉर्म पर निष्पादित कुल व्यवसाय
(बी) कुल विज्ञापन लागत 
(ग) प्राप्त शिकायतें और उनके निवारण की संख्या“

10. (ए) यह सुझाव दिया जाता है कि उपभोक्ता संरक्षण परिप्रेक्ष्य के साथ ई-कॉमर्स लेनदेन, अनुचित व्यापार प्रथाओं, गलत बिक्री, कीमतों में हेरफेर आदि के लिए खोज एल्गोरिदम और डिजिटल के अन्य तकनीकी पहलुओं के निरीक्षण, प्रवर्तन के लिए क्षमता निर्माण करने के लिए उपयुक्त नियम भी जोडे जा सकते हैं। 

(बी) उपभोक्ताओं की शिकायतों के निवारण के लिए ई-कोर्ट स्थापित किए जा सकते हैं।

 

डॉ अश्विनी महाजन
राष्ट्रीय सह संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच
 

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