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अंधाधुंध दोहन से प्रकृति के अस्तित्व पर संकट

Admin May 25, 2021

मनुष्य भूल जाता है कि उसका विकास प्रकृति के सह अस्तित्व पर निर्भर करता है। लगातार आ रहे संकटों के कारण थोड़ी सजगता बढ़ी है, लेकिन रफ्तार अभी भी बहुत धीमी है जिसे गति देकर पर्यावरण को सुरक्षित करने की जरूरत है। —  वैदेही

 

हाल ही में आए तोकते तूफान का तांडव तटवर्ती राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र, व केंद्र शासित प्रदेश दीव में दिखा। इस तूफान के चलते आयी बेमौसम आंधी-पानी से देष का अधिकांष हिस्सा हलकान हुआ है। वहीं अब बंगाल की ओर से उठने वाले आभा चक्रवाती तूफान को लेकर लोग सषंकित हैं। कोरोना महामारी के दौर में एक के बाद एक आने वाले इन तूफानी झंझाबातों को लेकर लोग तो चिंतित हैं ही, पर्यावरणविदों में भी प्रकृति की धमाचौकड़ी के आलोक में प्रकृति के दोहन को लेकर गंभीर विचार-विमर्ष हो होने लगा है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से प्रकृति के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है। पर्यावरण में संतुलन बनाए रखने के लिए जैव विविधता बहुत महत्वपूर्ण है। जैव विविधता का आषय विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु और पेड़ पौधों की अधिकाधिक प्रजातियों से है। वैज्ञानिक मानते हैं कि जैव विविधता की कमी के कारण ही बाढ़ सूखा और तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ता है।

जैव विविधता से संबंधित विषयों के संदर्भ में जागरूकता विकसित करने के लिए हर साल 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस की थीम ‘प्रकृति में हमारे समाधान’ है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा शुरू किए गए इस दिन को विश्व जैव विविधता संरक्षण दिवस भी कहा जाता है।

साल 1993 में सबसे पहले जैव विविधता के लिए पहला अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया गया था। वर्ष 2000 तक यह दिवस 29 दिसंबर को आयोजित होता था, क्योंकि इसी दिन जैव विविधता पर कन्वेंषन लागू हुआ था, लेकिन बाद में इसे 29 दिसंबर से षिफ्ट करके 22 मई को कर दिया गया। अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता सम्मेलन जो कि एक बहुपक्षीय संधि है, के तहत 1992 में ब्राजील में संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी सम्मेलन में सहमति बनी थी। इसके तीन प्रमुख लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। एक, जैविक विविधता को संरक्षण। दो, प्रकृति का ठीक-ठीक उपयोग और तीन, अनुवांषिक विज्ञान से मिलने वाले लाभों का निष्पक्ष व न्यायोचित ढंग से वितरण।

अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस का उद्देष्य ऐसे उचित पर्यावरण का निर्माण करना है, जो जैव विविधता में समृद्ध, टिकाऊ एवं आर्थिक कारोबार के लिए अधिक से अधिक अवसर प्रदान कर सके। इसमें विषेष रूप से वनों की सुरक्षा, संस्कृति, जीवन के संगीत, वस्त्र, भोजन, औषधीय पौधों आदि के महत्व को प्रदर्षित करके जैव विविधता पर होने वाले खतरों के बारे में जागरूक करने जैसे विषय शामिल हैं।

पूरे विश्व में जैव विविधता मुख्य रूप से मनुष्य द्वारा जल-जंगल-जमीन एवं महासागरों पर किए जाने वाले व्यवहार पर निर्भर है। पृथ्वी की अधिकांष जैव विविधता वन क्षेत्रों में फलती-फूलती है। इसलिए जंगलों का संरक्षण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। स्टेट ऑफ द वर्ल्ड फॉरेस्ट की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक वनों में वृक्षों की 60,000 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। इसी तरह 80 प्रतिषत वन प्रजाति, 75 प्रतिषत पक्षियों की प्रजातियां और पृथ्वी के स्तनपाई जीवों की 68 प्रतिषत प्रजातियां पाई जाती है, इन प्रजातियों का संरक्षण आज की तारीख में बहुत ही आवष्यक है।

वर्ल्ड वाइल्डलाइफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्राकृतिक क्षेत्रों में बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण सन 1970 के बाद से अब तक दुनिया भर में जीव जंतुओं की संख्या में लगभग 60 फ़ीसदी की कमी आई है। रिपोर्ट में यह भी चेताया गया है कि वन क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप अगर इसी तरह बढ़ता रहा तो वन्यजीव जल्द ही समाप्त हो सकते हैं। इसी तरह समुद्री गतिविधियों का प्रभाव समुद्र के जीव जंतुओं पर भी पड़ा है। पिछले 30 वर्षों में समुद्री जल में 10 गुना प्लास्टिक प्रदूषण की बढ़ोतरी हुई है। जिसके कारण 267 समुद्री प्रजातियों के लिए खतरा बढ़ गया है, खास करके  कछुओं की विभिन्न प्रजातियां अपने विनाष के कगार पर हैं

वस्तुतः मनुष्य ने अपने विकास के लिए संपूर्ण प्रकृति और पर्यावरण को विनाष की ओर धकेल दिया है। आज प्रकृति में ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां मानवीय हस्तक्षेप न बढ़ गया हो। मनुष्य भूल जाता है कि उसका विकास प्रकृति के सह अस्तित्व पर निर्भर करता है। लगातार आ रहे संकटों के कारण थोड़ी सजगता बढ़ी है, लेकिन रफ्तार अभी भी बहुत धीमी है जिसे गति देकर पर्यावरण को सुरक्षित करने की जरूरत है।

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