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कल्याणकारी राज्य भारतः अधिक कर वसूली के बाद भी सुविधाएं कम

Admin April 20, 2021

आज जब हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं तो एक कल्याणकारी राज्य के रूप में हमें देश की जनता के लिए एक न्यायपूर्ण कर प्रणाली के बारे में भी सोचना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो जनता का कल्याण होगा, वही राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी जी द्वारा देखे गए सपनों को भी साकार किया जा सकेगा। — अनिल तिवारी

राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी जी का मानना था कि सुव्यवस्थित आर्थिकी न सिर्फ एक संतुष्ट समाज का निर्माण करती है, बल्कि बेहतर राजनीति का मार्ग भी प्रशस्त करती है। राज्य से अपेक्षा की जाती है कि न्यायपूर्ण आर्थिक प्रबंधन के जरिए देश की उन्नति तथा नागरिकों की खुशहाली को प्राथमिकता मिले।

7 सितंबर 1992 को नई दिल्ली में आयोजित वणिक मंडल (चैंबर ऑफ कॉमर्स) की बैठक में वैश्वीकरण, आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के तहत शुरू हुए बेतहाशा विनिवेश और निजीकरण पर चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने आगाह किया था कि अपरिपक्व आर्थिक नियोजन स्थापित पारंपरिक मूल्यों को नष्ट करता है तथा राजकीय पक्ष को मनमानी राजनीति करने का मौका प्रदान करता है।

आज से लगभग 30 साल पहले युगद्रष्टा ठेंगड़ी जी द्वारा कही गई बात वित्त मंत्रालय की ओर से बचत योजनाओं पर ब्याज दर की कटौती के संबंध में लिए गए हालिया फैसले पर हुबहू लागू होती है। हालांकि वित्त मंत्रालय ने ब्याज दर में कटौती का अपना यह फैसला 24 घंटे के भीतर ही वापस ले लिया, लेकिन कहा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था से जुड़ा यह एक ऐसा फैसला था जिसे राजनीतिक कारणों से वापस लिया गया।

मालूम हो कि बीते दिनों वित्त मंत्रालय ने कोविड-19 से उपजी आर्थिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए बचत योजनाओं पर ब्याज दर में कटौती का ऐलान किया था। सरकार की ओर से अधिसूचना जारी करते हुए वित्तमंत्री ने कहा कि लघु बचत योजनाओं पर अप्रैल से जून तक की तिमाही के लिए कटौती का निर्णय लिया गया है। हालांकि आर्थिक मामलों के सचिव अतनु चक्रवर्ती ने इस आशय का पहले ही संकेत दे दिया था कि मौद्रिक नीति का लाभ ग्राहकों को देने के लिए यह कटौती जरूरी है, क्योंकि बैंकों की शिकायत है कि छोटी बचत योजनाओं पर अधिक ब्याज दर के कारण वह अपनी जमा दरों पर ब्याज कम नहीं कर पा रहे हैं। इन सबके बीच सरकार ने 24 घंटे के भीतर ही अपना फैसला वापस ले लिया। क्योंकि सभी को पता है कि छोटी बचत की योजनाएं समाज के गरीब तबके मध्य वर्ग और सैलरी बेस्ट लोगों के लिए काफी अहम है। ऐसे ही लोग इन योजनाओं में निवेश भी करते हैं और इन्हीं लोगों को ध्यान में रखकर सरकार छोटी बचत योजनाएं लाती भी हैं। कटौती के फैसले से पीपीएफ पर ब्याज दर 50 साल के न्यूनतम स्तर पर आ गई थी, जिससे यह तबका बहुत मायूस था। सरकार को अंदेशा था कि देश के कई हिस्सों में चल रहे आम चुनाव में इसका असर पड़ सकता है, इसलिए भी सरकार ने बिना कोई देरी किए अपने कदम वापस खींच लिए। ऐसे में इस तरह के फैसले लाने के औचित्य का सवाल तो उठा ही, साथ-ही-साथ देश की मौजूदा कर प्रणाली पर भी बहस-विमर्श भी आरम्भ हो गया है।

मालूम हो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्याज की दरें नीचे जा रही हैं। अमेरिका जैसे विकसित देशों में ब्याज दर शून्य या उसके आसपास रहने की संभावना है। वित्त विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज की देनदारी सरकार पर होती है, इसका इस्तेमाल भी सरकार ही करती है। सरकार इसे समेकित निधि के तहत इस पैसे का इस्तेमाल करती है और ब्याज भी देती है। कोरोना वायरस की महामारी के दौरान आयकर और जीएसटी से राजस्व की कमाई अनुमान से कम हुई, ऐसे में सरकार अपने खर्चों को कम करने की कोशिश में छोटी बचत योजनाओं पर दिए जा रहे टैक्स में कमी लाकर पूरा करना चाहती है। कर विशेषज्ञ धीरेंद्र कुमार का कहना है कि जब बैंकों से मिलने वाले कर्ज पर ब्याज दर पर कमी हो रही है तो जो लोग बैंकों या डाकघरों में जमा कर रहे हैं उसकी दरों में भी कमी आना स्वभाविक है। लोगों को गाड़ी, मकान, टीवी जैसी खरीद पर सस्ता लोन चाहिए, तो जमाकर्ताओं को अधिक ब्याज देना कैसे संभव है। क्योंकि यह तो व्यापार का मामला है और कोई भी घाटे का व्यापार नहीं करना चाहेगा, चाहे सरकार हो या बैंक। उनका स्पष्ट कहना है कि अगर देश को तरक्की करना है तो विकासशील से विकसित देश की ओर बढ़ना ही होगा। हमें छोटी बचत योजनाओं के ब्याज दर को नीचे लाना होगा और आने वाले दिनों में ऐसे बचत जमा पर कम ब्याज की आदत डालनी ही होगी।

वस्तुतः टैक्स, सरकार द्वारा देश के नागरिकों से ली जाने वाली एक निर्धारित रकम होती है, जिसका उपयोग देश के लोगों की तरक्की, उनके कल्याण एवं सुविधाओं के लिए किया जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि एक वाजिब कर की व्यवस्था देश को उन्नत और उसके नागरिकों को खुशहाली प्रदान करती है। भारत में अगर कर प्रणाली की बात करें तो वेदों, उपनिषदों और मनुस्मृति से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र तक में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। प्राचीनकाल में राजा द्वारा लिए गए कर की व्याख्या राजा के शासन संबंधी सेवाओं पर होने वाले खर्च के रूप में की जाती थी। वैदिक काल में गांव के लोगों द्वारा कृषि एवं पशुधन पर एक निश्चित राशि कर के रूप में चुकाई जाती थी। किसानों द्वारा प्राप्त राशि को बलि तथा विक्रय वस्तु से प्राप्त राशि को शुल्क कहा जाता था, जो उसके मूल्य का छठवां या आठवां भाग होता था। मौर्य काल में भू राजस्व सहित कई अन्य तरह के कर भी लगाए जाते थे, जैसे 1- षड भाग, यानी कि छठवें अंश के रूप में प्राप्त कर, 2- सेना भक्त, यानी युद्ध काल में प्रजा द्वारा प्राप्त खाद्य पदार्थ, 3- बलि, यानि उपहार के रूप में धन प्राप्त करना, 4- कर, यानि अधीनस्थ राजाओं से मिलने वाली राशि, 5- उत्संग, यानी उत्सव में प्राप्त भेंट, 6- पाश्व, यानि निर्धारित कर से अधिक की वसूली, 7- पारीहिणक, यानि पशुओं द्वारा हानि के कारण पशु स्वामी से प्राप्त अर्थदंड आदि आदि। 

अनेक तरह के करों की विस्तृत व्याख्या करने के साथ ही कौटिल्य ने राजा और प्रजा के लिए स्पष्ट किया था कि राज्य कर का अधिकारी है तो प्रजा के प्रति उसके कर्तव्य भी हैं और प्रजा कर देने के लिए बाध्य है तो उसके अधिकार भी हैं। स्पष्ट तौर पर उन्होंने उल्लेख किया है कि अगर राजा कर लेने के बाद अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाता तो प्रजा अपनी निष्ठा छोड़ सकती है।

मध्यकालीन भारत में रियासतों का बोलबाला था। रियासतें अपने हिसाब से कर लेती थी। सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक आते-आते यह कर व्यवस्था छठवें हिस्से से बढ़कर आय के आधे से अधिक तक पहुंच गई थी।

1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी सरकार पर आए वित्तीय संकट के कारण 1860 में अंग्रेजों द्वारा नई आयकर प्रणाली लाई गई। उल्लेखनीय बात यह है कि तत्कालीन ब्रिटिश वित्त मंत्री जेम्स विल्सन ने कर की शुरुआत करते हुए मनुस्मृति को उद्धृत किया था। 1886 में भारत में आयकर अधिनियम पास हुआ था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद पहले 1918 में तथा फिर 1922 में नया कर अधिनियम लाया गया। फिलहाल देश में जो कर कानून प्रभावी है उसे 1 अप्रैल 1962 को लागू किया गया था। तब से भारत में दो तरह के कर लिए जाते रहे हैं- प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर। ‘एक देश, एक टैक्स’ के नारे के तहत वर्ष 2017 में जीएसटी लागू करके केंद्र की एनडीए सरकार ने अप्रत्यक्ष करों में बदलाव लाकर सुधार के कदम उठाए हैं। सरकार का मानना है कि जीएसटी लागू होने के बाद देश के नागरिकों को कई तरह के करों से आसानी हो जाएगी। 

जीएसटी लागू होने के बाद देश में 28 प्रतिशत तक की कर वसूली हो रही है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक 140 देशों की सूची में यह सबसे ज्यादा है। सबसे कम टैक्स सिंगापुर में 7 प्रतिशत है। इस आंकड़े से यह साफ है कि कर वसूली के मामले में भारत सबसे आगे हैं, लेकिन जब नागरिक सुविधाओं की बात आती है तो भारत का नाम बहुत नीचे आता है। अमेरिका, जापान, यूरोपीय देश अपने नागरिकों से जितना कर लेते हैं उसी अनुपात में उन्हें सुविधाएं भी देते हैं। नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएं देने के मामले में 195 देशों की तालिका में भारत 154वें स्थान पर आता है। यह स्थिति तब है जब भारत में स्वास्थ्य की देखभाल के लिए आयुष्मान योजना प्रभावी है। इस सूची में हम बांग्लादेश, नेपाल, घाना जैसे देशों से भी पीछे हैं।

गौरतलब हो कि भारत में कुछ सीमित लोगों से ही टैक्स वसूला जाता है और इन टैक्स देने वाले लोगों से आय पर कर देने के साथ-साथ संपत्ति कर, नगर निगम के कर, कैपिटल गेन कर, टोल टैक्स, रोड टैक्स जैसे अनगिनत करों का बोझ भी है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक भारत में जनसंख्या के लगभग 1 फ़ीसदी से कुछ अधिक लोग ही आयकर देते हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष कर के रूप में हर नागरिक अपना योगदान देता है। लेकिन जो बुनियादी सुविधाएं राज्य की ओर से नागरिकों को मिलनी चाहिए, उसकी तस्वीर बड़ी धुंधली है। 

ऐसे में छोटी बचत योजनाओं से मिलने वाली आय पर कैंची चलाने से गरीब और बुजर्ग लोगों का जीवन ओर कष्टमय हो जायेगा। बचत खातों पर मिलने वाले ब्याज का फैसला सरकार द्वारा लिया जाता है, चूंकि नागरिकों द्वारा बचत खाते में जमा रकम उसके बुढ़ापे या उसके बुरे समय के लिए  एकमात्र पूंजी होती है। ऐसे में सरकार द्वारा बचत योजनाओं पर ब्याज कम करने का फैसला उन परिवारों के लिए बहुत कष्ट कर है, जिनकी आय का एकमात्र साधन यह बचत योजनाएं ही हैं। हालांकि सरकार ने फिलहाल अपना फैसला वापस ले लिया हो, लेकिन बाद में संभव है कि इसे लागू करने के प्रयास फिर से हो। अगर ऐसा होता है तो देश के मध्य वर्ग के लिए यह अच्छा नहीं होगा, क्योंकि इन योजनाओं में अक्सर मध्यवर्ग ही हिस्सा लेता रहा है।

स्मरण रहे कि भारत पर शासन करने के लिए अंग्रेजों ने जो कानून बनाए थे, छोटे-मोटे बदलाव के साथ आज भी कायम हैं। कर वसूली का वही पुराना ढर्रा बदस्तूर जारी है। हालांकि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने कई एक पुराने पड़ चुके कानूनों को खत्म करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है, लेकिन अभी भी कई ऐसे कानून हैं जिनकी मार समय-समय पर देश की आम जनता को सहनी पड़ती है। आज जब हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं तो एक कल्याणकारी राज्य के रूप में हमें देश की जनता के लिए एक न्यायपूर्ण कर प्रणाली के बारे में भी सोचना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो जनता का कल्याण होगा, वही राष्ट्र ऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी जी द्वारा देखे गए सपनों को भी साकार किया जा सकेगा।     

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