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चीनी माल पर काबू करने से ही होगी भारतीय उद्योगों की तरक्की

Admin June 27, 2020

एक बार सभी आवश्यक वस्तुओं का निर्माण हमारे देश में फिर से होने लगे, उसके बाद हम और बड़े कदम उठाकर अपने उद्योगों को नई ऊंचाई दे सकेंगे और जिस दिन हमारे स्थापित पारंपरिक उद्योगों का पहिया घूमने लगेगा हमें आत्मनिर्भर होने में देर नहीं लगेगी। - अनिल तिवारी


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 मई को ‘मन की बात’ के 65वें संस्करण के प्रसारण के दौरान दावा किया कि इस दषक में आत्मनिर्भर-भारत का लक्ष्य देष को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया है कि देष में ही निर्मित हो रही वस्तुओं को अन्य देषों से आयात न करने के मामले में गंभीर विचार-विमर्ष शीघ्र किया जाएगा।

मालूम हो कि मई 2020 में घोषित किए गए नए आर्थिक पैकेज में छोटे कारोबार उद्योगों के मद्देनजर ‘लोकल के लिए वोकल’ होने की जो संकल्पना की गई है, उससे स्थानीय और स्वदेषी उद्योगों को भारी प्रोत्साहन मिलना लाजिम है। हमने देखा है कि कोरोनाकाल में जब देष-दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्था ढ़ह गई है, तब लोकल यानी स्थानीय आपूर्ति व्यवस्था, स्थानीय विनिर्माण व स्थानीय बाजार देषों के बहुत काम आए हैं।

दिल्ली में लंबे लॉकडाउन के दौरान जब बड़े-बड़े मल्टीनेषनल स्टोर कहीं दिखाई नहीं दिए, उस वक्त गली-मोहल्ले के खुदरा व्यापारियों ने आगे बढ़कर मोर्चा संभाला। कोरोना के डर को किनारे पर रखकर आम आदमी के जीवन की बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति सुनिष्चित की। रोजमर्रा के सामानों के लिए आम जनता को कोई तकलीफ नहीं उठानी पड़ी। संकटकाल में यही व्यवस्था रीढ़ की हड्डी साबित हुई और जनता को किसी प्रकार की अफरा-तफरी से बचाया।

ऐसे में भारत आत्मनिर्भरता की डगर पर आगे बढ़कर गैर जरूरी आयातों पर नियंत्रण कर सकता है, स्थानीय स्तर पर उपलब्धता सुनिष्चित होने की दषा में आयात षून्य कर सकता है और सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह के समीचीन नियंत्रण से चीन जैसे देष पर आर्थिक दबाव भी बना सकता है।

अब सवाल है कि क्या भारत चीन से होने वाले आयातों पर प्रतिबंध लगा सकता है? इसका सीधा जवाब ‘ना’ में है। भारत विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के प्रावधानों के तहत चीन या अन्य सदस्य देषों के आयात पर प्रत्यक्ष प्रतिबंध नहीं लगा सकता। लेकिन ऐसे बहुत से कदम उठाए जा सकते हैं, जिससे आयात पर नियंत्रण हो सकता है। भारत सरकार चीनी सामानों पर एंटी डंपिंग ड्यूटी बढ़ाकर लगा सकती है। जैसे अभी 140 आइटम पर सरकार ने टेरिफ बढ़ाया है। तकनीकी खामियों को उजागर कर उसे रोका जा सकता है। हाल ही में संसद में पूछे गए एक सवाल के लिखित उत्तर में वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने बताया कि भारत ने चीन से दूध एवं दुग्ध उत्पादों के आयात पर रोक लगा दिया है। क्योंकि उनके उत्पादों की गुणवत्ता खराब और अस्वीकार्य थी। इसी तरह कुछ मोबाइल फोन जिन पर अंतरराष्ट्रीय मोबाइल स्टेषन उपकरण पहचान संख्या अथवा अन्य सुरक्षा सुविधाएं नहीं थी, उन्हें भी प्रतिबंधित किया गया है। इसके साथ ही चीन से कुछ इस्पात उत्पादों के आयात पर भी रोक लगा हुआ है। टैरिफ बढ़ने से भारत में चीन से आयातित माल स्वतः महंगे हो जाएंगे और ऐसी स्थिति में भारतीय उत्पादक प्रतियोगिता में उनके मुकाबले सक्षम साबित होंगे।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत अपनी प्रज्ञा, मेधा, कौषल और संसाधनों का उपयोग कर जरूरत की ढेर सारी चीजें उत्पादित करने में सक्षम है। भारत का चमकीला आर्थिक पक्ष यह भी है कि इस समय भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है। भारतीय बाजार दुनिया के नक्षे पर तेजी से फैल रहा है। ऐसे में चीन के लिए इस बाजार को नजरअंदाज करना नामुमकिन है। गौरतलब है कि दवाओं के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराने वाली चीनी कंपनियां भारतीय फार्मासटिकलकंपनियों के बिना एक कदम भी चल नहीं पाएगी। इन आधारों को आगे कर भारत चीन पर दबाव बना सकता है।

हमारे देष में सबसे अधिक आयात चीन से होता है। आयात का आलम यह है कि जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी संस्कारों में उपयोगी हजार से अधिक वस्तुएं चीन से आती है। जन्मदिन, शादी-विवाह, रक्षाबंधन, तीज-त्योहार, होली, दीपावली, हर जगह चीन की उपस्थिति किसी न किसी रूप में है।

स्वदेषी जागरण मंच के वरिष्ठ कार्यकर्ता जयेंद्र विनायक अपनी एक पंच लाईन अक्सर दोहराते रहते है कि जूता सिलाई से लेकर मां भगवती के पाठ तक में चीन घुस आया है। बताते हैं कि चीन की एक बडी टीम भारतीय जरूरतों का अध्ययन कर समय से पूर्व भारी मात्रा में सस्ते दामों पर माल की डंपिंग करती रही है। हालांकि चीनी माल की कोई गारंटी नहीं है, लेकिन कम कीमत के चलते उसका धंधा चोखा है।

भारत और चीन के बीच कारोबार की स्थिति यह है कि हम चीन को एक रुपए का माल निर्यात करते हैं तो वहां से साढे चार रूपये का माल मंगाते हैं। इस पर नियंत्रण करने से ही बात बनेगी। सरकार ने स्थानीय देसी उद्योगों को बढ़ावा देकर आत्मनिर्भर-भारत का नारा दिया है। चीनी चंगुल से बचने का यह एकमेव रास्ता है। आत्मनिर्भर-भारत बड़े पैमाने पर गुणवत्ता वाले उत्पादों का उत्पादन सुनिष्चित कर घरेलू आवष्यकताओं की आपूर्ति के साथ-साथ निर्यात को बढ़ावा दे सकता हैं।

भारत खाद्य प्रसंस्करण, जैविक खेती,  एल्युमिनियम, तांबा, कृषि, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक उपकरण, फर्नीचर, चमड़े, जूते, वस्त्र, मास्क, सैनिटाइजर आदि का वैश्विक आपूर्तिकर्ता बन सकता है। विनिर्माण के क्षेत्र में वृद्धि करना मेक इन इंडिया अभियान का प्रमुख उद्देष्य है। सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक सामान के निर्माण के जरिए देष को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 37 सौ करोड रुपए की मंजूरी दी है। आपदा को अवसर में बदलने की वकालत करते हुए प्रधानमंत्री ने अर्थ केंद्रित वैश्वीकरण की जगह मानव केंद्रित वैश्वीकरण को तवज्जो दी है। भारत संकट के समय खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करता रहा है। एक समय था जब भारत के पास अनाज नहीं था। गेंहू के लिए पूर्णतया भारत अमेरिका पर निर्भर था। साठ के दषक में डॉक्टर स्वामीनाथन के नेतृत्व में हरित क्रांति की शुरुआत हुई। भारत अपनी जरूरतें पूरी कर खाद्यान्न निर्यातक देष बना। इसी तरह दूध के मामले में हम पहले आत्मनिर्भर बने, अब दुनिया के बड़े दुग्ध उत्पादक की श्रेणी में शामिल है। कुछ साल पहले जब सारी दुनिया आर्थिक मंदी की मार से तबाह हो गई थी भारत का खजाना विदेषी मुद्रा के भंडार से पूर्ण था। किसी भी चुनौती से जूझने और जल्दी ही फिर से खड़े होकर आगे बढ़ने का जज्बा औसत भारतीयों की रग में है। पीली नीली क्रांति की बदौलत हम सरसों और मछली के क्षेत्र में पहले से ही आत्मनिर्भर और बड़े उत्पादक है।

देष में अर्थव्यवस्था में सुधार की बात लंबे समय से चल रही है। प्रधानमंत्री ने करोना काल के बीच बड़ा बजट देकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने का सपना दिखाया है। यह कैसे हासिल होगा? इसका भी एक ब्लूप्रिंट सरकार ने तैयार कर रखा है। सुधार 2.0 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री ने 4 साधक लैंड, लेबर, लिक्विडिटी और ला तथा इसके लिए पांच स्तंभ इकोनामी, इंफ्रास्ट्रक्चर, सिस्टम, डेमोग्राफी और डिमांड पर जोर देने की बात कही है। इसमें देष के छोटे मझोले उद्योगों के साथ-साथ स्थानीय देसी कुटीर उद्योगों के हित, अपने पसीने से देष का पेट भरने वाले किसानों और जांगड़ तोड़ मेहनत करने वाले मजदूरों को भी आत्मनर्भर बनाने का मादा है।

इस महत्वकांक्षी योजना को जमीन पर उतारने के लिए आज सबसे बड़ी जरूरत है इन्हें प्रोत्साहित करने की। चीन जैसे देषों से सावधान बर्ताव की। मालूम हो कि सस्ते दाम के नाम पर अपने घटिया माल की बदौलत चीन भारतीय स्थानीय उद्योगों के लिए खतरा है। हालांकि भारतीय जनमानस में चीन के सामान के प्रति जागरूकता बढ़ रही है लेकिन सरकार के स्तर पर भी इसके लिए और अधिक कदम उठाने उठाए जाने की जरूरत है। जाहिर है हम एकदम से सब कुछ बंद नहीं कर सकते लेकिन चीन से आयात घटाकर अपने उद्योगों को फिर से चल निकलने का अवसर बना सकते हैं। एक बार सभी आवष्यक वस्तुओं का निर्माण हमारे देष में फिर से होने लगे उसके बाद हम और बड़े कदम उठाकर अपने उद्योगों को नई ऊंचाई दे सकेंगे और जिस दिन हमारे स्थापित पारंपरिक उद्योगों का पहिया घूमने लगेगा हमें आत्मनिर्भर होने में देर नहीं लगेगी।

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