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चीनी सामानों का हो पूर्ण बहिष्कार

Admin June 27, 2020

इसमें कोई दो राय नही कि अगर हमारे छोटे, मध्यम और कुटीर व्यापार एक बार पूरी क्षमता के साथ चल पडे तो देश के भीतर की सारी समस्याएं तो हल होंगी ही, चीन जैसे देश की हेकडी भी सदा-सदा के लिए खत्म हो जाएगी। - स्वदेशी संवाद


मित्रता की आड़ में शत्रुतापूर्ण रवैया चीन की आदत में शुमार है। ऐसे में यह वक्त की मांग है कि देष आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़े और भारतीय बाजारों से चीन निर्मित सामानों का पूर्ण बहिष्कार हो। भारत राजनीतिक, रणनीतिक कूटनीतिक स्तर पर चीन से एक पड़ोसी के नाते अवष्य संवाद करें, लेकिन व्यापारिक तौर पर भारतवासियों को यह लड़ाई आर-पार की नहीं, बल्कि पार-पार की लड़नी होगी। भारत में पांव पसार रही चीनी कंपनियों को बाहर का रास्ता दिखाना ही होगा।

मुनाफा कमाने में माहिर चीन मित्रता का खोल पहनकर पड़ोसी मुल्कों में दाखिल होता रहा है तथा अवसर देख अपनी विस्तारवादी नीति पर उतर आता है। वर्ष 2017 में डोकलाम घटना के बाद चीन को भारत सहित दुनिया के कई बड़े देषों ने चेतावनी दी थी, मगर यह अपनी धूर्तता से बाज नहीं आता है। अब गलवान और पैंगोंग में नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। हमारे 20 सैनिकों को सर्वोच्च बलिदान देना पड़ा है। भारत लगातार संयम बरतते हुए विवाद सुलझाने का प्रयास कर रहा था, लेकिन चीन हमारी उदारता को कमजोरी समझ बैठा है। हालिया घटनाओं के बाद अब चीन पर फिर विश्वास करना बिल्कुल ठीक नहीं है।

लद्दाख की सीमा पर चीन के साथ मई महीने के प्रारंभ से ही विवाद शुरू है। मौके की नजाकत को भांपते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दरम्याने विवाद ही देष को आत्मनिर्भरता का नारा दिया है। प्रधानमंत्री का यह आहवान चीन को भारतीय बाजार से खदेड़ने का सफल मंत्र भी है। यह ठीक है कि हम पूर्व में भी जुनून में आकर चीनी सामानों का बहिष्कार करते रहे हैं, पर पुनः उनके उत्पादों को अपना लेते हैं। मगर अब पानी सिर से ऊपर बह चुका है। सरकार के साथ-साथ देषवासियों को इस दिषा में कदम बढ़ाते हुए चीन को आर्थिक चोट पहुंचानी होगी।

तानाषाही पर उतरे चीन को कड़ा संदेष देने की जरूरत है कि आज का यह बदलता भारत उसकी धौंस में आने वाला नहीं है। भारत अब ताकतवर देषों की श्रेणी में है, जिसके पास भारी सैन्यबल के साथ अद्वितीय मेधा, ज्ञान, कौषल से लैस युवाओं की बड़ी फौज है। जिनकी जिद और जुनून के आगे किसी भी देष की मनमानी नहीं चलेगी। भारत आत्मनिर्भरता के मार्ग पर चलने के लिए उठ खड़ा हुआ है। यही बात चीन को गड रही है।

भारत को अब बिना समय गवाएं कई जरूरी क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल कर लेने के प्रयास प्रारंभ कर देने चाहिए। अफसोस की बात है कि वर्तमान में कई तरह के उत्पाद, जो कि हमारे देष में बहुत आसानी से निर्मित किए जा सकते हैं, उनका आयात भी हम चीन से करने लगे हैं। जैसे- बच्चों के खिलौने, बिजली का सामान, दवाइयों के लिए कच्चा माल, भगवान की मूर्तियां, कृत्रिम फूल आदि। यदि इस तरह की वस्तुओं का चीन से आयात बंद कर भारत में ही पुनः निर्माण होने लगे, तो देष में रोजगार के करोड़ों अवसर उपलब्ध होंगे। इन्हीं सब कारणों के मद्देनजर प्रधानमंत्री ने देष को आत्मनिर्भर बनाने का नारा दिया है। भारत के आत्मनिर्भर होने से सबसे अधिक लाभ कृषि तथा सूक्ष्म-लघु एवं मध्यम उद्योग क्षेत्र को होना है। इसके लिए हमें केवल सरकार के भरोसे न बैठकर जनता को इस अभियान में आगे आना होगा। इलेक्ट्रॉनिक सामानों सहित चीन में निर्मित सभी वस्तुओं के उपयोग पर स्वतः अंकुष लगाने के लिए जनता को जागरूक करना होगा। जब भारतीय नागरिक ही चीन के सामानों का उपयोग बंद कर देंगे, तो किस प्रकार और किसके लिए चीन निर्मित सामान सरकार आयात कर सकेगी।

चीन से आयात की जाने वाली बहुत सी वस्तुएं ऐसी है जिनका निर्माण भारत के गांव में कुटीर एवं लघु उद्योग स्थापित कर आसानी से किया जा सकता है। दरअसल कुटीर एवं लघु उद्योगों के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने उत्पाद को बेचने की रहती है। इस समस्या का समाधान करने हेतु सरकार की सहायता से एक मॉडल विकसित किया जा सकता है, जिसके अंतर्गत 100 गांवों को शामिल कर एक कलस्टर (इकाई) का गठन किया जा सकता है। 100 गांव की इस इकाई में कुटीर एवं लघु उद्योगों की देष, काल, परिस्थिति के मुताबिक स्थापना की जाए एवं इनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं को इन्हीं 100 गांवों में बेचा जाए। गांव के सरपंचों से उनकी सहमति लेकर उन पर यह जिम्मेवारी डाली जानी चाहिए कि वह इस प्रकार का माहौल तैयार करने में बढ़-चढ़कर मदद करें कि इन गांवों में निवास कर रहे नागरिकों द्वारा इन कुटीर उद्योगों में निर्मित वस्तुओं का उपयोग वरीयता के आधार पर किया जाए, ताकि इन उद्योगों द्वारा निर्मित सामानों को सफलतापूर्वक बेचा जा सके। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि स्थानीय स्तर पर, स्थानीय जरूरतों के हिसाब से निर्मित वस्तुओं को स्थानीय स्तर पर ही बेचा जाना चाहिए। ग्रामीण स्तर पर हर्बल सामान जैसे- साबुन, तेल आदि का निर्माण करने वाले उद्योग, चॉकलेट टॉफी आदि का निर्माण करने वाले उद्योग, कुकी और बिस्कुट, मक्खन, देसी घी, पनीर, दही, छाछ आदि का निर्माण करने वाले उद्योग, मोमबत्ती, अगरबत्ती, दियासिलाई बनाने वाले उद्योग, सोडा और ठंडा पेय उद्योग, फलों का गुद्दा निकालने, अंचार तैयार करने वाले उद्योग, डिस्पोजल कप, प्लेट, पत्तल, दोना, गिलास, टोकरी का निर्माण करने वाले उद्योग, कपड़े व चमड़े का बैग तथा जूता आदि बनाने वाले उद्योगों के साथ-साथ इस तरह के जरूरी सामानों को हजारों उद्योग लघु स्तर पर हो सकते हैं, जिनकी स्थापना ग्रामीण स्तर पर की जा सकती है।

खास बात यह है कि इस तरह के उद्योगों को शुरू करने में अधिक राषि के निवेष की आवष्यकता भी नहीं होती तथा घर के सदस्य मिलजुलकर इस तरह के कार्यों को आसानी से संपादित कर सकते हैं। परंतु इसके लिए जरूरी है कि 100 गांव की इकाई में निवास कर रहे सभी नागरिकों को उनके आसपास इन कुटीर एवं लघु उद्योगों द्वारा निर्मित की जा रही वस्तुओं के उपयोग को न सिर्फ प्राथमिकता देनी होगी, बल्कि जरूरत पड़ने पर अनिवार्यता का भी लक्ष्य शामिल करना पड़ सकता है। अगर इसमें सफलता मिल जाती है तो उन उद्योगों को अपने माल बेचने संबंधी बड़ी समस्या का समाधान मिल सकता है। मार्केटिंग के मोर्चे पर समाधान मिलने के बाद ऐसी इकाईयों के उत्पादन में भी भारी पैमाने पर वृद्धि होगी।

इन इकाईयों द्वारा तैयार किए गए माल की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए भी समय-समय पर कदम उठाने होंगे। देष स्तर पर 100 गांवों के उत्पादनों की वर्ष में एक या दो बार प्रतिस्पर्धा भी कराई जा सकती है, जिससे कि लोगों के भीतर अच्छे उत्पादन की रुचि विकसित हो। इस स्थिति में कारीगर भी अपने हुनर को निखारने का प्रयास करेंगे। राज्य के स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर अच्छा काम करने वाली इकाइयों को पुरस्कृत कर इसमें और अधिक गति लाई जा सकती है। पर यह तय है कि इस मॉडल की सफलता सरकार के सहयोग तथा सरपंचों एवं ग्रामीणों की भागीदारी पर ही अधिक निर्भर होगी।

केंद्र सरकार ने अभी तक जो भी कदम उठाए हैं, वे सभी सही दिषा में जा रहे हैं। केंद्र की नकल पर उत्तर प्रदेष की योगी सरकार ने एक अनोखी पहल प्रारंभ कर दी है। उत्तर प्रदेष सरकार ने अपने सभी जिलों में ‘वन डिस्टिक, वन प्रोडक्ट’ (ओडीओपी) योजना का प्रारूप तैयार किया है। इस योजना में जिला स्तर पर स्थानीय स्वाभाव,वहां मौजूद कच्चा माल तथा उस विषेष क्षेत्र की विषेषज्ञता के आधार पर निर्माण की इकाइयां स्थापित करने की योजना है। जैसे- लखनऊ क्षेत्र में चिकनकारी, आम की बागवानी, इलाहाबाद में बीड़ी और अमरूद, आगरा का पेठा और चमडा का काम, कन्नौज का इत्र, भदोही के गलीचे, मिर्जापुर के मिट्टी के बर्तन, मऊ के धागे आदि के बड़े पैमाने पर उत्पादन किए जाएंगे। सरकार इन उत्पादों को बाद में बड़ी मंडियों तक ले जाने और इसके विक्रय में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने पर विचार कर रही है। उड़ीसा, बिहार सहित कुछ और राज्यों ने भी स्थानीयउद्योगों के लिए उत्साह दिखाया है। जिसके परिणामस्वरुप देष में लोकडाउन के बाद आर्थिक गतिविधियों में कुछ-कुछ तेजी दिखाई दे रही है। हालांकि केंद्र के निर्णय का प्रभाव मध्यम एवं दीर्घ अवधि में ही देखने को मिलेगा, लेकिन अल्पकालीन अवधि में वस्तुओं की मांग स्थानीय स्तर पर निर्मित करना अत्यंत आवष्यक है। इसके लिए जरूरी है कि रोजगार के अवसर अधिक उत्पन्न हो, ताकि लोगों के हाथ में पैसा पहुंचे। निष्चित रूप से यह कार्य ग्रामीण इलाकों में लघु एवं कुटीर उद्योगों को अधिकाधिक संख्या में स्थापित कर शीघ्रता से पाया जा सकता है।

भारत का इतिहास समय समय पर आई चुनौतियों से निपटने और फिर अपने दम पर आगे बठने का इतिहास रहा है। वर्तमान में करोना की वैष्विक महामारी के बीच देष कई अन्य आफतो का भी सामना कर रहा है। लंबे लाकडाउन के कारण सुस्त पडी अर्थव्यवस्था को फिर से गति देने, अम्फान और निसर्ग जैसे चक्रवाती तूफानपीडितों की मदद करने, आए दिन महसूस किए जा रहे भूकम्प का डर दूर करने, विनाषकारी टिडडी दलों से फसलों की रक्षा करने आदि के साथ-साथ सीमा पर मचे घमासान से भी निपटना पड रहा है। ऐसे में आत्मनिर्भरता का महामंत्र सौ तालों की एक चाभी जैसा है। इसमें कोई दो राय नही कि अगर हमारे छोटे मध्यम और कुटीर व्यापार एक बार पूरी क्षमता के साथ चल पडे तो देष के भीतर की सारी समस्याएं तो हल होंगी ही चीन जैसे देष की हेकडी भी सदा-सदा के लिए खत्म हो जाएगी।  

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