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नई शिक्षा नीति 2020: लक्ष्मी और सरस्वती के बीच सामंजस्य की चुनौती

Admin September 02, 2020

नई शिक्षा नीति शिक्षा व्यवस्था में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट की व्यवस्था कर इसे अत्यंत लचीला बनाने का प्रावधान हमारे समक्ष प्रस्तुत कर रही है। कोई विद्यार्थी कही से भी किसी कोर्स में आ सकता है और कोई कही भी किसी कोर्स के लिए जा सकता है। — अनिल तिवारी


बहुप्रतीक्षित नई षिक्षा नीति 2020 आ गई है। अगर कुछ एक शंकाओं को दरकिनार कर देखें तो यह षिक्षा नीति देष की अपनी सामाजिक संपदाओं, देषज ज्ञान और लोक भावनात्मकता को आधुनिकता से जोड़कर भारत में पूर्ण नागरिक के निर्माण का पथ प्रदर्षित करती हुई दिख रही है। इस षिक्षा नीति के तहत षिक्षित दीक्षित मनुष्य आत्मनिर्भर भारत की आधारषिला बन सकते हैं, जो कि किताबी ज्ञान के साथ-साथ मानवीय मूल्यों को प्रतिस्थापित करने की इसमें ललक है जो कि मौजूदा षिक्षा व्यवस्था की जड़ता को तोड़कर एक नए प्रषिक्षित भारत का प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है।

मुझे याद है कि पिछले साल भारत नीति प्रतिष्ठान की ओर से प्रोफ़ेसर कस्तूरी रंगन समिति द्वारा तैयार किए गए नई षिक्षा नीति के मसौदे के प्रावधानों पर चर्चा के लिए एक सत्र आयोजित किया गया था। डॉ कुलदीप रतनू की देखरेख में आयोजित कार्यक्रम में जेएनयू के वाइस चांसलर रहे डॉ कपिल कपूर, विवेकानंद फाउंडेषन से जुड़े श्री मुकुल कनित्कर, स्वदेषी जागरण मंच के अखिल भारतीय सह संयोजक डॉ अश्वनी महाजन सरीखे विद्धान लोगों ने हिस्सा लिया था। तब बातचीत में कहा गया था कि अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी के साथ हमारी समृद्ध षिक्षा पद्धति को नष्ट करने के लिए इसे ट्रिपल ई से जोड़ दिया था। वे तीन ई है- इंग्लिष, एजूकषन व एम्प्लॉयमेंट। परिचर्चा में कहा गया कि नई षिक्षा नीति अगर इस ट्रिपल ई की दीवार ढ़ाहने में समर्थ होती है तो भारत की षिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन संभव है। क्योंकि समाज की जरूरत षिक्षा और उसके बाद रोजगार सृजन की होती है। भाषा तो समाज अपने देष काल परिस्थिति से प्राप्त करता है। भाषा के मामले में भारत से उन्नत कोई देष नहीं है, इसलिए हमें हमारी अपनी भाषाओं पर केंद्रित होना होगा। नहीं तो हम एक बार नहीं तीन बार भी न्यू न्यू न्यू करेंगे तो भी षिक्षा नीति नई नहीं हो सकेगी।

संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर ने कहा था कि हमारे देष में षिक्षा के दरवाजे सभी के लिए खुले होने चाहिए। 34 साल बाद देष को मिली नई षिक्षा नीति मोटे तौर पर बाबासाहेब के विचारों को समर्पित दिखती है। इसमें बच्चों की नींव मजबूत करने से लेकर उनके भविष्य की इमारत को भी सुदृढ़ करने का लक्ष्य दिखाई देता है। षिक्षा व्यवस्था का दायरा बढ़ाना षिक्षा के माध्यम के तौर पर मातृभाषा और स्थानीय भाषाओं को प्रोत्साहन देना उच्च षिक्षा में आवारा पूंजी की दादागिरी खत्म करना षिक्षकों की गुणवत्ता में सुधार लाना जैसे ढेर सारे प्रावधान किए गए हैं। जिससे देष में एक नई षिक्षा संस्कृति विकसित होने का संकेत नीति में दिख रहा है। लक्ष्य महत्वाकांक्षी है पर पहुंच से बाहर नहीं है। जरूरत है इसे इसी रूप में जमीन पर उतारने की जैसी ऐसे गढ़ने वालों ने कल्पना की है।

कौषल और विषेषज्ञता दोनों के लिए यह षिक्षा नीति समुचित स्पेस देने की कोषिष करती हुई दिख रही है। तीन वर्ष का अंडर ग्रेजुएट कोर्स करने के बाद कोई नौजवान नौकरी या किसी अन्य पेषे से जुड़ सकता है। इस नीति में एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह किया गया है कि पूरे देष में पांचवीं कक्षा तक निष्चित रूप से, आठवीं कक्षा तक वरीयता के आधार पर और उसके बाद आगे की पढ़ाई में इच्छित आधार पर स्थानीय या मातृभाषा में पढ़ाई की जा सकेगी। इससे छात्रों का संबंध गांव, घर परिवार से ही नहीं बल्कि स्कूल व समाज से भी बना रहेगा। हम सभी जानते हैं कि मातृभाषा स्थानीय भाषाएं अपने साथ सामाजिक अनुभव संवेदनात्मक मूल्यों व भावनात्मकता की पूंजी लेकर चलती है। वर्तमान स्कूली पद्धति में इसका अभाव है। के.जी. से ही अंग्रेजी का भूत हमें भगाने लगता है और हमारा संबंध धीरे-धीरे कम होने लगता है। जिसका नतीजा यह होता है कि हम अपने सामाजिक अनुभवों संवेदना ओ आदि की परंपरा से कटने लगते हैं। अगर भविष्य के षिक्षित मनुष्य के निर्माण में हमारे पूर्व के ज्ञान अनुभव मूल्य और संवेदनात्मक परंपराएं आधार तत्व की तरह मौजूद रहे, जिसका 100 प्रतिशत संज्ञान यह नीति ले रही है तो यह एक बेहतर नागरिक बनाने के हमारे लक्ष्य को हासिल करने में सक्षम दिखाई दे रही है।

नई षिक्षा नीति 2020 षिक्षा व्यवस्था में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट की व्यवस्था कर इसे अत्यंत लचीला बनाने का प्रावधान हमारे समक्ष प्रस्तुत कर रही है। कोई विद्यार्थी कहीं से भी किसी कोर्स में आ सकता है और कोई कहीं भी किसी कोर्स के लिए जा सकता है। एक जगह से छोड़कर दूसरे जगह जाने पर भी उसका समय व्यर्थ नहीं जाएगा। यह छात्रों के भीतर जड़े जमा चुके फ्यूटिलिटी सिंड्रोम (बेकारी की आशंका) को समाप्त करेगा। भविष्य को लेकर चिंतित अथवा किसी खास पाठ्यक्रम की पढ़ाई के बाद व्यर्थता तथा बेकारी की आषंका को दूर करने में सक्षम है। इस नीति में प्रावधान है कि छात्र अपना जो भी समय जिस कोर्स के लिए देंगे उसका कोई न कोई परिणाम उन्हें अवष्य मिलेगा। यह षिक्षा नीति यह वादा करती है कि किसी का भी भविष्य अंधकार में नहीं होगा। वह जिस लायक होगा उसे उसी में आगे का रास्ता मिलता जाएगा। कौषल और विषेषज्ञता दोनों के लिए यह षिक्षा नीति समुचित स्पेस देने की कोषिष करती हुई दिख रही है। तीन वर्ष का अंडर ग्रेजुएट कोर्स करने के बाद कोई नौजवान नौकरी या किसी अन्य पेषे से जुड़ सकता है। जो चौथे साल का कोर्स करेगा वह शोध में दाखिला लेकर किसी विषिष्ट क्षेत्र में विषेषज्ञता हासिल कर सकता है।

नई षिक्षा नीति 2020 अनेक संरचनात्मक बदलाव के लिए भी पहल करती हुई दिख रही है। अभी तक हमारे यहां अनेक संस्थाएं षिक्षा के विभिन्न आयामों के लिए बनी है। भारत में षिक्षा की दुनिया अगर बड़ी न हुई होती तो यह व्यवस्था चल ही रही थी लेकिन अब संभव नहीं है क्योंकि इसका फैलाव बहुत अधिक हो चुका है। भारतीय षिक्षा व्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी षिक्षा व्यवस्था में शुमार है। ऐसे में इस षिक्षा नीति के निर्माण से जुड़े लोगों का मानना है कि उच्च षिक्षा के क्षेत्र में एक ही नियामक संस्था होने से भारतीय उच्च षिक्षा के संचालन में आसानी होगी। पष्चिमी देषों की तरह भारतीय षिक्षा व्यवस्था में भी अब रैंकिंग पर जोर देकर गुणवत्ता विकसित करने की प्रक्रिया को ज्यादा सक्षम बनाने की कोषिषें इस नीति में शामिल है। विदेषी विश्वविद्यालयों का देष में आगमन और निजी क्षेत्र के उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों का प्रसार भी इस नई व्यवस्था के जरिए आसान होता हुआ दिख रहा है। इस बात की सफल कोषिषें करने का दम यह नीति भर रही है।

इस नई षिक्षा नीति के पीछे काम कर रहे दृष्टिकोणों की तारीफ हो रही रही है। कुछ षिक्षाविदों का कहना है कि इस पर अमल करना इतना आसान नहीं होगा जैसा कि सरकार द्वारा दावा किया जा रहा है पर डॉ. अश्वनी महाजन  मानते हैं कि शिक्षा का बजट बढ़ाकर अगर इस नीति को हू-ब-हू जमीन पर उतारा दिया गया तो निष्चित रूप से षिक्षा के क्षेत्र में एक युगांत कारी परिवर्तन दिखेगा। सच है कि कोई भी परिवर्तन लागू करना इतना आसान काम नहीं होता,उसमें तरह तरह की बाधाएं आती है। देषकाल परिस्थिति के मुताबिक उस पर अमल करना पड़ता है पर उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र की प्रतिबद्ध सरकार इसे हर हाल में आकार देगी और इस नीति को व्यवसायिक जामा पहनाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोडेगी। सरकार के अब तक के काम करने के अंदाज से यह संदेष भी है कि सरकार सोच समझकर कदम उठाती रही है तथा तात्कालिक नफा नुकसान को किनारे रखकर देष के दूरगामी हितों के लिए आवष्यक निर्णय की प्रतिबद्धता दिखाई है।

मालूम हो कि बाजार और समय की जरूरतों के अनुरूप षिक्षा को ढालने की एक समय बहुत आलोचना की जाती थी लेकिन बदलते समय और परिवेष में रोजगार और बाजार एक दूसरे से गुंहते जा रहे हैं ऐसे में आलोचकों को अपनी आलोचना के रंग ढंग भी बदलने होंगे। अब विदेषी षिक्षा संस्थानों से डरने की नहीं उनसे मुकाबला कर भारतीय उच्च षिक्षा को विश्व स्तर पर स्थापित करने की जरूरत है।

प्रो वाइस चांसलर डॉ कपिल कपूर का स्पष्ट कहना है कि हमें रैंकिंग के भूत से डरने की नहीं मुकाबला करने के लिए नए भारतीय मानकों के अनुरूप प्रारूप बनाने चाहिए। उन्होंने बताया कि विश्व रैंकिंग के लिए दुनिया के देष जो पैमाना बनाते हैं उसमें वह अपने अनुरूप मानक रखते हैं और उसी मानक पर किसी को ऊंचा उठाते हैं किसी को नीचे धकेल देते है। उन्होंने दावा किया कि विश्व षिक्षा बिरादरी अगर कुछ भारतीय मानकों को भी शामिल कर ले तो भारत हर रैंकिंग में सर्वोपरि होगा।

इस षिक्षा नीति को लेकर एक और आलोचना बार-बार की जा रही है कि अगर निजी संस्थाओं को ज्यादा महत्व दिया गया तो सरकारी षिक्षण संस्थान जिसमें गरीब गुरबा के बच्चे पढ़ते हैं उनके अस्तित्व पर संकट न पैदा हो जाए। संकट ठीक है, पर शंका करने वालों को यह बात भी स्मरण करना चाहिए कि वर्तमान में केंद्र की एनडीए सरकार की छवि गरीब समर्थक सरकार की छवि है। गरीबों के जीवन में नया सवेरा लाने के लिए सरकार ने अनेकों योजनाओं का सफल संचालन किया है। निजी पूंजी की आक्रमकता को रोकने के लिए सरकार संजीदा है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि एक गरीब हितैषी सरकार गरीबों की अनदेखी नहीं करेगी बल्कि उन्हें आगे बढ़ने के लिए मौका प्रदान करेगी।        ु

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।)
 

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