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कृषि विधेयक और भारतीय किसान

Admin October 26, 2020

अब तक की सरकारों ने कृषि और किसान को लूटकर ही विकास की बात की है और वैसी ही योजनाएं बनाई है। अब भाजपा सरकार कुछ बदलने की इच्छा से कृषि विपणन व्यवस्था आसान बनाने की कोशिश कर रही है, तो उसका विरोध किसान का अहित करने जैसा है। — अनिल जवलेकर

भारतीय लोकतंत्र राजनीति से भरपूर है। यहां विरोधी पक्ष सचमुच विरोध करते है, चाहे सरकार उनकी ही मांगों को क्यों न मूर्तरूप दे और उस तरह से कायदे कानून की व्यवस्था क्यां न करे। सरकार द्वारा की गई हर बात को नकारना और उसके विरोध में आंदोलन करना, अब भारत के लोकतंत्र की एक आम बात हो गई है। ऐसा ही कुछ सरकार द्वारा लाये गये कृषि विधेयकों के साथ हो रहा है। किसान भारत की राजनीति का एक ऐसा हिस्सा है जिसके हितों की बात तो सभी करते है, लेकिन उस तरफ कदम उठाने का साहस करना कोई नहीं चाहता। अब तक की सरकारों ने कृषि और किसान को लूटकर ही विकास की बात की है और वैसी ही योजनाएं बनाई है। अब भाजपा सरकार कुछ बदलने की इच्छा से कृषि विपणन व्यवस्था आसान बनाने की कोषिष कर रही है, तो उसका विरोध किसान का अहित करने जैसा है। 

कृषि विधेयक किसान के हित की बात करते है

भारतीय संसद में पारित हुए ‘कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) विधेयक, 2020’, ‘कृषक (सषक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक’ और ‘आवष्यक वस्तु (संषोधन) विधेयक, 2020’ तीनों विधेयक अब कानून बन गए है। यह तीनों कानून भारतीय कृषि उत्पाद विपणन व्यवस्था को आसान बनाने की एक कोषिष कही जाएगी। 

1. पहली बात जो हमें समझनी जरूरी है, वह यह है कि विधेयक किसी भी तरह से समर्थन मूल्य और तदानुसार सरकारी एजंसियों द्वारा खरीद की व्यवस्था को खारिज नहीं करते। वैसे ही जमीन के मालिकाना हक पर इन कानून के अंतर्गत किए गए किसी भी करार से बाधा नहीं आएगी। 

2.    दूसरी बात यह है कि भारत एक छोटे किसानों का देष है और आने वाले समय में भी रहेगा। यह बात भी स्पष्ट है कि यह छोटा किसान अपनी कृषि योग्य जमीन पर बहुत ज्यादा निवेष नहीं कर सकता या फिर यह कहिए कि नई तकनीकी और नई पद्धति से कृषि नहीं कर सकता। ऐसे समय कृषि में उपज और उत्पादन बढ़ा पाना अकेले किसान के लिए मुष्किल होता है। कोई कृषि उद्योग या व्यापारी उसकी जमीन की उपज और उत्पादन बढ़ाने में मदद करे तो किसान का लाभ ही होगा। विधेयक किसान और कृषि उद्योग तथा व्यापारियां में रही दूरियां कम करेगा। 

3. तीसरी बात इन विधेयकों की यह होगी कि अब किसान अपनी फसल कही भी और किसी को भी बेच सकेगा। अब किसान एपीएमसी के तथा नियमित (रेगुलेटेड) मंडी में जाकर कुछ बेचने या न बेचने को स्वतंत्र है। 

4.    चौथी बात जो कि महत्वपूर्ण कही जाएगी, वह यह है कि अब किसान व्यापारी तथा उद्योग से बुआई के समय ही करार द्वारा फसल की कीमत तय कर सकता है और बेचने के बारे में निष्चित हो सकता है। यह सभी जानते है कि उद्योगों को भी अच्छे उत्पाद की जरूरत होती है और अगर किसान के साथ मिलकर सहयोग से वह यह व्यवस्था कर सकते है तो दोनों के लिए लाभदायक होगा। यही उद्योगी अपने स्वार्थ के लिए ही सही किसान को नई तकनीकी तथा नई पद्धति अपनाने में सहयोग करेंगे और उत्पादन बढ़ाने की कोषिष करेंगे, जिसका लाभ किसान को भी होगा। 

5.    एपीएमसी अपनी सेवाओं के लिए मार्केट फीस तथा अन्य वसूली करती है जो किसान को ही देनी पड़ती है, अब अगर किसान फसल को कहीं और बेचता है तो उसे इससे छुटकारा मिल सकता है। इसमें किसान और उपभोक्ता दोनों को लाभ होगा। 

कृषि सुधारों का विरोध आधारहीन है

नए कृषि विधेयकों का विरोध कुछ विरोधी दल, बहुत सारे बिचौलिये और प्रगति प्राप्त कृषि राज्य के कुछ किसान कर रहे है। उन्होंने द्वारा उठाए कुछ मुद्दे इस प्रकार है :-

1.    विरोधियों को लगता है कि नयी व्यवस्था समर्थन मूल्य आधारित सरकार एजंसियों द्वारा की जाने वाली फसल खरीद व्यवस्था को खत्म कर देगी। वैसे तो ऐसा विधेयकों में कुछ नहीं है। सरकार भी इस पर सफाई दे चुकी है। समर्थन मूल्य घोषित करना तथा इस पर आधारित सरकारी खरीद व्यवस्था अपनी जगह काम करती रहेगी। 

2. विरोधियों को लगता है कि अभी एपीएमसी जैसे रेगुलेटेड मंडिया खत्म कर दी जाएगी और निजी क्षेत्र की मंडिया ही रहेगी। ऐसा होने की संभावना कम है। रेगुलेटेड मार्केट में भी निजी व्यापारी ही खरीद-फरोख्त करते है। किसान और व्यापारियों को यह सहूलियत रहेगी कि उनको कहां फसल बेचनी या खरीदनी है। स्पर्धा तो होगी यह बात सही है और दोनों को खरा उतरना पड़ेगा।

3. विरोधियों को लगता है कि नई व्यवस्था में करार माध्यम से जो कुछ होगा उसमें किसान एक कमजोर पार्टनर के तौर पर रहेगा और निजी कंपनियां या व्यापारी उसका शोषण करेंगे।

4. विरोधियों को ऐसा भी लगता है कि व्यापारी और कंपनियां किसान से सीधे फसल खरीदने में ज्यादा ध्यान देगी, न कि मंडिया खड़ी करने में। जहां किसान अपनी फसल की अच्छी कीमत तय कर सके। आज जैसे रेगुलेटेड मंडियाओं में सुविधा होती है वैसी सुविधा निजी क्षेत्र नहीं देगा और एक कार्टेल की तरह काम करेगा, जिसमें किसान को नुकसान होगा।

5. विरोधियों को ऐसे भी लगता है कि आज की रेगुलेटेड मंडियों में किसान के प्रतिनिधि होते है, वैसा प्रतिनिधित्व निजी मंडियों में नहीं होगा और किसान की समस्या को नजरंदाज किया जाएगा।  

वैसे विरोधियों द्वारा उठाए गए मुद्दें नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा। लेकिन यह बात ध्यान में रखनी होगी कि रेगुलेटेड मंडिया सौ वर्षों से भी अधिक समय से काम कर रही है और भारतीय स्वतंत्रता के बाद की सरकारों ने भी उसी व्यवस्था को मजबूत करने की कोषिष की है। 1990 से शुरू हुये आर्थिक सुधारों मे भी कृषि क्षेत्र बाहर ही रहा। आज तक की व्यवस्था में किसान खुष था, ऐसी बात नहीं थी। इसलिए सुधार करने की कोषिष हो रही है, उसका स्वागत करना चाहिए। 

नई व्यवस्था के फायदे 

नई व्यवस्था मुख्यतः कृषि उत्पाद का व्यापार खुला करने की बात करती है, जो कि आजतक एपीएमसी के यार्डो और उनके लायसंस धारणकर्ता तक सीमित था। 

1. नई व्यवस्था में किसान अपनी फसल कही भी किसी को भी, दाम निर्धारित करके बेच सकता है। किसान चाहे तो अपनी फसल रेगुलेटेड मंडी में भी ले जा सकता है। 

2. किसान अपनी शर्तों पर अब किसी व्यापारी या कंपनी या और किसी से पहले ही करार कर सकता है, जिसके द्वारा फसल की कीमत और खरीद तय हो और बुआई से लेकर कटाई तक का सहयोग भी स्पष्ट हो। इसमें किसान को नई तकनीक वगेरह का लाभ मिल सकेगा और उत्पादन तथा उत्पादकता बढ़ने का लाभ दोनों को मिल सकेगा। 

3. सभी जानते है कि व्यापारियों की मिली भगत और कमीषन की कतार में किसान को मिलने वाली कीमत उपभोक्ता तक पहुँचने में काफी बढ़ जाती है। ऐसे बिचौलियों की टोली अब किसान और उपभोक्ता के बीच नहीं आ सकेगी। नियमित मंडी में लगने वाला कमीषन भी अब देना नहीं पड़ेगा, जिससे किसान और उपभोक्ता दोनों को लाभ होगा। 

4. किसान और बिचौलियां के हटने से नए तरीके से व्यापार बढ़ेगा और उसका परिणाम यह होगा कि किसान की बहुत सी फसल व्यापार के दरमियां जो बर्बाद होती थी, वो अब नहीं होगी।

5.    नई व्यवस्था में किसान मंडियों पर नजर रख सकेगा और जहां दाम अच्छे मिल रहे है वहीं अपनी फसल बेच सकेगा। व्यापारियों को भी अच्छी फसल तलाषना आसान होगा। 

सुधार की आवष्यकता थी 

यह अच्छी बात है कि सरकार ने कृषि उत्पादों के विपणन व्यवस्था में सुधार की कोषिष की है। रेगुलेटेड मंडी की व्यवस्था अमल में लाये सौ साल से ज्यादा समय हुआ है। भारतीय सरकार ने स्वतंत्रता के बाद भी यह व्यवस्था मजबूत की, लेकिन किसान की समस्या हल नहीं हुई। इसलिए नए सुधार भी आवष्यक थे। वैसे सुधार की गुंजाइष हमेषा से रहती है और रहेगी।  सरकार को भी संवेदनषील रहकर किसान की समस्या की ओर ध्यान देना चाहिए। 

किसान को और भी मदद की जरूरत रहेगी 

भारतीय कृषि की जो बात महत्वपूर्ण है, वो यह है कि छोटा किसान और उसकी कम जमीन पर की जाने वाली कृषि आने वाले समय में भी रहेगी और अच्छी से अच्छी व्यवस्था भी यह समस्या हल नहीं कर पाएगी। इसलिए किसान की जो भी फसल हो उसके वाजिब दाम उसको मिलने ही चाहिए। सरकार समर्थन मूल्य पर सभी किसानों की फसल खरीद नहीं सकेगी, यह बात समझनी होगी। इसलिए अच्छा होगा कि किसान जब अपनी फसल समर्थन मूल्य से कम दाम पर बेचे तो उसकी पूर्ति करने की व्यवस्था हो। किसान की नजदीकी मंडी को आधार मानकर यह व्यवस्था हो सकती है। सरकार के समर्थन मूल्य और वास्तविक कीमत में जो फर्क होगा उसकी अदायगी करने की व्यवस्था ही इस समस्या का हल हो सकता है। और वही कोशिश होनी चाहिये।

अनिल जवलेकर :- सदस्य एकात्म प्रबोध मंडल (एकात्म विकास समिति ) मुंबई,
निवृत्त्त अधिकारी - नाबार्ड, 
प्रबंध समिति सदस्य - उत्तन कृषी संशोधन संस्था, केशवसृष्टी, उत्तन, भायंदर, ठाणे महाराष्ट्र 
'India's Perspective Policy on Agriculture' एवं 'Droughts and way Forward' इन पुस्तक के सहाय्यक संपादक , 
स्वदेशी जागरण मंच की 'स्वदेशी पत्रिका' (इंग्रजी व हिन्दी) लिखते रहे हैं। 

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