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अनिवार्य लाईसेंस की मांग खैरात नहीं हमारा हक हैः डॉ. महाजन

स्वदेशी जागरण मंच ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में ट्रिप्स (बौद्धिक संपदा कानून) के प्रावधानों में छूट देते हुए अनिवार्य लाइसेंस दिए जाने की मांग की है। आज जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी से त्राहि-त्राहि कर रही है, अमेरिका-यूरोप जैसे विकसित देष ट्रिप्स और पेटेंट जैसे कानूनों की आड़ लेकर मुनाफाखोर दवा कंपनियों के पक्ष में खड़े हैं। स्वदेशी जागरण मंच के अखिल भारतीय सह संयोजक डॉ. अश्वनी महाजन ने दुनिया भर के लोगों से संगठित लड़ाई का आह्वान करते हुए कहा है कि दोहा बैठक के बाद बनी सहमति के मुताबिक अनिवार्य लाइसेंसिंग की मांग कोई खैरात नहीं है, बल्कि विकासशील गरीब देशों का हक है।

स्वदेशी जागरण मंच के तत्वावधान में बीते 14 मई 2021 को विकासशील और गरीब देशों के लिए सस्ती वैक्सीन और जीवनरक्षक दवाइयों को लेकर गूगल मीट पर एक वेबीनार का सफल आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम में जाने-माने अर्थषास्त्री, चिकित्सक, विधिवेत्ता सहित कई अन्य विशेष विशेषज्ञ लोग सम्मिलित हुए। इस दौरान सभी ने एक स्वर से समूची आबादी के लिए वैक्सीन तथा जीवन रक्षक दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए ट्रिप्स के प्रावधानों में छूट तथा अनिवार्य लाइसेंस दिए जाने को लेकर जनमत तैयार करने तथा समान सोच के लोगों को एक मंच पर लाकर संगठित लड़ाई की बात कही। कमोबेश सभी जानकारों का यह मानना था कि अनिवार्य लाइसेंस से ही मुनाफाखोर कंपनियों का तिलिस्म तोड़ा जा सकता है।

अपनी बात रखते हुए डॉ. महाजन ने कहा कि स्वदेशी जागरण मंच का संघर्षों का अपना इतिहास रहा है। साल 1995 में विश्व व्यापार संगठन बनने के साथ ही ट्रिप्स समझौता लागू हो गया था। इस समझौते में सदस्य देशों पर यह शर्त थोपी गई थी कि वह पेटेंट संबंधी अपने सभी बौद्धिक संपदा कानूनों को बदलेंगे और सख्ती से लागू करेंगे। तब भी स्वदेशी जागरण मंच ने इस समझौते का खुलकर विरोध किया था, क्योंकि इससे जन स्वास्थ्य को खतरा था। उस दौरान मंच के आह्वान पर भारत के अनेक संगठनों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विरोध का झंडा बुलंद किया था। अमीर मूल्कों का सारा दबाव धरा का धरा रह गया। भारत ने अपने पेटेंट कानूनों में संशोधन कर जन स्वास्थ्य को बचाया था।

उन्होंने कहा कि संषोधित पेटेंट अधिनियम 1970 के अध्याय-16 में अनिवार्य लाइसेंस का प्रावधान है। सरकार इसका उपयोग करते हुए अगर अन्य फार्मा कंपनियों को दवा उत्पादन का लाइसेंस जारी कर देती है तो कोविड-19 से लड़ने में आ रही दवा व वैक्सीन की कमी को समय रहते दूर किया जा सकता है तथा दवा की कालाबाजारी को भी पूरी तरह से रोका जा सकता है। उन्होंने बताया कि अपनी सार्वभौमिक शक्तियों का उपयोग करते हुए हाल ही में भारत और दक्षिण अफ्रीका की सरकारों ने ट्रिप्स प्रावधानों में छूट की मांग की है। इस पर दुनिया के 100 से अधिक देशों ने सहमति जताते हुए हस्ताक्षर किया है। हालांकि बड़ी फार्मा कंपनियों के हमराज़ बड़े और विकसित देश इसमें अड़ंगा लगा रहे हैं, लेकिन स्वदेशी जागरण मंच ने पूर्व की भांति एक बार फिर इस मसले को लेकर निर्णायक लड़ाई का ऐलान किया है। उन्होंने बताया कि दुनिया भर के संगठनों को एकजुटकर इस मसले पर ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। डॉ. महाजन ने कहा कि अनिवार्य लाइसेंस की मांग कोई खैरात की मांग नहीं है, बल्कि अपनी आबादी की स्वास्थ्य रक्षा के लिए यह हमारा हक है, जो कि पेटेंट प्रावधानों में पहले से ही शामिल है।

ऑनलाइन संगोष्ठी की शुरूआत करते हुए अनिल शर्मा ने विषय प्रवर्तन किया तथा कहा कि भारत में 70 प्रतिशत लोगों को सुरक्षित करने के लिए वैक्सीन की 200 करोड़ डोज की जरूरत है। वर्तमान में केवल 2 कंपनियां ही वैक्सीन बना रही हैं, इसलिए विकसित देशों की तुलना में विकासशील और गरीब देशों में वैक्सीन के टीकाकरण की रफ्तार बहुत ही धीमी है। अमेरिका जहां 45 प्रतिषत लोगों का टीकाकरण कर चुका है, वहीं भारत में अभी कुल 10 प्रतिशत के आसपास है। विदेषों में बन रही वैक्सीन के दाम इतने महंगे हैं कि गरीब देशों में टीकाकरण समय से नहीं हो सकता है। मॉडर्ना, थाइजर, जॉनसन एंड जॉनसन आदि के दाम इतने ऊचें हैं कि उसे गरीब मुल्क खरीद ही नहीं सकते। चाइना में बनी वैक्सीन भी बहुत महंगी है। रूस से आने वाली स्पूतनिक का दाम भी हमारी वैक्सीनों के मुकाबले बहुत ऊंचा है। श्री शर्मा ने कहा कि भारत सरकार ने डब्ल्यूटीओ से निवेदन किया है कि ट्रिप्स के प्रावधानों में छूट दे दी जाती है तथा पेटेंट कानूनों के तहत अनिवार्य लाइसेंस जारी किया जाता है तो गरीब और विकासशील देशों में भी वैक्सीन रफ्तार के साथ उत्पादित की जा सकती है तथा वैश्विक टीकाकरण को सर्वसुलभ बनाया जा सकता है। श्री शर्मा ने कहा कि आज की बैठक का मकसद दुनिया भर के जन स्वास्थ्य से सरोकार रखने वाले संगठनों को इस मसले पर एकजुट करना तथा ट्रिप्स में छूट दिए जाने और अनिवार्य लाइसेंस के जरिए अन्य दवा कंपनियों को भी दवा उत्पादन में आगे लाना है। उन्होंने कहा कि सरकारें अपने हिसाब से इस मसले पर अपना काम करती हैं, करेंगी भी, लेकिन बतौर नागरिक और संगठन हम सबका यह दायित्व है कि इस महामारी के समय में मानवता की रक्षा के लिए एकजुट होकर प्रयास करें। 

इस क्रम में थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क के संस्थापक व साइबर मामलों के जानकार वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाकुमार ने कहा कि सरकार अगर अपनी दृढ़ इच्छाषक्ति दिखाती है तो अगले 3 महीने में भारत के सभी लोगों का टीकाकरण किया जा सकता है। श्री कुमार ने कहा कि अभी केवल भारत बायोटेक और एसआईआई (सिरम इंस्टीटयूट ऑफ इंडिया) को वैक्सीन बनाने का लाइसेंस जारी किया गया है, इसे बढ़ाकर तीन चार कंपनियों को और दे दिया जाता है तो दो-तीन हफ्ते के भीतर ही भारत में वैक्सीन की पर्याप्त मात्रा उत्पादन की जा सकती है। उन्होंने बताया कि यद्यपि भारत अगर ऐसा कदम उठाता है तो इसके खिलाफ कुछ कंपनियां अदालत का रुख कर सकती हैं, लेकिन पेटेंट कानून के क्लाज़ 82 और 84 में अनिवार्य लाइसेंस के लिए पहले से ही प्रावधान है। जिस तरह एचआईवी और एड्स के टीकों के दौरान भी बड़ी फार्मा कंपनियों ने विरोध किया था, लेकिन अंत में उन्हें मुंह की खानी पड़ी, उसी तरह कोरोना की वैक्सीन को लेकर भी उन्हें निराषा ही हाथ लगेगी। जरूरत है एकजुट होकर अनिवार्य लाइसेंस के लिए दबाव बनाया जाए तथा देष में अधिकाधिक संख्या में वैक्सीन का उत्पादन कर अपनी पूरी आबादी का टीकाकरण किया जाए और यह लक्ष्य समय रहते हासिल किया जा सकता है। जिस तरह कोविषील्ड के लिए ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका को विश्वास में लेकर सिरम इंस्टीट्यूट उत्पादन कर रहा है, उसी तरह भारत सरकार को भी चाहिए कि भारत बायोटेक को एक न्यूनतम कमीषन लेकर अन्य फार्मा कंपनियों को अनिवार्य लाइसेंस जारी कर देना चाहिए।

बैठक के दौरान अनिलेश महाजन ने सुरक्षा के मुद्दे को रेखांकित करते हुए कहा कि आनन-फानन में लाइसेंस जारी कर देना कोई बहुत बुद्धिमानी का काम नहीं होगा। उन्होंने कहा कि कोरोना लगातार अपना रूप बदल रहा है, ऐसे में किसी एक स्वरूप को लेकर बेतहाशा उत्पादन भी व्यर्थ का सौदा हो सकता है। श्री महाजन ने कहा कि हमें सावधानी बररते हुए इस मामले में आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि तकनीक का हस्तांतरण बड़ा ही संवेदनशील मामला है। अनिवार्य लाइसेंस जारी कर बेहतर परिणाम की आशा आशंकाओं से भरी हुई है। ट्रेड सीक्रेट का भी मामला है। इसलिए हमें केस टू केस अध्ययन करना पड़ेगा और समय सीमा के भीतर सभी को दवाई और वैक्सीन भी उपलब्ध करानी हमारी प्राथमिकता में है।

डॉ विनोद ने अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत की जनता दुनिया भर की बड़ी फार्मा कंपनियों की महंगी वैक्सीन को वहन नहीं कर सकती, ऐसे में केंद्र सरकार का यह दायित्व है कि वह आगे-आगे तथा अपनी सार्वभौमिक शक्तियों का उपयोग कर भारत की जनता को जल्द से जल्द राहत दिलाएं। उन्होंने कहा कि अभी दो महीने पहले तक हम दुनिया में वैक्सीन निर्माण तथा टीकाकरण को लेकर सबसे आगे थे। हमें उन बातों का भी अध्ययन करना चाहिए कि आखिर कौन सी ऐसी खामी रह गई, जिसके चलते हम दवा और वैक्सीन के मोर्चे पर पिछड़ गए। इस काम में देष के गांव-गांव में फैले वेटेनरी अस्पतालों के कर्मियों का भी सहयोग लिया जाना चाहिए। 

स्वदेशी पत्रिका के संपादक अजय भारती ने अपनी बात रखते हुए सरकार की ओर से बरती जा रही लापरवाही को इंगित किया। उन्होंने कहा कि पिछले साल कोरोना की पहली लहर के दौरान सरकारों ने जितनी तत्परता दिखाई थी, वैसे ही गंभीरता दूसरी लहर के दौरान नहीं दिखी। लोगों ने एक तरह से मान लिया कि अब कोरोना इस देश से धीरे-धीरे चला गया, यह ढीलापन भारी पड़ा है। उन्होंने कहा कि हमें एकजुट होकर इस महामारी के खिलाफ गंभीर लड़ाई लड़ने की जरूरत है। सरकार ने कोविड-19 रिस्पांस टीमों के गठन का भी ऐलान किया है। हमें एक साथ खड़े होकर पॉजिटिविटी अनलिमिटेड के लिए आगे आना होगा तथा देष की आबादी को इस महामारी से बचाने के लिए टीका और दवाई के मुकम्मल इंतजाम के लिए दिन रात काम करना होगा।

स्वदेशी जागरण मंच की पहल पर आयोजित तथा लगभग 3 घंटे तक चली इस संगोष्ठी में विनोद जौहरी, अनीता पांडे, डॉ. फूलचंद, अनिल शर्मा, दीपक शर्मा, रजत महाजन, अवनीश, प्रो. संजीव कुमार, कमलजीत, विनय कपूर, रविंद्र नाथ दुबे, लिंगामूर्ति, मालिनी जी सहित बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया।

अंत में सरोज मित्र (सरोज दा) ने स्वदेशी जागरण मंच की ओर से सभी सहभागियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।
 

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