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देश की संप्रभुता के लिए खतरनाक है विदेशी सोशल मीडिया

इंटरनेट मीडिया को रास्ते पर आने की हिदायत देते हुए केंद्र की सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है और कहा है कि अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे पर लोगों को भटकाने के बजाय कंपनियां भारत के कानून का पालन करें। — अनिल तिवारी

 

सरकार और विदेशी मल्टीनेशनल कंपनी ट्विटर के बीच तनातनी बढ़ गई है। हालांकि संसद की उच्च अधिकार प्राप्त संसदीय समिति ने गत दिनों कंपनी के नुमाइंदों को तलब कर स्पष्ट शब्दों में समझा दिया है कि देश का कानून सर्वोपरि है, किसी कंपनी के खुद की नीति नहीं। लेकिन गुस्ताख मल्टीनेशनल कंपनी ट्विटर ने यह कहकर कि हम अपनी खुद की नीतियों का पालन करते हैं, मामले में तनाव को और ज्यादा भड़काने की कोशिश की है।

यह पहला मौका नहीं है जब कोई विदेशी कंपनी अपने पांव पसारने के चक्कर में किसी देश की संप्रभुता को चुपके से चुनौती देने और अपना विस्तार बढ़ाने की कोशिश की हो। इसे और ठीक से समझने के लिए हमें लगभग 450 साल पहले के इतिहास की ओर लौट कर देखना चाहिए। ईस्वी सन् 1600 में बनी ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम पर अंग्रेज बहादुर भारत में व्यापार करने के लिए आए थे। उस समय ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम थी, जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को एशिया में कारोबारी साम्राज्य बढ़ाने की हरी झंडी दी थी। अंग्रेजों ने कंपनी को असीमित अधिकार देते हुए भारत पर कब्जा जमाने का ब्लूप्रिंट भी दिया था। प्रारंभ में कंपनी एशियाई देशों में केवल कारोबार की बात करती थी, लेकिन उसका गुप्त इरादा मुख्य रूप से भारत को कब्जे में करने का था। तब का भारतीय समाज विदेशी कंपनी के गुप्त इरादों को भांप नहीं पाया, जिसके चलते ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में कारोबार करते-करते भारत देश में सरकार बनाने की साजिश तक में कामयाब हो गई थी। कंपनी की साजिश को साकार करने वालों में कुछ गिने-चुने हिंदुस्तानियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। अंग्रेजों की नकल करने और उनके सामानों पर फिदा कुछ भारतीय ऐसे भी थे जो कंपनी का उत्पाद बढ़-चढ़कर खरीदते थे तथा खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे। छह ऋतुओं और 27 नक्षत्रों वाले वैभवशाली विरासत वाले भारत देश में खुद को चौबीसों घंटे टाई सूट और हैट में नाथकर खुद को श्रेष्ठ बताने का मिथ्या बोध भी करते थे। यही वह गिने-चुने लोग थे जो कंपनी का बनाया कपड़ा पहनते थे, कंपनी की चाय पीते थे और कंपनी का खुलकर इश्तहार भी करते थे।

ईस्ट इंडिया कंपनी के ही नक्शे कदम पर चलते हुए अब विदेशी सोशल मीडिया कंपनियां ट्विटर, व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि व्यापार करने के नाम पर भारत में आ धमकी हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी पर किताब लिखने वाले निक रॉबिंसन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ‘‘आज की बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों की तुलना 425 साल पुरानी ईस्ट इंडिया कंपनी से ही की जानी चाहिए, क्योंकि हाल के वर्षों में आई मल्टीनेशनल विदेशी कंपनियों की हरकतों को देखें तो इनकी साजिशों से सहज ही पर्दा उठने लगता है’’। इन कंपनियों का भारत के आंतरिक व्यापार शेयर, बाजार में उतार-चढ़ाव और यहां तक कि आयात-निर्यात जैसे महत्व के मामले में भी इनका असर और दखल दिखता है। ये कंपनियां अपने फायदे के लिए हमारे देश के हुक्मरानों, नेताओं को ही नहीं बल्कि अपने ही देश के खिलाफ षड्यंत्र करने वाली ताकतों के बीच भी अपनी पैठ मजबूत करती हैं। सनद रहे कि उस दौर की ईस्ट इंडिया कंपनी भी ऐसी ही ताकतों के बीच नजदीकियां बढ़ाने की हर संभव कोशिश करती थी। उनके द्वारा तत्कालीन राजाओं को खुश करने के किस्सों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं।

एक बात और जैसे आज के गूगल, फेसबुक, ट्विटर जैसी कंपनियां धंधा तो भारत में करती हैं लेकिन इनके मुख्यालय सात समंदर पार उन देशों में स्थित हैं जहां से इनके आका चाबी भरते हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी भी एशिया में व्यापार फैलाने के लिए आई थी, पर उसके द्वारा की जाने वाली साजिशों का ताना-बाना बुनने का केंद्र बर्मिंघम पैलेस था। मालूम हो कि ऐसी कंपनियां केवल अपना हित देखती हैं। जरूरत पड़ने पर ये देशों को दंगों की आग में झोंकने से भी नहीं चुकती हैं। खासकर चुनाव के समय ऐसे नेताओं और दलों से गलबहिया करती हैं, जिससे उनकी कंपनियों द्वारा तय लक्ष्य पूरा होता रहे। यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि ये वही दल और नेता होते हैं जो गार्जियन, वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबारों में छपी खबर के आधार पर कभी देश को विदेश में बदनाम करते हैं तो कभी देश को नीचा दिखाने के लिए चीन और पाकिस्तान जैसे पारंपरिक दुश्मन देशों के पक्ष में खड़े दिखते हैं।

ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह ही आज की ये विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियां भारतीय संविधान की अनदेखी करते हुए अब केंद्र सरकार पर मौका देख आंखें भी तरेर रही हैं। अब समय बदल गया है। दुनिया के शक्तिशाली देशों का रुझान भूगोल से ज्यादा अर्थशास्त्र पर है। तब की ईस्ट इंडिया कंपनी भारत जैसे देश के उर्वर भूगोल पर कब्जा करने के लिए निकली थी और अपने अभियान में बहुत हद तक सफल हुई थी। आज की यह तथाकथित कंपनियां देश के बाजार पर कब्जा करने की होड़ में लगी हैं। यही कारण है कि वह बाजार की आड़ में अपनी पसंद की राजनीति करने में लगी है, ताकि उनको फायदा पहुंचाने वाले और देश का नुकसान करने वाले नेता देश की सत्ता पर काबिज हो जाए। 

आज की अमेरिकी कंपनियां व्यापार करते-करते हम भारतीयों को बताने लगी है कि अभिव्यक्ति की आजादी क्या होती है? लगता है देश का संविधान हम नहीं यह कंपनियां तय करेंगी? किसका पोस्ट हटाना है, किसका लगाना है या सोशल मीडिया के किस एकाउंट को रोकना है, किसको आगे बढ़ाना है, इसे तय करने का अधिकार भी ये कंपनियां अपने पास रखती हैं। इनसे कोई सवाल नहीं पूछ सकता है, ये देश में आग लगाने वाली पोस्ट डालने वालों का नाम हमें आपको तो क्या, सरकार को भी नहीं बताएंगी? क्योंकि उनकी नजर में देश में आग लगाना भी अभिव्यक्ति की आजादी है। देशद्रोही ताकतों को पकड़वाने में मदद करने की बजाय ये उनके बारे में जानकारी छिपाने का काम करती हैं। वहीं दूसरी तरफ ऐसी ताकतों के खिलाफ मुंह खोलने वालों का एकाउंट बंद कर देने की इनकी ओर से धमकी दी जाती है। सरकार पर दबाव बनाने के लिए ये कंपनियां ऐसी ताकतों से मिलकर लाबिंग भी करती है। मौजूदा सरकार को बदनाम करने के लिए जातीय, धार्मिक और सांप्रदायिक उन्माद की फर्जी खबरें चलाई जाती है। ज्ञात हो कि जब सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारत के कड़े रुख के कारण पाकिस्तान को विंग कमांडर अभिनंदन को छोड़ना पड़ा तो ये कंपनियां पाकिस्तान के पक्ष में प्रोपेगेंडा मशीन बन गई थी। पाकिस्तान की शान में कसीदे गढ़े गए। इमरान खान ग्रेट, इमरान फॉर पीस, गुडविल, जेस्चर जैसे कैंपेन चलाए गए। इन कंपनियों की नकल करते हुए भारत के कई नेताओं ने भी इमरान की तारीफ की तथा भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध टालने के लिए उन्हें संत तक कह डाला।

भले ही हम आप ऐसी कंपनियों को एक दूसरे से जुड़े रहने का साधन मानते हों, लेकिन यह देश तोड़ने का हथियार हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है हमारे देश के विपक्षी राजनीतिक दल इनके पक्ष में क्यों खड़े होते हैं? मामला चाहे पुलवामा का हो, गलवान का हो, या टूल किट का हो, ये कंपनियां सच बोलने की जगह सरकार को ही संविधान की याद दिलाने लगती है।

बाहरहाल इंटरनेट मीडिया को रास्ते पर आने की हिदायत देते हुए केंद्र की सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है और कहा है कि अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे पर लोगों को भटकाने के बजाय कंपनियां भारत के कानून का पालन करें। सरकार का मानना है कि ट्विटर ग्राहकों की आजादी पर मनमाना ब्रेक लगाती है और भारत के साथ पक्षपात भी करती है। ये कंपनियां अपने ग्राहकों का डाटा व्यापारिक हित साधने के लिए अन्य कंपनियों को भी देती हैं। सरकार के पास कई ऐसे सबूत है जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से भारत के हितों को लगातार नुकसान पहुंचाने की साजिश रची जा रही है। इन पर कड़े अंकुश की दरकार है।

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