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जीएम फसलें: वैज्ञानिकता, विवाद और समाधान

Admin October 24, 2020

अगर सरकारें जागरूक नहीं हुई तो अपने आर्थिक लाभ के लिये मोन्सेन्टो जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण को नष्ट करके सम्पूर्ण मानवता के साथ खिलवाड़ करती रहेगी। — डॉ. रेखा भट्ट

बीटी बैंगन का जीनांतरित संदूषण भारत की जैव विविधता और पर्यावरण के लिये भी खतरा है। यदि परीक्षण के पष्चात् बड़े स्तर पर जीएम फसलों की खेती की अनुमति दी जाती है तो बीटी जीन की कुछ वर्षों में सैकड़ों नई जीएम पेटेंट किस्में, जीन संषोधन तकनीक से विकसित हो जाएगी। इस तरह के ट्रांसजनिक जीन को प्राकृतिक स्थानान्तरण द्वारा जैविक व अजैविक घटनाक्रम में असन्तुलन उत्पन्न होगें जो परिस्थितिकी तंत्र को दीर्घ काल में अप्रत्यक्ष हानि पहुँचायेंगे।

ज्ञात हो कि पारम्परिक कृषि पद्धति में प्राकृतिक विधि से प्रकीर्णन, संकरण आदि प्रक्रियाओं पर आधारित हजारों वर्षों के अनुवांषिक सुधार में अनुप्रयोगों के बाद फसलों में जंगली पूर्वजों की तुलना में अधिक उपज के गुण और नई विषेषताओं को वर्तमान फसलों में सम्मिलित किया जा सका है और जंगली पौधों के प्रकृति में अधिक समय तक संरक्षित रह सकने के  गुण को भी कृषि योग्य फसलों में सम्मिलित किया जा सका। प्राकृतिक रूप से फसलों के अनुवांषिक सुधार में लगने वाले अनेक वर्षों के समयान्तराल को सीमित करने और पारम्परिक व प्राकृतिक विधियों में अनिष्चितता को समाप्त करने के लिये वर्तमान वैज्ञानिकों द्वारा अनुवांषिक संषोधन प्रौद्योगिकी या जैनेटिकली मोडिफाईड इंजीनियरिंग (जीएम प्रौद्योगिकी) द्वारा बीटी कॉटन, बीटी बैंगन व जीएम सरसों आदि जैव संवर्धित जीएम फसलों को विकसित किया गया है। फसलों में किसी विषेष गुण को विकसित करने के लिये, नई विषेषता वाले संवाहक जीन को भिन्न प्रजाति के स्रोत से पृथक कर लिया जाता है और चयनित फसलीय पौधे की कोषिकाओं में स्थानान्तरित कर दिया जाता है इस प्रकार अनुवांषिक संषोधन प्रौद्योगिकी द्वारा नए जीन को चयनित फसल के जीनोम में जोड़कर एक नई फसल प्राप्त की जाती है।

फसलों पर ऐसी कीटनाषक दवाओं का छिड़काव किया जाता है जो मिट्टी के प्राकृतिक बैक्टीरिया, बेसिलस थुरिजएन्सिस (बीटी) से बनाई जाती है। विषेषकर सब्जियों व कॉटन के विनाषकारी कीड़ों को खत्म करने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। बीटी बैक्टीरियम में यह जीन उपस्थित होता है जो ऐसे कीटनाषक प्रोटीन पैदा करते हैं जो खास तरह के कीड़ों को मार सकते हैं। उन जीन की पहचान कर जैनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से बैंगन के बीजों में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। इन ट्रांसजेनिक पौधों के साथ कीटनाषक बीटी प्रोटीन की मात्रा का भक्षण करने से फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

जीएम तकनीक बीटी बैंगन के विनाषकारी कीड़ों के नियंत्रण की अंतर्निहित प्रक्रिया उपलब्ध कराती है और रसायनिक कीटनाषक की जरूरत को काफी कम कर देती है। बीटी फसल खेतों में लाये जाने पर इस जीन के वाहक परागकण हवा में उड़ कर या मधुमक्खी जैसे पतंगों द्वारा परागण की प्रक्रिया से कई किलोमीटर क्षेत्र की सामान्य अन्य प्रजातियों में पहुँचकर प्राकृतिक फसलों को संक्रमित कर देते हैं। बैंगन जैसी क्रॉस परागण फसल में जीन सम्मिश्रण का खतरा अधिक बढ़ जाता है क्योंकि यहाँ खेतों का आकार बहुत छोटा है और सभी खेत एक दूसरे से मिले हुए हैं। जीएम पौधों का परागण सामान्य प्रजातियों से होने से ऐसी खरपतवार फैल सकती है जो किसी भी प्रकार के रसायन से भी नष्ट नहीं होती इन्हें सुपर खरपतवार कहा जाता है।

जीन सम्मिश्रण से उत्पन्न नई प्रजाति में कीटों व खरपतवार नाषक के प्रति प्रतिरोधक क्षमता मूल जीएम फसल की तरह विकसित होती जा रही है। बीटी फसलों पर राउण्ड अप नाम से प्रचलित ग्लाईफोसेट व ग्लूफोसिनेट खरपतवार नाषक लम्बे समय से प्रयोग में लिये जा रहे हैं। इन खरपतवार नाषकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई और प्रतिरोधी खरपतवार वनस्पति ओर अधिक संख्या में फैलने लगी। 

जीन सम्मिश्रण के कारण उत्पन्न प्रतिरोधी खरपतवार तेजी से खेतों में फैलकर उपज नष्ट कर देती है और खेती की जमीन को बंजर बना देती है। पिगवीड नामक एक नई सुपर खरपतवार अमेरिका के कई प्रांतों साउथ व नार्थ केरोलिना, अरकनसास, केंटुकी और मिसुरी में फैल चुकी है। इससे इतना विनाष हुआ कि जार्जिया के मेकन काउंटी में दस हजार एकड़ से अधिक भूमि पर किसानों ने खेती करना बंद कर दिया। जार्जिया प्रान्त अब तेजी से बंजर प्रदेष में बदलता जा रहा है। इस सुपर खरपतवार ने खेतों पर तब कब्जा किया जब किसानों ने मोसेंटो कम्पनी की जीएम सोयाबीन और जीएम कॉटन फसल उगाई।

भारत की सीमा पर बांग्लादेष में मोन्सेंटो की कृषि जैव तकनीकी सहायता परियोजना को मूर्त रूप देने में महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड कम्पनी सहभागी है। बीटी बैंगन के बांग्लादेष में होने वाले उत्पादन के फलस्वरूप उत्पन्न संकर परागण से सीमा से लगे भारत जैसे देष भी प्रभावित होंगे। 

नई जीएम फसलों के सम्मिश्रण के अलावा विकृत रोगग्रस्त जीएम फसलों के सम्मिश्रिण होने का भी खतरा बढ़ जाता है। वास्तव में स्थानान्तरित जीन एक विषिष्ट लक्षण के साथ-2 कई अनपेक्षित लक्षणों को भी नियन्त्रित करता है। इन लक्षणों से उत्पन्न दुष्प्रभावों को जीन स्थानान्तरण प्रक्रिया के दौरान तुरन्त नहीं पहचाना जा सकता। जीन स्थानान्तरण प्रक्रिया के दौरान यदि पूर्व नियत स्थिति में जीन की स्थिति निर्धारित नहीं हो पाती तथा जीनों का पुनर्विन्यास हो जाने या जीन एकीकृत हो जाने के कारण उत्पन्न विकृत जीएम फसलें भी प्राकृतिक प्रजातियों के साथ सम्मिलित हो जाती है। जैसे जीएम सोया में बढ़ी हुई लिंग्निन की मात्रा या जीएम कॉटन में कपास के गोलों का विरूपण होना। बीटी की अपेक्षा रोगजनक सूक्ष्म जीवाणु में नये प्रकार का प्रवेषित जीन स्थानान्तरित हो जाता है तो पौधों में नये प्रकार के रोगों का उद्भव होगा। 

कुछ जीवों की जनसंख्या में अचानक आई गिरावट कीट संपर्क विकार के प्रत्यक्ष प्रमाण है। जैसे जैविक कीट नियंत्रक के रूप में सन् 1930 से बीटी जीन का उपयोग किया जा रहा है। इस जीन द्वारा बैंगन व कॉटन की फसल में ट्रांसजैनिक लक्षण उत्पन्न किया जाता है और वे पौधे विषाक्त कीटनाषी पदार्थ उत्पन्न करने लगते हैं। इन फसलों से प्राप्त बीटी परागकणों की प्राकृतिक रूप से मिलने वाली जहरीली खुराक के लम्बे समय से सेवन के कारण मोनार्क तितलियों के लार्वा की जनसंख्या में तेजी से कमी आई है। चीन में बीटी कॉटन की फसल में बीटी जीन केवल बॉलवार्म नामक कीटों को नियंत्रित करते रहे और बीटी कॉटन में दूसरे प्रकार के मिरिड बग नामक कीट प्रभावी हो गया। भारत के महाराष्ट्र में बॉलवॉर्म कीट धीरे-धीरे बीटी प्रतिरोधी हो गये। इस कारण कई गुना अधिक कीटनाषकों की आवष्यकता पड़ने लगी। किसानों द्वारा इस आर्थिक भार को ऋण लेकर वहन किया गया तो भी जीएम कपास की फसल को अन्य प्रकार के कीटों से नहीं बचाया जा सका। बीटी जीन के प्रभावी होने की अवधि के पहले तथा बाद की अवस्था में फसल में विषाक्त कीटनाषक पदार्थ उपस्थित नहीं रहता इस अवस्था में फसल को कीटों के प्रकोप से नहीं बचाया जा सका।

जीएम प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत प्रयोगषाला में अनुवांषिक रूप से उन्नत बनाये गये पौधे खेती के लिये कृषि क्षेत्रों में स्थानान्तरित किये जाते हैं, जहाँ देषज और जंगली प्रजातियों के साथ जीएम फसलें स्वयं को स्थायी प्रजाति के रूप में स्थापित कर लेती है। प्रकृति में प्रवेष करायी गई जीएम फसलें कम समय में उपज देने के विषिष्ट गुण के कारण तेजी से विकसित होती है और देषज फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा उत्पन्न कर प्राकृतिक चयन का दबाव बढ़ाती है।

इस प्रतिस्पर्धा से अनाज की प्राकृतिक किस्में एवं वनस्पतियाँ धीरे-धीरे नष्ट होने लगेगी और जैव विविधता का क्षरण होगा। इस तरह जीन संवर्धन तकनीक के कारण जंगली प्रजातियों की अनुवांषिक रूप से उपयोगी विषिष्टताएँ समाप्त हो जायेगी और उनके परिस्थितिकी व्यवहार में अन्तर आयेगा जो सम्पूर्ण परिस्थितिकी तंत्र में असन्तुलन उत्पन्न करेगा।

बीटी जीएम मक्का को वैज्ञानिक परीक्षण द्वारा जैव विविधता क्षरण पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाली फसल मान लिया गया है। सम्पूर्ण परिस्थितिकी तंत्र में जीएम फसलों के सम्मिलित होने से सभी जैविक समुदायों पर अत्यन्त सूक्ष्म तथा दीर्घकाल तक स्थायी रहने वाले प्रभाव होते हैं। इन वनस्पतियों पर आश्रित शाकाहारी जीवों, पराग पर आश्रित जीव तथा परागण के लिये उŸारदायी कीटों की संख्या पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा और आज अनेक कीट प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर है। इस तरह कीटों व कई जीवों की प्रजातियां नष्ट होने से खाद्य श्रृंखला टूटती जा रही है और परिस्थितिकी तंत्र असन्तुलित हो रहा है।

जीएम फसलों के उत्पादन से प्राप्त बीजों की उत्पादन क्षमता नष्ट हो जाती है। अतः प्रत्येक बुवाई में कृषक के नए बीज खरीदने के लिये इन बीजों से एक ही प्रकार की जीएम फसल की प्रजाति का उत्पादन करते रहना पड़ता है। इससे एकल फसल (मोनो कल्चर) संस्कृति का चलन, जैव विविधता के लिये खतरा बन गया है। जीएम फसलों  की लागत अधिक होती है क्योंकि इसके लिये प्रत्येक बुवाई के लिये नये बीज खरीदने पड़ते हैं और जीएम प्रौद्योगिकी पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के एकाधिकार के कारण किसानों को महंगे बीज अमेरिका की दिग्गज कृषि-रसायन कम्पनी मोन्सेंटो से खरीदने पड़ते हैं तथा कीटनाषक व खरपतवारनाषकों के प्रति प्रतिरोधकता निर्मित कर चुकी जीएम फसलों के लिये कीटनाषक व खरपतवार नाषक इन्हीं बहुराष्ट्रीय कृषि-रसायन कम्पनियों से खरीदने पड़ते हैं।

जीएम फसलों की जनक और प्रचारक मोन्सेंटो जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी द्वारा जीएम फसलों के बेहतर होने के तीन मुख्य कारण बताये जाते हैं, पहला-जो गुण चयनित फसल में उपस्थित नहीं होता उसे पूरी तरह अलग जाति के जीव या जीवाणु द्वारा सफलतापूर्वक उस प्रजाति में पारित किया जा सकता है, दूसरा चयनित जीन के साथ में उपस्थित अतिरिक्त जीनों के स्थानान्तरित होने की समस्या से बचा जा सकता है और केवल विषिष्ट गुण वाले जीन को जोड़ना संभव होता है, तीसरा चयनित जीन संयोजन के गुण फसल के एक ही उत्पादन में दिखाई देने लगते हैं।

पर्यावरणविदों के अनुसार ट्रांसजेनिक फसलों द्वारा नये जीन के खाद्य श्रृंखला में आये प्रवाह को तब तक पर्यावरण समस्या नहीं बनाया जा सकता जब तक वह प्रत्यक्ष रूप से अवांछित घातक परिणाम न देने लगे। अभी तक ट्रांसजैनिक जीएम फसलों के परिस्थितिकी असन्तुलन जैसे दीर्घकालिक प्रभाव की मात्रा को मापना संभव नहीं हो सका है। अतः वैष्विक स्तर पर जैविक सुरक्षा मापदण्डों के अनुसार निर्धारित मात्रा में पर्यावरण हानि के प्रमाण प्राप्त नहीं होने तक अपने आर्थिक लाभ के लिये मोन्सेन्टो जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण को नष्ट करके सम्पूर्ण मानवता के साथ खिलवाड़ करती रहेगी।

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