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जीएम फसलें: वैज्ञानिकता, विवाद और समाधान-II

Admin December 04, 2020

हमें सम्पूर्ण मानवता के साथ कृषि, परिस्थितिकी तंत्रा और जैव विविधता को संरक्षित रखना है तो भारत में जीएम फसलों को किसी भी प्रकार से कृषि में सम्मिलित करने की अनुमति नहीं देनी चाहिये। — डॉ. रेखा भट्ट

 

जीएम फसलों को कृषि प्रयोगशाला से परीक्षण के लिये एक बार खेतों के प्राकृतिक वातावरण में लाये जाने के बाद उत्पन्न जैविक व पारिस्थिति असन्तुलन जैसी समस्याओं को नियन्त्रित नहीं किया जा सकेगा। अतः यह आवश्यक है कि सरकार द्वारा सुरक्षित व लाभदायक जैविक फसलों की वैज्ञानिक आधार कर पुष्टि करके खेती के लिये अनुमति प्रदान की जाये।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ इन दावों के आधार पर जीएम फसलों से उत्पन्न होने वाले मानव स्वास्थ्य, कृषि व पर्यावरणीय खतरों को निर्विवाद करने का प्रयास करती है। अमेरिका की दिग्गज कृषि-रसायन कम्पनी मोन्सेंटो खेती में विकास एवं नवाचार लाने के नाम पर अप्राकृतिक जीन स्थानान्तरण को पूर्णतः वैधानिक बताकर किसानों को आर्थिक लाभ देने तथा विश्व में खाद्य आपूर्ति की समस्या से निपटने का दावा करती है।

अमेरिकी मोंसेटों कम्पनी यह भी दावा करती है कि शहरीकरण के कारण खेती योग्य भूमि एक ओर समाप्त होती जा रही है, वहीं दूसरी और चीन, भारत, बांग्लादेश आदि देशों में तेज रफ्तर से बढ़ रही जनसंख्या के भरण-पोषण की व्यवस्था करने के लिये जीनान्तरित फसलों से उत्पादन क्षमता और पोषण क्षमता को बढ़ा सकते हैं। अधिक उर्वर होने के साथ इनमें कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होती। सबसे ज्यादा उगाये जाने वाले खाद्यान्न मक्का और बैंगन हैं। बैंगन में फ्रूट एड शूट बोरर नामक कीड़ा 80 फीसदी फसल खराब कर देता है किसानों को इस फसल के पांच महीने के चक्र में 30 से 70 बार तक कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है किसान जीएम  तकनीक के जरिये तैयार पौधों से कीड़ा लगने (बैक्टीरियल विल्ट) की समस्या से निजात पा सकते हैं।

जीएम तकनीक से तैयार पौधे सूखा व बाढ़ प्रतिरोधी भी बताये जाते हैं तथा यह कहकर किसानों को भ्रमित किया जाता है कि जीएम तकनीक से तैयार बीज साधारण बीज से ज्यादा उत्पादकता प्रदान करते हैं। 

2013 में बांग्लादेश सरकार द्वारा जीएम के नए बीज को व्यापारिक रिलीज की मंजूरी के बाद बीटी बैंगन के जीनान्तरित संदूषण के खतरे को देखते हुए ब्राजील जैसे देश ने जीएम फसलों की वैधानिकता को चुनौती दी है। अमेरिकी अदालत में कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ जीएम फसलों से क्रॉस परागण द्वारा सामान्य प्रजाति की फसलों को हुए नुकसान के एक हजार से अधिक मामले लम्बित पड़े हैं,कई हजार करोड़ का नुकसान हो चुका है। इस सम्बन्ध में बहुराष्ट्रीय कम्पनी बायर क्रॉप साइंसेज ने स्वीकार किया है कि जीएम फसलों का सामान्य फसल में परागण रोकने के उसके सारे प्रयास विफल हो गये हैं।

अमेरिका की अदालत ने बायर क्रॉप साइंसेज कम्पनी को मिसुरी के दो किसानों को 20 लाख डॉलर का जुर्माना चुकाने का आदेश दिया जिनकी धान की फसल प्रायोगिक परीक्षण के लिये लाई गई जीएम फसल की चपेट में आकर नष्ट हो गई।

अब तक 28 देशों में जीएम फसल की खेती होती है संकर विकास के प्रभाव से 30 प्रकार की सुपर खरपतवार फैल चुकी है जिन्हें सामान्य खरपतवारनाशक से नष्ट नहीं किया जा सकता । हालांकि अमेरिकी कृषि विभाग व वैज्ञानिक खेती में बड़े पैमाने पर होने वाले संकर विकार और सुपर खरपतवार के हमले की आशंका से इंकार करते रहे,इसके बावजूद फिलीपींस में 2011 में जीएम फसल के खेतों में परीक्षण पर इसलिये रोक लगा दी गई थी क्योंकि शोधकर्ताओं व सरकार ने इस हेतु आवश्यक सार्वजनिक विचार विमर्श नहीं किया था। यहां अस्वीकृत फसल उत्पादन के सुरक्षा परीक्षण मात्र तीन माह की अवधि के लिये किये गये थे।

मोन्सेंटो की प्रतिनिधि और 26 प्रतिशत हिस्सेदार (भारत में बीटी बैंगन के सुरक्षित बौद्धिक संपदा अधिकार सहित) कम्पनी महिको के बीटी बैंगन पर 2010 में तत्कालीन पर्यावरण मंत्रालय द्वारा रोक लगा दी गई थी। जुलाई 2020 में हरियाणा में गैर कानूनी तरीके से महिको से भिन्न बीटी बैंगन को किसानों द्वारा उगाते पाया गया। गुजरात, महाराष्ट्र और उŸार प्रदेश में भी बीटी बैगन की अवैध खेती जारी है। खेतों में बीटी बैंगन की परीक्षण परियोजना के अन्तर्गत महिको, महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड कम्पनी द्वारा किसानों को जीन संवर्धित बीज मुफ्त में बिना किसी रॉयल्टी के बांटे गये थे।

पर्यावरण मंत्रालय में जीएम फसलों की शीर्ष नियामक संस्था जैनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी (जीईएसी) द्वारा अगस्त 2020 में केन्द्र सरकार के भारतीय अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित बैंगन की दो नयी ट्रांसजैनिक किस्मों को द्वितीय जमीनी परीक्षण की अनुमति दे दी गई है। अपने निजी हितों व सुरक्षा पर मंडराते खतरों से अनभिज्ञ होने के कारण कुछ किसान समूह सरकार में महिको के बीटी बैंगन तथा अन्य जीएम फसलों को नियामकीय प्रक्रिया के माध्यम से जारी करने की मांग कर रहे हैं। महाराष्ट्र व दक्षिण के अन्य प्रान्तों में लाखों किसानों द्वारा बीटी कपास की खेती में नुकसान के नतीजों व हजारों किसानों की आत्महत्या के बावजूद वर्ष 2000 के बाद बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दबाव में भारत की पूर्ववर्ती केन्द्र सरकार द्वारा बीटी बैंगन, बीटी मक्का और जीएम सरसों की प्राकृतिक खेती की अनुमति दी गई जिसे स्वदेशी जागरण मंच के विरोध के कारण ही रोका जाना संभव हो सका था।

पूरे विश्व में किसानों को महंगे कीटनाशक व खरपतवारनाशक रसायन तथा जीन संवर्धित बीजों को बेचकर भारी मुनाफा कमाने वाली सबसे बड़ी मोन्सेंटो कम्पनी कृषि शोध संस्थानो, विश्व विद्यालयों को भारी मात्रा में विŸाय सहायता प्रदान करती है तथा वैज्ञानिक तथ्यों को प्रकट नहीं करने देती। अमेरिका में 90 प्रतिशत जीएम खाद्य पदार्थ उपयोग में लिये जाते हैं किन्तु उस पर जीएम अंकित नहीं करके सूचना के अधिकार पर भी बहुराष्ट्रीय मोन्सेंटो कम्पनी का नियंत्रण है। ग्रीनपीस इण्डिया के लिये प्रो. सेरालिनी समूह जीएम खाद्यान्नों के उपयोग के तहत भारतीय बीटी बैंगन की किस्मों के जहरीले प्रभाव का अध्ययन कर चुके हैं और इनमें व्याप्त जहरीले तत्वों से प्रतिरोधक शक्ति में कमी, आन्तरिक संरचना को क्षति, श्वास तथा चर्म रोगों जैसी स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति सचेत किया है।

खेती में विकास और नवाचार लाने, विश्व की खाद्य आपूर्ति की समस्या से निपटने, किसानों को आर्थिक लाभ देने के दावों के आधार पर मोन्सेंटो जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जीएम फसलों से उत्पन्न मानव स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभावों को निर्विवाद बना देती है। यदि हमें सम्पूर्ण मानवता के साथ कृषि, परिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता को संरक्षित रखना है तो भारत में जीएम फसलों को किसी भी प्रकार से कृषि में सम्मिलित करने की अनुमति नहीं देनी चाहिये।

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