भारत की वार्ता रणनीति का उद्देश्य केवल शीघ्र समझौता करना नहीं, बल्कि ऐसा समझौता सुनिश्चित करना है जो विकास, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय हित”-इन तीनों के बीच संतुलन स्थापित करे। — दुलीचंद कालीरमन
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता वर्तमान समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। दोनों देश विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ हैं और उनका द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ रहा है। फिर भी अंतिम व्यापार समझौते पर सहमति बनने में अपेक्षा से अधिक समय लग रहा है। इसका कारण टैरिफ का विवाद तो है ही बल्कि वैश्विक घटनाओं का भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ रहा है।
अमेरिका चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और भारत को एक वैकल्पिक विनिर्माण एवं आपूर्ति केंद्र के रूप में देखता है। दूसरी ओर, भारत इस अवसर का लाभ उठाना चाहता है, लेकिन अपने कृषि और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम क्षेत्रों से समझौता किए बिना। इसलिए भारत अपनी मजबूत मोलभाव की स्थिति बनाए हुए है।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने ऊर्जा, खाद्यान्न और उर्वरकों की वैश्विक कीमतों को प्रभावित किया है। भारत रूस से ऊर्जा आयात जारी रखे हुए है, जबकि अमेरिका भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाकर रूस से उर्जा आयात में बाधा खड़ी करना चाहता है। अमेरिका को यह भी अंदेशा है कि रूस ईरान की मदद कर रहा है। अमेरिकी रणनीतिकार भारत को रूस और चीन के खिलाफ़ खड़ा तो करना चाहते हैं लेकिन वे भारत के विकास में बाधाएं भी खड़ी कर रहें है ताकि भारत विकास की राह पर सरपट दौड़ न लगाये और एक दिन चीन की तरह अमेरिका को ही आखेँ दिखाने लगे।
इज़राइल-ईरान-अमेरिका संघर्ष और क्षेत्रीय तनाव के कारण समुद्री परिवहन, बीमा लागत और वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ है। इससे दोनों देश अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय व्यापार व्यवस्था चाहते हैं। अमेरिका अपने किसानों, उद्योगों और श्रमिकों के हितों की रक्षा करना चाहता है। इसलिए वह ऐसे समझौते से बचना चाहता है जिसे घरेलू स्तर पर राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़े। इसके अतिरिक्त भारत ने हाल के वर्षों में कई देशों और समूहों के साथ व्यापार समझौते किए हैं तथा अन्य पर बातचीत जारी है। इससे भारत के पास विकल्प बढ़े हैं और वह अमेरिका के साथ किसी भी समझौते में जल्दबाजी नहीं करना चाहता। दुनिया के कई देश अपने घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं का उपयोग कर रहे हैं। भारत और अमेरिका दोनों भी कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में यही दृष्टिकोण अपना रहे हैं, जिससे वार्ता जटिल हो जाती है।
क्या केवल वैश्विक कारणों से ही देरी हो रही है?
भारत की लगभग आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। अमेरिका चाहता है कि भारत अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों पर आयात शुल्क कम करे ताकि अमेरिकी उत्पाद भारतीय बाजार में आसानी से प्रवेश कर सकें। दूसरी ओर, भारत को आशंका है कि ऐसा होने पर छोटे किसान और डेयरी उत्पादक अमेरिकी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। इसलिए भारत इस क्षेत्र में अत्यधिक सावधानी बरत रहा है।
अमेरिका दवा, सॉफ्टवेयर और तकनीकी क्षेत्रों में कड़े बौद्धिक संपदा कानून चाहता है। इस कारण भारत के जेनेरिक दवा उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। भारत डेटा संप्रभुता का समर्थक है और चाहता है कि भारतीय नागरिकों का संवेदनशील डेटा भारत में ही सुरक्षित रहे। अमेरिका डेटा के अपेक्षाकृत मुक्त प्रवाह का समर्थन करता है। इस विषय पर भी दोनों देशों के दृष्टिकोण अलग हैं।
भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि समझौते के बाद अमेरिका भविष्य में अचानक नए टैरिफ या व्यापारिक प्रतिबंध लागू न करे। दोनों देशों में सरकारों को अपने किसानों, उद्योगों, श्रमिकों और व्यापारिक संगठनों के हितों का ध्यान रखना पड़ता है। इसलिए कोई भी पक्ष जल्दबाजी में समझौता नहीं करना चाहता।
भारत के दृष्टिकोण से ट्रेड डील के लाभ
यदि अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों पर शुल्क कम होता है तो वस्त्र, इंजीनियरिंग, रत्न एवं आभूषण, रसायन और फार्मा उत्पादों का निर्यात बढ़ सकता है। निर्यात बढ़ने से उत्पादन बढ़ेगा और उद्योगों में लाखों नए रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं, विशेषकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, टेक्सटाइल और ऑटो कंपोनेंट क्षेत्र में। अमेरिकी कंपनियाँ भारत में नई उत्पादन इकाइयाँ स्थापित कर सकती हैं। इससे पूंजी निवेश, रोजगार और आधुनिक तकनीक का विस्तार होगा। अमेरिका अपनी आपूर्ति श्रृंखला को विविध बनाना चाहता है। भारत इस रणनीति का प्रमुख लाभार्थी बन सकता है। सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा तकनीक, अंतरिक्ष और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ सकता है। भारत का आईटी और सेवा क्षेत्र अमेरिकी बाजार में और अधिक अवसर प्राप्त कर सकता है, जिससे सेवा निर्यात बढ़ेगा।
अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा से भारतीय उद्योग गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार करेंगे। अमेरिकी निवेश और तकनीक से भारत वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में और मजबूत हो सकता है। यदि भारतीय उत्पाद अमेरिकी गुणवत्ता मानकों को पूरा करें, तो मसाले, फल, चावल और समुद्री उत्पादों का निर्यात बढ़ सकता है।
ट्रेड डील में संभावित चुनौतियाँ
सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय किसानों के लिए चुनौती बन सकते हैं। अमेरिकी डेयरी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा से छोटे दुग्ध उत्पादकों और सहकारी संस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है। छोटे उद्योगों को बड़ी अमेरिकी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी। यदि आयात निर्यात से अधिक बढ़ता है, तो भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है। व्यापार समझौते की शर्तों के कारण भविष्य में भारत कुछ संरक्षणवादी नीतियाँ आसानी से लागू नहीं कर पाएगा।
यदि अमेरिकी कंपनियों को सरकारी परियोजनाओं में अधिक अवसर मिलते हैं, तो भारतीय कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। डेटा सुरक्षा और डिजिटल नियमों से जुड़े समझौते भारत की डिजिटल नीति को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ उपभोक्ता वस्तुओं और विनिर्माण क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियों का प्रभुत्व बढ़ सकता है।
आगे का रास्ता
भारत की रणनीति यह है कि वह इन वैश्विक परिस्थितियों का लाभ उठाकर बेहतर शर्तें प्राप्त करे, जबकि अमेरिका भारत को एक दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक साझेदार के रूप में मजबूत करना चाहता है। यही कारण है कि वार्ता जारी है, लेकिन दोनों पक्ष अपने-अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना संतुलित और टिकाऊ समझौते पर पहुँचना चाहते हैं।
इसलिए भारत की वार्ता रणनीति का उद्देश्य केवल शीघ्र समझौता करना नहीं, बल्कि ऐसा समझौता सुनिश्चित करना है जो विकास, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय हित”-इन तीनों के बीच संतुलन स्थापित करे। यही कारण है कि वार्ता में समय लग रहा है, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से एक संतुलित और टिकाऊ समझौता भारत के लिए अधिक लाभकारी सिद्ध हो सकता है।