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तिब्बत के साथ खुलकर खड़ा होना होगा भारत को

Admin July 26, 2020

चीन को सबक सिखाने के लिए 
तिब्बत के साथ खुलकर खड़ा होना होगा भारत को


अब समय आ गया है कि भारत चीन को कडी व्यापारिक चुनौती देने के साथ-साथ अपनी विदेश नीति में आवश्यक बदलाव कर तिब्बत के साथ खुलकर खड़ा हो। - अनिल तिवारी


महाषक्ति बनने की चाह में खालिस दादागिरी पर उतरा चीन कोरोना महामारी के बीच लद्दाख की सीमा पर तनाव पैदा कर भारत को अर्दब में लेने आंख दिखाने की भरपूर कोषिष की लेकिन उसे जल्दी ही एहसास हो गया कि भारत एक शांतिप्रिय देष है, लेकिन कमजोर नहीं। भारत ने न सिर्फ चीन की बीआरआई योजना का खुलकर विरोध किया, आरसीईपी को लेकर उसकी रणनीति पर पानी फेर दिया, बल्कि सीमा पर भी मजबूती से काउंटर किया। यही कारण है कि भारत के मजबूत रुख से हतप्रभ चीन को अपनी विस्तारवादी सोच को वापिस थैले में डाल बिना देरी किए पीछे हटना पडा। बीजिंग की लाल सेना के बीजमंत्र ‘वार भी-व्यापार भी‘ पर कडा एतराज जताते हुए प्रधानमंत्री ने दो टूक षब्दों में कहा है कि ‘दो कदम आगे और एक कदम पीछे‘ हटने की चीन की पुरानी चाल अब नए भारत में संभव नही है।

भारत द्वारा सामरिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ाए जाने के कारण विश्व भर में लगभग अलग-थलग पड़ा चीन फौरी तौर पर भले ही पीछे हट गया है लेकिन यह नहीं माना जाना चाहिए कि वह ऐसी हालत भविष्य में फिर दोबारा नहीं करेगा। जमीन हड़पने के जुनून से पीड़ित चीन फिर वही करेगा जो कि उसकी विस्तार वादी रणनीति का हिस्सा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लेह यात्रा के दौरान चीन की विस्तारवादी नीति का जिक्र कर दुनिया का ध्यान खींचा तब दुनिया भर में ऐसी चर्चाएं शुरू हुई कि चीन के कुल क्षेत्रफल का लगभग 40 प्रतिषत हिस्सा उसका अपना नहीं बल्कि कब्जा किया हुआ हिस्सा है। पूर्वी तुर्किस्तान, तिब्बत, दक्षिण मंगोलिया, हांगकांग और मकाऊ जैसे 6 देष ऐसे हैं जिन पर चीन कब्जा जमा चुका है अथवा उस पर अपना हक मानता है।

गलवान घाटी में हुए हालिया सैन्य संघर्ष, जिसमें हमारे बीस सैनिकों को शहादत देनी पड़ी, से यह साफ हुआ कि पिछले लगभग चार दषकों से हमारे हुक्मरान चीन को लेकर आत्मभ्रम के षिकार रहे हैं। भारतीय कूटनीति जियांग जेमिन,हू चिंताओं से लेकर शी जिनपिंग तक के विस्तारवाद को समझने में विफल रही। चीन में जिनपिंग वर्ष 2013 में सत्ता में आए थे। भारत में नरेंद्र मोदी वर्ष 2014 में। सत्ता पर काबिज होते ही जिनपिंग आर्थिक विस्तारवाद की आड़ में चीन का भौगोलिक विस्तार बेल्ट एंड रोड पहल के तहत शुरू कर दिया। एषिया से अफ्रीका तक आर्थिक निवेषों की झड़ी लगा दी। चीनी सैन्यअडडे बनने लगे। वर्ष 2017 में जिबूती में सैन्य अड्डा बनने के बाद चीन का दबदबा अदन की खाड़ी, लाल सागर से लेकर हिंद महासागर तक बढ़ा। चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर को मंजूरी दी गई। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को चीन ने ले लिया।

मालूम हो कि चीन की जमीनी सीमा 14 देषों से लगती है। सारे पड़ोसियों से उसका सीमा विवाद रहा है। उसकी नीति हमेषा दबंगई की रही है। सीमा विवाद होने पर वह अपनी विचारधारा की भी तिलांजलि देता रहा है। चीन ने अपने कम्युनिस्ट साथी देष रूस और वियतनाम को भी नहीं बख्शा। चीन का रूस से जमीन को लेकर युद्ध हुआ। सोषलिस्ट वियतनाम से रार हुई। समुद्री क्षेत्र में दूरी पर स्थित इंडोनेषिया, फिलीपींस, जापान, वियतनाम और मलेषिया के द्वीपों को चीन अपना हिस्सा बताता रहा है। आदि-आदि।

चीनी विस्तारवाद के लंबे चौड़े इतिहास के बाद भी भारत को आखिरकार कैसी गलतफहमी रही कि चीन भारत के साथ दोस्ताना वह व्यवहार करेगा। भारत की लंबी सीमा चीन से जुड़ती है। तिब्बत के साथ-साथ लद्दाख, अरुणाचल प्रदेष, नेपाल और भूटान को भी चीन अपना हिस्सा मानता है। चीन की यह सारी दावेदारी बिना साक्ष्य और दादागिरी की दावेदारी है। चीन के पक्ष में कोई अंतरराष्ट्रीय संधि नहीं है। कोई दस्तावेजी सबूत उस के पक्ष में नहीं है।चीन अपने हिसाब से दावे करता है और समय-समय पर साक्ष्य भी गढता रहा है। अपने पुराने राजवंषों की दंत कथाओं और उनके अनुकूल लिखे इतिहास के आधार पर भूगोल की दावेदारी करता है। बताते हैं कि किसी जमाने में चीन के मिंग वंष ने वियतनाम के कुछ भाग पर शासन किया था बस उस इसी आधार पर वह वियतनाम हथियाना चाहता है। यही हाल मंगोलिया को लेकर है।

भारत के विषाल आकार और यहां की युवा मेधा, ज्ञान शक्ति के उभार को चीन अपने लिए चुनौती मानता है। ज्ञात हो कि लगभग 300 साल पहले तक भारत और चीन विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार होते थे। बीसवीं सदी के मध्य तक दोनों देषों में तरक्की की क्षमता थी। हालांकि उस समय तक दोनों बेहद गरीब देष हो गए थे। उसी समय से चीन को आषंका थी कि भारत भविष्य में उसे कड़ी टक्कर दे सकता है। यही कारण है कि जब हम हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा लगा रहे थे तो चीन भारत ही नहीं पूरे एषिया में वर्चस्व जमाने की दिषा में काम शुरू कर चुका था। पीपुल्स लिबरेषन आर्मी ने ताकत का इस्तेमाल करते हुए तिब्बत और झिनझियांग पर कब्जा कर लिया था। इसी के साथ भारत और चीन इतिहास में पहली बार पड़ोसी देष बन गए। बाद में वह चुपके से अक्साई चीन, लद्दाख के हिस्से पर काबिज हो गया ताकि वह सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तिब्बत और झिनझियांग को जोड़ने वाली सड़क का निर्माण कर सकें। भारत को पता चला तो विवाद शुरू हुआ फलस्वरुप दोनों देषों के बीच सन 1962 का युद्ध हुआ। हालांकि चीन ने आसानी से युद्ध जीत लिया लेकिन ज्यादा क्षेत्र पर काबिज नहीं हो सका। केवल लद्दाख के कुछ क्षेत्र पर कब्जा कर पाया। अक्साई चीन तो पहले से ही उसके कब्जे में था। 

चीन को यह आभास है कि भारत अब एक मजबूत देष है। भारत केबाजार की ताकत भी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हो चुकी है। भारतीय युवा शक्ति को चुनौती देना आसान नहीं है, इसलिए चीन भारत को कमजोर करने का हर संभव प्रयास करता रहता है। चीन सीमा पर तनाव पैदा करने, गाहे-बगाहे गीदड भभकी देने, भारतीय बाजार में हिंसक ऋण निवेष करने, आवारा पूंजी को प्रश्रय देने की कुटिल चाल चलता रहा है।

इतना ही नहीं बांग्लादेष की आजादी के बाद से ही चीन भारत को कमजोर करने के लिए पाकिस्तान को उकसाने में जुटा रहता है। चीन ने पाकिस्तान को ने केवल सैन्य समर्थन दिया है बल्कि परमाणु तथा मिंसाइल क्षेत्र में भी सहयोग दे रहा है। पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ जिहाद छेड़ने की नीति अपनाई तो चीन ने उसका साथ दिया तथा अजहर मसूद जैसे आतंकियों के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध लगाने संबंधी फैसले नहीं होने दिए।

देर से ही सही, गलवान की हालिया घटना के बाद नई दिल्ली की निंद्रा टूटी है। प्रधानमंत्री ने लेह की ऊंचाई से कहा कि चीन एक विस्तार वादी देष है। उसके साथ अब आगे टकराव और लेन-देन का सिलसिला नहीं चलेगा। हिंदी चीनी भाई-भाई के फरेब और वैश्वीकरण की आंधी में आर्थिक चकमक की सपनीली दुनिया से बाहर निकलकर सार्वभौम भारतीय राष्ट्रीय अस्मिता को आगे करने पर जोर दिया है। चीन को आर्थिक रुप से जवाब देने के लिए भी देष के लोगों में जागरूकता बढ़ी है। स्वदेषी जागरण मंच के आह्वान पर देष भर में चीन निर्मित सामानों का बहिष्कार हो रहा है। 

भारत को लद्दाख गिलगित और बलिदान के को लेकर गंभीर प्रयास करने चाहिए। भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया ने क्वाड गठित किया है। इससे समान विचार वालों को जोड़ने का प्रयास करना होगा वरना चीन एक-एक कर सबके समक्ष चुनौती पेष करता रहेगा। वैश्विक शांति और स्थिरता को बनाए रखने के लिए सभी देषों को चीन की विस्तार वादी नीतियों के विरोध में खड़ा होना होगा और भारत की इस में विषेष भूमिका अवष्यम्भावी है। अब समय आ गया है कि भारत चीन को कडी व्यापारिक चुनौती देने के साथ-साथ अपनी विदेष नीति में आवष्यक बदलाव कर तिब्बत के साथ खुलकर खड़ा हो।

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