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विकास की इंजन बनता पूर्वोत्तर का बांस

Admin January 05, 2021

बांस की उपयोगिता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार पूर्वोत्तर में नए-नए प्रयोगों को गति देने में तत्पर है, वहीं देश के अन्य राज्यों में भी बांस के विकास के लिए किसानों को आकर्षित करने में लगी है। — गोपाल शुक्ल

 

कहते हैं कि पूर्वोत्तर के लोगों की ईमानदारी और वहां के बांस की वफादारी का कोई जोड़ नहीं है। सच मायने में वहां बांस ही जिंदगी है और एक तरह से बांस ही परिवार का बॉस भी है। यहां के लोगों की रोजी-रोटी का प्रमुख जरिया बांस है। इस इलाके के लोगों में बांस इस कदर रचा-बसा है कि यहां के अधिकांश निवासी बांस को अपना इष्ट भी मानते हैं और यहां बकायदा बांस की पूजा करते हैं।

बांस एक सपुष्पक, आवृत्तबीजी, बीजपत्री, पोएबी कुल का पादप है। इसके परिवार के अन्य महत्वपूर्ण सदस्य- दूब, गेहूं, मक्का, जौ और धान है। यह पृथ्वी पर सबसे तेज बढ़ने वाला पौधा है। इसकी कुछ प्रजातियां 24 घंटे में 121 सेंटीमीटर यानी लगभग 48 इंच तक बढ़ जाती है। उचित जलवायु एवं हितैषी पर्यावरण के कारण पूर्वोत्तर में बांस की बहुलता है। देश के कुल बांस उत्पादन का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। यहां के बांसों की मांग दुनिया भर में है। पूर्वी इलाके में बांस को गरीब का टिंबर तो कहा ही जाता है, खेत का खजाना भी कहा जाता है।

हर साल 18 सितंबर का दिन विश्व स्तर पर विश्व बांस दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन बांस के फायदों के बारे में जागरूकता फैलाने और रोजमर्रा के उत्पादों में इसके उपयोग को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है। इसकी अधिकारिक घोषणा 2009 में बेंकांक में आयोजित आठवीं वर्ल्ड बम्बू कांग्रेस में की गई थी। इस साल हाल ही में आयोजित विश्व बांस दिवस 2020 के 11वें संस्करण की थीम बंबू नाऊ है। जो पूरे वर्ष भर चलेगी।

केंद्र की सरकार घरेलू बांस उद्योग को पर्याप्त बढ़ावा दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि कॉविड-19 के बाद के युग में भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में बांस की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। पूर्वोत्तर का बास उद्योग देश के लिए एक शानदार वरदान है। एक खास मौके पर खुद प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र भारत के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में से एक होगा और बांस उद्योग आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख स्तंभ। उपयोगी इंधन के रूप में बांस का यह क्षेत्र भारत का नया विकास इंजन बन सकता है। यही कारण है कि कई कारोबारी घराने विशाल कृषि संसाधनों का फायदा उठाने के लिए पूरब की ओर ललचाई नजरों से देख रहे हैं। कोरोना महामारी के काले बादलों के बीच पूर्वोत्तर के बांस एक बड़ी उम्मीद की रोशनी दे रहे हैं। इसमें अर्थव्यवस्था को एक नया आकार देने की ताकत है। सरकार ने गंभीरता से बांस के महत्व को स्वीकार किया है और अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए पहले ही पुराने भारतीय वन अधिनियम में जरूरी संशोधन किया है ताकि घरेलू बांस को वन अधिनियम के दायरे से बाहर रखा जा सके। वहीं कच्चे बांस की वस्तुओं पर 25 प्रतिशत आयात शुल्क बढ़ाकर इसके संरक्षण की पहल की गई है। सरकार के इस फैसले से आजीविका के अवसर बढ़ाने में मदद मिलेगी। साथ ही घरेलू बांस से फर्नीचर, हस्तशिल्प, अगरबत्ती आदि के निर्माण को भी बढ़ावा मिलेगा तथा वोकल फोर लोकल पर ध्यान केंद्रित करते हुए आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी नयी ऊर्जा मिलेगी। बांस का पूर्वोत्तर राज्यों की संस्कृति, राजनीति, अर्थव्यवस्था और व्यापार में भारी योगदान है। बांस, जिसे स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, बड़ी मात्रा में क्लस्टर्स को कच्चा माल और किसानों को नगदी मुहैया कराते हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों में देश का 60 प्रतिशत तो दुनिया के कुल उत्पादन का 20 प्रतिशत से अधिक बांस संसाधन पाया जाता है। चीन के बाद भारत में बांस की कुल 136 प्रजातियां मिलती है इनमें से 50 प्रजातियां पूर्वोत्तर में ही पाई जाती है। यूनिडो के मुताबिक पूर्वोत्तर क्षेत्र में बांस़ से जुड़ा व्यवसाय अगले पांच वर्षों में 5 से 10 हजार करोड रुपए तक बढ़ सकता है। अकेले मिजोरम के पास बाजार में 14 फ़ीसदी की हिस्सेदारी है। इस प्रदेश की आधी से अधिक भूमि बांस से ढ़की है। इस फेहरिश्त में मिजोरम के बाद असम अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर है। बांस के स्टाक के मामले में असम सबसे ऊपर है उसके बाद मणिपुर मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश का नाम आता है।

बांस एक ऐसी वनस्पति है, जिसके करीब 1500 उपयोग रिकॉर्ड किए जा चुके हैं। इस इलाके में गरीबों की आजीविका बांस है और इसके बिना किसी क्लस्टर्स की कल्पना नहीं की जा सकती। इन क्लस्टर्स में बांस के बने बर्तन, मछली पकड़ने के जाल, वर्तमान गुलदस्ते, टोकरियां, डिब्बे आदि बनाए जाते हैं। बांस के उत्पादों को लेकर नए-नए अभिनव प्रयोग किए जा रहे हैं। प्रतिदिन नई-नई बांस निर्मित वस्तुओं का आविष्कार किया जा रहा है।

वर्तमान में किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए केंद्र की सरकार राष्ट्रीय बांस मिशन के लक्ष्य पर आगे बढ़ रही है। सरकार के इस काम में बांस विकास परिषद पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए समन्वय एजेंसी के रूप में काम कर रही है। नई योजनाओं में स्थानीय कलस्टर को उन्नत तकनीक से लैस करना, श्रम बल को ट्रेनिंग देना, बांस की खेती से जुड़े किसानों को जागरूक करना, आदि शामिल है। इसमें बांस की कोपलें, कैंडी, फैशन उद्योग के लिए बांस, चारकोल फाइबर विनिर्माण जैसे लैमिनेटेड ब्रांड, बांस के रेशों के उत्पादन बांस के रेशे के फाइबर सीमेंट बोर्ड बनाने, बांस की फर्श बनाने दवाइयां खाद पदार्थ लकड़ी के विकल्प जैसे उत्पादों को तैयार किया जाता है जिसकी बाजार में बहुत अच्छी कीमत मिल सकती है ।

साथ ही स्थानीय कलस्टर को फायदा मिले इसके लिए बांस के स्टाप को वृक्ष की परिभाषा से बाहर कर दिया गया है। इसके लिए दो साल पहले भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा-2 में सरकार ने संशोधन कर दिया गया था। इसके अलावा बांस के सम्यक विकास के लिए स्फूर्ति (स्कीम ऑफ़ फंड फॉर रिजर्वेशन ऑफ ट्रेडिशनल इंडस्ट्रीज) नामक योजना एमएसएमई मंत्रालय द्वारा लागू की गई है इसका लक्ष्य परंपरागत उद्योगों और बांस की दस्तकारी करने वाले हस्तशिल्प को बढ़ावा देना है। इन सब के बावजूद महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि देश में आज भी बांस की मांग अधिक है और सप्लाई कम।

इसके अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों में कलेक्टर के माध्यम से हैंडलूम हैंडीक्राफ्ट के साथ-साथ अब एग्रो प्रोसेसिंग, डेरी, मांस उत्पादन उद्योग के विकास पर बल दिया जा रहा है और इसमें भी बांस की भूमिका को रेखांकित किया गया है। हमारे उत्तर पूर्वी राज्यों की 96 प्रतिशत सीमाएं पड़ोसी देशों से जुड़ी है। भारत की लुक ईस्ट नीति के तहत बुनियादी ढांचे के निर्माण सीमा पार से संपर्क और संचार लिंक बनाने में इन राज्यों की अहम भूमिका है। यही रास्ता पड़ोसी देशों के साथ भारत के व्यापार और आर्थिक सहयोग की बुनियाद है। विशेषज्ञ निर्यात के मोर्चे पर काफी बड़ी संभावना देख रहे हैं। यही कारण है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को और अधिक गति देने के लिए पूर्व की लुक ईस्ट नीति से भी दो कदम आगे बढ़कर सरकार ने एक्ट ईस्ट नीति लागू की गई है।

पूर्वोत्तर अपनी भौगोलिक और पर्यावरणीय विविधता के कारण अलौकिक सुंदरता वाला क्षेत्र है। चारों तरफ हरे-भरे जंगल, जड़ी बूटियों का खजाना इस क्षेत्र को जैव विविधता के स्तर पर मजबूत करता है। 262180 वर्ग किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में आमतौर पर मिलने वाली खास चीज को हम ग्रीन गोल्ड अथवा बांस के नाम से जानते हैं। बांस की सर्व सुलभता और इसकी महत्ता का अंदाजा यहां के लोगों के जीवन को देखकर लगाया जा सकता है। दैनिक उपयोग के हर काम में यहां बांस का अद्भुत प्रयोग है। यहां बांस हर क्षेत्र और हर मौसम में होता है। क्योंकि बांस कटाई के बाद खुद पैदा हो जाता है और अन्य पेड़ों की तुलना में ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है, इसीलिए यह मनुष्य के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा करता है। बांस के विलक्षण गुणों के कारण ही दुनिया के तमाम देश आज बांस के उत्पादन और इसके व्यवसायिक प्रयोग के लिए लालायित है। आज दुनिया की बड़ी आबादी की जीविका बांस और इससे संबंधित उद्योग पर निर्भर है। बांस एक प्रदूषण रहित इंधन भी है।

बांस की उपयोगिता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार पूर्वोत्तर में नए-नए प्रयोगों को गति देने में तत्पर है, वहीं देश के अन्य राज्यों में भी बांस के विकास के लिए किसानों को आकर्षित करने में लगी है। सरकार किसानों को बांस उत्पादन से जुड़ने और रोजगार के अवसर निर्मित निर्मित करने के लिए 50 प्रतिशत की राशि की सहायता भी दे रही है।

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