सार्वजनिक प्रतिष्ठान ‘इसरो’ से वैज्ञानिकों को निजी क्षेत्र में जाना स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जा सकती है, लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि देश के लिए ‘गगनयान’ जैसे अहम मिशन पर काम कर रहे वैज्ञानिक भी निजी क्षेत्र में जा रहे हैं, जो ‘इसरो’ के लिए एक चेतावनी भी है। - डॉ. अश्वनी महाजन
कुछ दिन पहले आयी एक खबर, जिसे अत्यंत नकारात्मक तरीके से देखा जा रहा था, यह थी कि भारत के एक गौरवपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) के 100 से अधिक वैज्ञानिकों ने या तो संस्थान से त्यागपत्र दे दिया है अथवा समय से पूर्व सेवानिवृत्ति ले ली है। इस खबर से ऐसा लग रहा था कि शायद भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को इससे एक बड़ा झटका मिल सकता है। लेकिन वहीं एक निजी कंपनी द्वारा बिना कोई असफलता झेले अंतरिक्ष में अपना रॉकेट लॉन्च करने के बाद यह बात स्पष्ट हो रही है कि ‘इसरो’ के वैज्ञानिक संस्थान से तो अलग हो रहे हैं, लेकिन वे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से अलग नहीं हो रहे, बल्कि एक अन्य प्रकार से अपना जुड़ाव मजबूती से बनाये हुए हैं, और निजी क्षेत्र के माध्यम से देश के लिए सफलता की नई इबारत लिख रहे हैं।
जुलाई 18, 2026 को भारत की एक निजी अंतरिक्ष स्पेस कंपनी ‘स्काईरूट एरोस्पेस’ ने सफलतापूर्वक विक्रम-1 नाम के रॉकेट को लॉन्च करके इतिहास रच दिया। अब भारत, अमरीका, चीन और जापान के बाद चौथा ऐसा देश बन गया है, जिसकी किसी निजी कंपनी ने अंतरिक्ष में रॉकेट भेजने में सफलता पाई है। विक्रम-1 की सफलता की खास बात यह है कि जहां बाकी देशों की निजी कंपनियों ने एक या एक से अधिक बार असफलता झेलने के बाद सफल लॉन्च कर पायी, स्काईरूट ने यह काम पहले ही प्रयास में कर दिया है।
प्रारंभ में अत्यंत सामान्य शुरूआत से आगे बढ़ते हुए जिस प्रकार ‘इसरो’ ने सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित किए, उससे इस क्षेत्र में भारतीय प्रतिभा की उत्कृष्टता विश्व में स्थापित हुई है। पीएसएलवी, मंगलयान, चंद्रयान और भविष्य में मानव को अंतरिक्ष में ले जाने की तैयारी के साथ पूर्णतया स्वदेशी गगनयान मिषन, नैविक (पूर्णतया स्वदेशी नेवीगेशन) और कृषि, आपदा प्रबंधन, जल संसाधन, शहरी नियोजन, मौसम पूर्वानुमान, और मत्सयन के लिए विश्व की सबसे बड़ी रिमोट सेंसिंग सेटेलाईट बनाने सहित ‘इसरो’ की तमाम उपलब्धियों के बाद भारत सरकार द्वारा ही यह सोचा समझा निर्णय लिया गया कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए। प्रारंभ में जब भारत के पास अंतरिक्ष क्षमता नहीं थी और दुनिया के विकसित देश हमसे कहीं आगे थे, सरकारी मदद के बिना अंतरिक्ष क्षेत्र में आगे बढ़ना इसलिए संभव नहीं था, क्योंकि दुनिया का कोई भी देश अपनी प्रौद्योगिकी भारत से साझा करने के लिए तैयार नहीं था। सरकारी मदद और हमारे वैज्ञानिकोें की सुझबूझ और मेहनत से इसरो ने विभिन्न उपलब्धियों के माध्यम से देश का मस्तक ऊंचा किया। लेकिन अब यह महसूस किया जा रहा है कि अंतरिक्ष क्षेत्र के व्यवसायीकरण की अपार संभावनाएं हैं। पूर्व में भी जन संचार, मौसम विज्ञान एवं विभिन्न प्रकार के शोध में इसरो ने काफी काम किया है, लेकिन स्पेस एक्स एक्सिऑम, स्पेस, सेयरा स्पेस, एस्ट्रो कॉल, डी ऑरबिट सहित विश्व की कई निजी कंपनियों ने अपने व्यवसाय का विस्तार करते हुए विभिन्न प्रकार की गतिविधियों को अंजाम दिया है। यही नहीं इन कंपनियांे का पूंजीगत मूल्यांकन उच्च स्तर पर हो रहा है। अकेले ऐलन मस्क की अमरीकी कंपनी ‘स्पेस-एक्स’ का पूंजीगत मूल्यांकन 1.6 खरब डालर तक पहुंच चुका है, जो भारत की जीडीपी का लगभग 38 प्रतिशत है।
ऐसे में इन बड़ी स्पेस कंपनियों को टक्कर देने हेतु भारत को भी अपनी तैयारी करनी होगी। भारत में ‘स्टार्टअप इको सिस्टम’ ने पिछले लगभग 12 सालों में खासी तेजी से प्रगति की है, और इसी क्रम में अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी नए स्टार्टअप उभरे हैं। इन स्टार्टएप्स को बड़ा लाभ यह मिला है कि अपने ही देश में अंतरिक्ष के क्षेत्र में खास उपलब्धियां हासिल किये हुए वैज्ञानिकों का एक बड़ा मंच देश में ही उपलब्ध है। ऐसे में सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले वैज्ञानिकों के पास भी नए विकल्प आ रहे हैं, कि वे या तो अपने स्टार्टअप शुरू करें, अथवा नए स्टार्टएप्स के साथ काम करते हुए अंतरिक्ष के क्षेत्र में नए-नए आयामों को आगे बढ़ाने में मदद दें।
इतिहास से सबक लेने की जरूरत
1960, 1970 व 1980 के दशक में देश की आकांक्षी युवा पीढ़ी ने देश में अवसरों के अभाव में भारत से पलायन करना शुरू कर दिया। यह वह कालखंड था जब देश में समाजवादी विचारधारा के प्रभाव में देश की सरकार द्वारा निजी क्षेत्र को आगे बढ़ने के मार्ग अवरूद्ध कर दिये गये। नीति निर्माताओं की सोच यह थी कि देश में निजी क्षेत्र नई प्रौद्योगिकी के साथ उद्यमिता के विकास में सक्षम नहीं है। न तो उसके पास संसाधन है, न तकनीकी क्षमता और न ही जाखिम लेने का रूझान। ऐसे में सरकार ने देश में औद्योगिक विकास को गति देने का समस्त दायित्व स्वयं पर थोप लिया। ब्रेड से लेकर मशीनरी, इलैक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा, दवाईयां, रसायन आदि सभी वस्तुओं का उत्पादन सरकार स्वयं करने लगी।
ऐसी परिस्थितियों में देश के आकांक्षी युवा, संसाधनों, अवसरों और सरकारी मदद के अभाव में विदेशों की ओर रूख करने लगे। आज यदि देखें, यूरोप के विभिन्न देशों अमरीका ही नहीं बल्कि खाड़ी के देशों और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भी बड़ी संख्या में भारतीयों ने जाना शुरू कर दिया और इन देशों के विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। यूरोप और अमरीका में भारतीयों ने केवल नौकरियां ही प्राप्त नहीं की, बल्कि वहां के उद्यमिता के विकास में भी उनकी महती भूमिका रही। भारतीय वैज्ञानिक अमरीका के अंतरिक्ष संस्थान ‘नासा’ में आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यही नहीं भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर, भारतीय डॉक्टर और भारतीय अध्यापक, सभी भारत के ब्रांड एंबेसेडर बनकर दुनिया भर में नाम कमा रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि भारतीयों की प्रतिभा का उपयोग भारत में ही पूर्ण रूप से नहीं हो पाया।
आज भारतीय वैज्ञानिकों, जिन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान ‘इसरो’ के माध्यम से देश की सफलता के झंडे गाडे़, वे अब या तो निजी क्षेत्र की कंपनियां बनाकर नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं अथवा देश के युवा वैज्ञानिक स्टार्टअप के साथ मिलकर अंतरिक्ष क्षेत्र में नई-नई गतिविधियों को अंजाम देने लगे हैं। मात्र कुछ ही सालों में जिस प्रकार से अंतरिक्ष के माध्यम से इंटरनेट का विस्तार हुआ है, और वो दिन दूर नहीं जब दूर-दूर के देशों की भी यात्रा अंतरिक्ष के माध्यम से आसान हो जायेगी। दूरसंचार, नेविगेशन ही नहीं बल्कि प्रतिरक्षा के क्षेत्र में भी अंतरिक्ष क्षेत्र का बड़ा योगदान होने वाला है। ऐसे में विकास के इन तमाम अवसरों को विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए छोड़ देना बहुत समझदारी की बात नहीं है। हमारे सभी प्रशिक्षित वैज्ञानिकों द्वारा और अधिक वैज्ञानिक तैयार करने और देश को अंतरिक्ष क्षेत्र में महाशक्ति बनाने में ‘इसरो’ के पूर्व वैज्ञानिक एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं। जैसे-जैसे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को उनके ज्ञान और अनुभव का ज्यादा लाभ मिलने लगेगा, देश के ज्यादा से ज्यादा युवा वैज्ञानिक इस क्षेत्र की ओर आकर्षित होंगे।
इस प्रकार की सोच केवल अंतरिक्ष क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में लाने की जरूरत है। प्रतिरक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भारत दुनिया में एक महाशक्ति बनने की क्षमता रखता है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में तमाम नई संभावनाएं जन्म ले रही है। रेयर अर्थ मेटेरियल की प्रोसेसिंग और उत्पादन में भी अपार संभावनाएं हैं। इलैक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम, क्वांटम कम्प्यूटिंग, ई-कॉमर्स समेत विभिन्न क्षेत्र युवाओं के लिए नये अवसर खोल रहे हैं। ऐसे में पेशेवरों की निजी क्षेत्र से सार्वजनिक क्षेत्र में और सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्र में आवाजाही देश के विकास की एक नई कहानी लिख सकती है।
सार्वजनिक क्षेत्र का स्वस्थ विकास भी जरूरी
हालांकि सार्वजनिक प्रतिष्ठान ‘इसरो’ से वैज्ञानिकों को निजी क्षेत्र में जाना स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जा सकती है, लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि देश के लिए ‘गगनयान’ जैसे अहम मिशन पर काम कर रहे वैज्ञानिक भी निजी क्षेत्र में जा रहे हैं, जो ‘इसरो’ के लिए एक चेतावनी भी है। जानकारों का मानना है कि नौकरशाही के बेवजह दखल के चलते वैज्ञानिकों की स्वायत्तता बाधित हो रही है। इसलिए जरूरत इस बात ही भी है कि ‘इसरो’ और स्पेस कमीशन को फिर से अधिकार सौंपे जायें और प्रतिभा को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें उचित मुआवजा भी मिले। स्वायत्तता और उचित मेहनताने से निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा होगी और भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को बल मिलेगा।