इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले 8 वर्षों में भारत अपनी आर्थिक सुधारों और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से विश्व पटल पर विशेष स्थान हासिल करने में सफल रहा है। इसी वजह से विश्व के सभी महत्वपूर्ण देश भारत से मधुर संबंध रखना चाहते हैं। — अनिल तिवारी
2014 में जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल की शुरुआत की थी, तब भारत विश्व की 10वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश था। बीते 8 सालों में 40 प्रतिशत से अधिक की तरक्की करते हुए भारत अब छठवें पायदान पर पहुंच गया है। इस अवधि में 5.3 फ़ीसदी ग्रोथ के साथ केवल चीन ही हमसे आगे रहा, लेकिन भविष्य की स्थितियां तेजी से बदलने का अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने हाल में ही 2022 में भारत के लिए 8.2 प्रतिशत की काफी मजबूत वृद्धि दर का अनुमान लगाया है वहीं चीन के लिए यह अनुमान 4.4 प्रतिशत है यानि कि चीन से लगभग 2 गुना तेज।
दुनिया के देशों की आर्थिक सेहत पर अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के इस ताजे आकलन में भारत के लिए अनुमानित उच्च विकास दर केवल हमारे देश के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक सकारात्मक सूचना है। भारत के लिए इसका बड़ा श्रेय कोविड-19 के सफल व्यापक आर्थिक प्रबंधन को दिया जा रहा है। जिसके परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूत सुधार हुआ। हमारी मजबूत अर्थव्यवस्था का ही परिणाम है कि यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण जहां पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाती हुई दिखाई दे रही है वहीं भारत विभिन्न चुनौतियों से जूझते हुए भी आर्थिक मोर्चे पर लगातार बेहतर स्थिति की ओर बढ़ रहा है। क्या प्रधानमंत्री मोदी के आत्मनिर्भर भारत की पहल को मजबूती देता है जिसके कारण देश में बिना झुके बिना ठिठके वैश्विक महामारी के झंझावातों से बाहर निकलने के साथ ही साथ समूचे विश्व को आगे ले जाने का मार्ग प्रशस्त किया है।
भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने सत्ता में अपने 8 साल पूरे कर लिए। बेशक इन 8 सालों के दौरान सरकार ने बेहद परिवर्तनकारी और साहसपूर्ण फैसलों में सबका साथ सबका विकास और सबमें विश्वास के दर्शन को केंद्र में रखा, पर चुनौतियां भी कम नहीं रही। पिछले 2 सालों में कोरोना महामारी ने विश्व के तमाम देशों के साथ भारत के सामने भी अभूतपूर्व संकट और चुनौतियां पेश की लेकिन सरकार ने न केवल इन चुनौतियों का सामना किया बल्कि अन्य देशों के साथ सहकार की मिसाल भी पेश की। इन 8 सालों के दौरान शिक्षा, आर्थिक क्षेत्र, बैंकिंग, सड़क निर्माण जैसी बुनियादी ढांचे संबंधी परियोजनाओं को प्रमुखता से आगे बढ़ाया। करोना महामारी के दौरान आबादी के सामने रोजगार का संकट जरूर खड़ा हुआ लेकिन 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को प्रतिमाह मुफ्त राशन देकर किसी को भूखे पेट सोने नहीं दिया।
बीते 8 सालों के उतार-चढ़ाव के बाद अब सवाल यह है कि कोरोना आपदा से बाहर निकलने के बाद आगे देश की आर्थिक दिशा और दशा क्या रहने वाली है? साल के शुरुआत में आई आईएचएस मार्किट की रिपोर्ट इस पर काफी रोशनी डालती है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत साल 2030 तक जापान को पीछे छोड़कर एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और जर्मनी ब्रिटेन से आगे निकलकर दुनिया की नंबर 3 की अर्थव्यवस्था बन सकता है। इस दौरान भारत की जीडीपी 2021 की 2.7 ट्रिलियन डालर से बढ़कर 8.4 ट्रिलियन डॉलर हो जाने का अनुमान है। आर्थिक विस्तार की लंबी अवधि के इस दृष्टिकोण को कई प्रमुख वजहों से ताकत मिल रही है। एक महत्वपूर्ण सकारात्मक कारण भारत का बड़ा और तेजी से बढ़ रहा मध्यम वर्ग है, जो उपभोक्ता खर्च को चलाने में मदद कर रहा है। अनुमान है कि हमारे देश का खपत व्यय 2020 के 1.5 ट्रिलियन डॉलर के मुकाबले 2030 में बढ़कर 3 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा। तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजार के साथ-साथ नई औद्योगिक क्रांति ने भारत को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए विनिर्माण, बुनियादी ढांचे, सेवाओं सहित कई क्षेत्रों में निवेश का महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया है। सौभाग्य से भारत के पास अपनी कुशल और अकुशल श्रम शक्ति के आकार के आधार पर वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करने का अवसर भी मिला है, क्योंकि कोविड-19 के अनुभव के बाद वे देश खुद चीन के बाहर विकल्पों की तलाश में है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना की महामारी ने हमारी विकास की रफ्तार को धीमा किया लेकिन हमें नए-नए सबक भी सिखाए। आपूर्ति श्रृंखला में लचीलापन लाने के सरकार के दूरदर्शी फैसले ने आज भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दहलीज पर खड़ा कर दिया है। यह लचीलापन ‘मेक इन इंडिया’ से लेकर ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के लिए की गई पहल में दिखता है। वर्ल्ड इकोनामिक फोरम की एक रिपोर्ट यह बताती है कि भारत अपने नवाचारी कदमों के कारण अगले एक दशक में विनिर्माण के क्षेत्र में 1 ट्रिलियन डॉलर के अपने लक्ष्य में 500 बिलियन डालर और जोड़ सकता है। यह हमारे आत्मनिर्भर भारत की प्रतिबद्धता को भी इंगित करता है।
पड़ोसी मुल्कों अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका की राजनीतिक अस्थिरता के कुछ प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष प्रभावी झोंके के बावजूद विश्व बैंक की व्यापार करने की सुगमता के सूचकांक में भारत लगभग 80 स्थान की छलांग लगाकर 2014 के 142 के मुकाबले 63 में स्थान पर पहुंच चुका है। भारतनेट जैसी परियोजनाओं के माध्यम से देश के पौने दो लाख गांव पंचायत ब्रॉडबैंड इंटरनेट से जुड़ चुके हैं। देश की 120 करोड़ जनसंख्या मोबाइल फोन नेटवर्क से जुड़ी हुई है। सरकार द्वारा उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन के तहत 2.14 लाख करोड़ का निवेश 14 औद्योगिक क्षेत्रों में विनिर्माण के लिए आ चुका है जिससे भारत में विनिर्माण के विकास को तीव्र गति मिलनी तय है। शोध एवं नवाचार के माध्यम से भी सेवा क्षेत्र में भारत विश्व पटल पर सबसे आगे है। इसका ताजा नमूना कोरोना रोधी टीका का आविष्कार तथा दुनिया की एक बड़ी आबादी को त्वरित टीकाकरण, जनधन आधार के जरिए जनकल्याणकारी योजनाओं को सीधे गरीबों तक पहुंचाने और भारत में डिजिटलीकरण को प्रोत्साहित करने के नाते सकारात्मक उम्मीद है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले 8 वर्षों में भारत अपनी आर्थिक सुधारों और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से विश्व पटल पर विशेष स्थान हासिल करने में सफल रहा है। इसी वजह से विश्व के सभी महत्वपूर्ण देश भारत से मधुर संबंध रखना चाहते हैं। आज दुनिया भर की अर्थव्यवस्था और स्थापित व्यवस्थाएं लगभग परिवर्तन के दौर से गुजर रही हैं। दुनिया के देशों की अपेक्षाएं भी कमोबेश बदल गई हैं। इन बदली परिस्थितियों में कुछ देश हमारे अनुकूल हैं तो कुछ देश प्रतिकूल भी। आस्ट्रेलिया जैसे देश से याराना बढ़ा है तो चीन से दुश्मनी में कोई कमी नहीं आई है। ऐसे में भारत के लिए वर्तमान गति को न सिर्फ बनाए रखने बल्कि इसे और अधिक गति से आगे बढ़ाने के लिए अपनी आंतरिक चुनौतियों को भी साधने की जरूरत है।