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स्वदेशी कृषि दर्शनः अन्नं बहुकुर्वीत

Admin October 26, 2020

कृषि देश की अर्थनीति का मूलाधार हो, कृषि में अन्न उत्पादन की प्रधानता हो, उनका सम्यक सम विभाजन हो, और कृषि एवं गोधन में स्थायी संबंध बना रहे। — अनिल तिवारी

साल 2020 के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार विश्व खाद्य कार्यक्रम को दिए जाने की घोषणा हुई है। यह अन्न की प्रतिष्ठा है। भारतीय संस्कृति में अन्न को विशेष महत्व प्राप्त है। ‘अन्नम प्राणः’ अन्न को प्राण के साथ-साथ ब्रह्म के साक्षात्कार का प्रथम सोपान माना गया है। उपनिषद का आदर्श वाक्य है- ‘अन्नं बहुकुर्वीत’, सब प्रकार से अन्न का बाहुल्य करो।

स्वदेशी अर्थव्यवस्था के मूल पर कृषि है और कृषि के मूल पर होता है अन्न का  उत्पादन। वर्तमान समय में पूरी दुनिया कोरोना महामारी के चलते हुई ऐतिहासिक बंदी के कारण आई मंदी की चपेट मैं है। दुनिया के कई देशों को अपने नागरिकों का पेट भरने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। दो जून की रोटी सारी जरूरतों पर भारी पड़ने लगी है। ऐसे में भी भारतीय खेती, किसानी ने अन्य के मुकाबले में अपने नागरिकों को अधिक आश्वस्त कर रखा है। मंदी के कारण हमारा सकल घरेलू उत्पाद भले ही नीचे घट गया है, लेकिन कृषि क्षेत्र ने हमें सहारा दिया है। कृषि क्षेत्र की चमत्कारिक उपलब्धि का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत देश के 80 करोड़ लोगों को लगभग मुफ्त राशन उपलब्ध कराया जा रहा है।

वैश्वीकरण के इस युग में कृषि को राष्ट्र विकास का मूल आधार बनाना और भी आवश्यक हो गया है। कृषि के उन्नयन से ही किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को वह सहज दृढ़ता प्राप्त होती है, जो उसे वैश्विक बाजारों में अविचलित खड़े रहने में समर्थ बनाती है। जिन देशों ने इसे मूलाधार समझकर इस पर काम किया, वह देश दुनिया में आज सम्मान के साथ खड़े हैं। भारतीय परंपरा और अन्य देशों के व्यवहारिक अनुभव दोनों का यही एक पाठ है कि सक्षम आर्थिकता का निर्माण कृषि के आधार पर ही होता है और किसी भी देश की स्वदेशी अर्थव्यवस्था इसी आधार पर बना करती है तथा सभी स्वदेशी के प्रति समर्पित राज्य कृषि पर विशेष ध्यान दिया करते हैं।

भारतीय संस्कृति में कृषि का बहुत महत्व है। 10 अवतारों में से एक भगवान श्री बलराम हल एवं मुसल धारण किया करते थे और परम ब्रह्म परमात्मा स्वयं श्री कृष्ण हल मुसलधारी कृषक श्री बलराम के अनुज के रूप में अवतरित हुए थे। भारतीय परंपरा के महानतम विद्वान राजा जनक अपने हाथ से हल चलाते थे।

भारतीय परंपरा में कृषि को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया गया, इसीलिए भारतीय राजाओं से सर्वदा यह अपेक्षा रही है कि वह कृषि एवं कृषकों की समृद्धि के प्रति विशेष रूप से सतर्क रहें। महाभारत के शांति पर्व में युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देते हुए भीष्म पितामह उन्हें बताते हैं कि निश्चिय ही कृषक का बोझ राजा के कंधों पर होता हैं, पर कृषक ही राज्य में सबका भरण पोषण करते हैं। 

कृषकों के दिए अन्न से ही देव, पितर, मनुष्य, गंधर्व, राक्षस, पशु एवं पक्षी सबके सब जीवन धारण करते हैं। अतः राजा को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे कृषक पीड़ित हो। इसी प्रकार सभा पर्व में नारद मुनि राज्य की व्यवस्था के विषय में युधिष्ठिर से प्रश्न पूछते हुए कृषि के प्रति विशेष आग्रहपूर्वक जानना चाहते हैं कि तुम्हारे राज्य में किसान संतुष्ट तो है? राज्य के सब भागों में खेतों को सिंचाई के लिए विशाल तलाब तो बना दिए गए हैं? ये सब तलाब जल से परिपूर्ण तो रहते हैं? कहीं कृषि, मात्र वर्षा के जल पर निर्भर तो नहीं है? खेती को मात्र वर्षा पर ही तो नहीं छोड़ दिया गया है? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारे राज्य के कृषक बीज के अभाव में कष्ट पा रहे हैं? ऐसी स्थिति में तुम उन पर अनुग्रह कर एक प्रतिशत ब्याज पर ऋण तो दिया करते हो ना?

बाल्मीकि रामायण में जब भरत श्रीराम को मिलने चित्रकूट जाते हैं तो कौशल देश की सुव्यवस्था के प्रति चिंतित श्रीराम भरत से कृषि संबंधी ऐसे ही अनेक प्रश्न पूछते हैं। वे जानना चाहते हैं कि कौशल देश के तालाब जल से परिपूर्ण तो हैं? कृषि वर्षा पर तो निर्भर नहीं हो गई है? देश कृषि में समर्थ तथा स्वस्थ पशुओं से परिपूर्ण तो है? और अंत में वह भरत से पूछते हैं कि कृषि एवं गौरक्षा ही जिनके जीवन का उद्देश्य है ऐसे सब लोग तुम्हारे विशेष प्रीत के पात्र तो हैं? वे कहते हैं कि कृषि एवं गौरक्षा का अवलंबन लेकर ही लोग सुख समृद्धि को प्राप्त होते हैं। इसलिए इन कार्यों में लगे लोगों का तुम्हें विशेष सावधानीपूर्वक पोषण करना चाहिए। इनके अनिष्ट के निवारण के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।

गुरुनानक ज्ञान के अनुसंधान में अनेक बार विश्वर्यटन करते रहे और अंततः ब्रह्म तत्व को प्राप्त करने के उपरांत वे करतारपुर में बसकर कृषि कार्य करने लगे। करतारपुर में कृषि कार्य करते हुए श्री गुरुनानक ने सिख संप्रदाय की स्थापना की। उनके साथ मिलकर कृषि करते हुए ही भाई मरदाना गुरु पद को प्राप्त हुए और इस प्रकार सिख गुरु परंपरा का सूत्रपात हुआ। यह स्वाभाविक ही है कि श्री गुरुनानक के वंशज आज भी देश के सर्वोत्तम कृषकों में गिने जाते हैं।

महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के समय जब स्वदेशी का आंदोलन चलाया था तो खादी को स्वदेशी का मूल आधार बताया था। परंतु स्वतंत्रता प्राप्ति से कुछ वर्ष पूर्व भविष्य के भारत पर विचार करते हुए उन्होंने अनेक बार स्पष्ट किया था कि केवल खादी से भारत का विकास नहीं होगा, हमें खेती पर आना होगा। उनका स्पष्ट मानना था कि कृषि ही देश के लोगों के भरण-पोषण का स्थाई एवं अचूक साधन बन सकती है।

आजादी के बाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश के विकास के लिए औद्योगिक मॉडल पेश किया। शहरों के आसपास कल- कारखाने लगे, शहरीकरण के कारण गांव से शहर की ओर लोगों का पलायन शुरू हुआ। लेकिन खेती की बेहतरी की योजनाएं बनती रही। लाल बहादुर शास्त्री ने कृषि को महत्व देते हुए ‘जय जवान और जय किसान’ का नारा दिया। इंदिरा गांधी के शासनकाल में भी गरीब हितैषी नीतियों का क्रियान्वयन चलता रहा। 

भारत में आर्थिक उदारीकरण के आगमन के बाद विभिन्न सरकारों ने विकास के पूंजीवादी मॉडल का ही अनुसरण किया है। इसलिए इनका मूल्यांकन चाहे अनचाहे इसके दायरे में ही रहकर करना होगा। अन्यथा एक वाक्य में ही उसकी भूमिका को यह कहकर खारिज किया जा सकता है कि सरकार कृषि क्षेत्र में कारपोरेट को बढ़ावा दे रही है। फिर भी किसी सरकार का मूल्यांकन करते समय कृषि के विकास के साथ-साथ किसानों की आय में वृद्धि का ख्याल रखना ही होगा, यह नजरिया जरूरी है, क्योंकि कृषि उत्पादन में वृद्धि के बावजूद इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि किसानों की आय में बढ़ोतरी हो जाए। 

मोदी सरकार का भी लक्ष्य 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का है, लेकिन क्या यह संभव है। अगर हां, तो कैसे? क्या अब तक के उसके कामकाज के आधार पर इसकी कोई उम्मीद बनती दिख रही है। मोदी सरकार की कृषि रणनीति तात्कालिक और दीर्घकालिक रणनीति से प्रेरित है। इसके महत्वपूर्ण बिंदु हैं- किसानों को उपज का उचित मूल्य दिलाना, पशुपालन, कृषि संबंधित उद्यमों को प्रोत्साहित करना, कृषि आधारित प्रसंस्करण उद्योगों में निवेश बढ़ाना, कृषि को बाजार से जोड़ना, गांव के बुनियादी ढांचे को मजबूती प्रदान करना। इसके लिए पहला आवश्यक कार्य था- कृषि क्षेत्र के लिए बजटीय आवंटन को बढ़ाना। यहां मोदी सरकार के आलोचकों को यह बात ध्यान में रखनी होगी कि मोदी राज में कुल बजट में कृषि क्षेत्र का हिस्सा पिछली सरकार से ज्यादा है। 

कृषि क्षेत्र की ही तरह सरकार ने ग्रामीण ढांचे को मजबूती प्रदान करने पर भी जोर दिया ताकि आर्थिक मंदी से अर्थव्यवस्था को बाहर लाया जा सके। सरकार की यह रणनीति कारगर होती दिख रही है।

एमएसपी के अलावा मोदी सरकार की रणनीति किसानों को बाजार से जोड़कर उनकी आमदनी दुगना करने की प्रतीत होती है। इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट का नेटवर्क खड़ा करके ग्रामीण कृषि मंडियों को इनसे जोड़ने की कोशिश की जा रही है। यह किसानों के लिए तभी फायदेमंद हो सकता है जब बड़े पैमाने पर ग्रामीण कृषि बाजार बनाए जाएं और सरकार के अलावा उपभोक्ता या थोक व्यापारी सीधे किसानों से खरीद करें। 

केंद्र सरकार ने अभी हाल ही में कृषि क्षेत्र से जुड़े तीन विधेयकों को कानूनीजामा पहनाया है। हालांकि इन विधेयकों को लेकर पंजाब, हरियाणा सहित देश के कुछ अन्य राज्य के किसान आपत्ति जता रहे हैं तथा धरना प्रदर्शन कर इसे किसान विरोधी बता रहे हैं। लेकिन उनकी चिंता बहुत जायज नहीं कही जा सकती। क्योंकि पूर्व में आई सांताकुमार समिति की रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो चुका है कि देश मेेेेेेेेेेे मात्र 5-6 प्रतिशत किसान ही मंडियों का लाभ उठा पाते है। 

कृषि विधेयकों का विरोध कर रहे किसानों को यह भी बताने की जरूरत है कि अधिक उत्पादन का लक्ष्य रखने की भारतीय परंपरा रही है, लेकिन साथ ही उनके सम्यक विभाजन का भी भाव रहा है। भारत का सामान्य ज्ञान आज भी ऐसा मानता हैं कि जहां उनका सम्यक विभाजन नहीं होता, वहां सम्यक उत्पादन भी नहीं हो पाता। 

अर्थनीति में कृषि की प्राथमिकता और कृषि में अनाज की प्रचुरता के उपरांत सम-सम्यक विभाजन महत्वपूर्ण है। यह केवल परंपरा की ही बात नहीं है, व्यवहार में भी सब समाज में इसका लंबा अनुभव है कि पशुधन के बिना खेती नहीं हुआ करती थी। कृषि के इतिहासकार बताएंगे कि किस काल में किस समाज की कृषि कितनी उन्नत थी। कृषि की उन्नति का अनुमान उस समाज में उपस्थित पशुओं की संख्या से लगाया जा सकता है। जितने अधिक पशु होते हैं, उतनी ही उन्नत कृषि होती है। आज कृषि में विभिन्न प्रकार की मशीनों एवं रासायनिक तकनीकों का उपयोग होने लगा है, तब भी कृषि की समृद्धि एवं पशुधन के बीच एक अटूट संबंध है। पशुधन के विकास के बिना कृषि का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास भूमि की उत्पादकता का विनाश करते हैं।

ऐसे में मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि कृषि देश की अर्थनीति का मूलाधार हो, कृषि में अन्न उत्पादन की प्रधानता हो, उनका सम्यक सम विभाजन हो, और कृषि एवं गोधन में स्थाई संबंध बना रहे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।)

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