चीन का युआन, यूरोप का यूरो और भारत का रुपया आने वाले दशकों में मिलकर एक बहुध्रुवीय मुद्रा व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं। - डॉ. धनपत राम अग्रवाल
आज सारी दुनिया में एक आर्थिक अनिश्चितता का वातावरण बना हुआ है। कोविड 2019-21 महामारी के बाद रूस-यूक्रेन युद्ध और उसके साथ ही अरब-इसराइल संघर्ष से भू-राजनैतिक अस्थिरता भी बनी हुई है। पर्यावरण की समस्या से प्राकृतिक आपदाओं में भी वृद्धि हो रही है। तकनीकी क्षेत्र में भी बड़ी तेजी से बदलाव आ रहे हैं और आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस ने रोजगार के क्षेत्र में अनिश्चितता को और अधिक जटिल बना दिया है, बड़ी- बड़ी कंपनियां मजदूरों की छटनी में लगी हुई हैं। दुनिया में कर्ज की समस्याएं बढ़ रही हैं। जहाँ दुनिया की कुल आय 105 ट्रिलियन डालर है, वहीं दुनिया का कुल ऋण 335 ट्रिलियन डालर के लगभग हो गया है। अमेरिका का राष्ट्रीय ऋण, जो सन् 2000 में सिर्फ़ 5.7 ट्रिलियन डालर था, वह 2025 में बढ़कर 37.5 ट्रिलियन डालर हो गया है। जबकि अमेरिका की कुल आय 28.5 ट्रिलियन डॉलर ही है, यानि आय और ऋण के अनुपात में बहुत वृद्धि हो रही है।
अमेरिका के नागरिकों का ऋण भी 18 ट्रिलियन डॉलर है, जो यह संकेत देता है कि वहाँ के नागरिक अपनी संपत्तियों को गिरवी रखकर तथा क्रेडिट कार्ड पर उधारी लेकर उपभोग कर रहे हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि दुनिया एक भयावह मोड़ पर खड़ी है और एक नई आर्थिक व्यवस्था को तलाश रही है। ऐसी विषम परिस्थितियों में अमेरिका के नये राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिन आर्थिक नीतियों की घोषणाएँ की हैं, उससे अमेरिकी डॉलर की साख काफ़ी गिरी है और डॉलर की क़ीमत में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट पिछले 9 महीनों में देखी गई है। दुनिया के बहुत से देश डॉलर के रिज़र्व करेंसी को बदलकर एक नई अर्थव्यवस्था के बारे में गंभीर चिंतन कर रहे हैं। इस कारण दुनिया के बहुत से देशों के केंद्रीय बैंक अमेरिकी ट्रेजरी बांड को बेचकर सोने में अपना विनियोजन कर रहे हैं, जिसकी वजह से सोने के दामों में काफ़ी उछाल आ रहा है। पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका ने जिस ढंग से डालर छापकर अपनी अर्थव्यवस्था को चलाया है, उससे वहाँ व्यापार घाटा बहुत बढ़ता जा रहा है और बजट पर ब्याज का बोझ भी ज़्यादा हो गया है, जो वहाँ के रक्षा बजट से भी अधिक है। ऐसे में ट्रम्प महोदय आयात को घटाना चाहते हैं और उन्होंने आयात पर कर यानि टैरिफ को काफ़ी बढ़ा दिया है। भारत से आयात पर भी 50 प्रतिशत का शुल्क लगाया गया है। चीन, भारत, रूस आदि देशों ने इसका कोई विकल्प निकालने का विचार किया है तथा ब्रिक्स देशों की बैठक में इसकी चर्चा भी हुई है कि डालर के बदले कोई नई करेंसी को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए लाना उचित होगा। इस विषय की गंभीरता पर नीचे विचार किया गया है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नई आर्थिक व्यवस्था
द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होते ही विश्व व्यवस्था में एक बड़ा परिवर्तन आया। राजनीतिक उपनिवेशवाद का दौर समाप्ति की ओर था, परंतु आर्थिक उपनिवेशवाद का एक नया रूप जन्म ले चुका था। ब्रिटिश साम्राज्य, जो सदियों तक वैश्विक व्यापार और वित्त पर हावी रहा था, अपनी शक्ति खो चुका था। इस शक्ति का हस्तांतरण कुछ नई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से अमेरिका के हाथों में हुआ। यह हस्तांतरण किसी संयोग का परिणाम नहीं था, बल्कि एक पूर्व निर्धारित रणनीति का हिस्सा था, जिसमें अमेरिका को वैश्विक आर्थिक नेतृत्व सौंपा गया।
ब्रेटन वुड्स व्यवस्था और डॉलर का उदय
जुलाई 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर राज्य के ब्रेटन बुड्स नगर में एक ऐतिहासिक सम्मेलन हुआ, जिसमें 44 देशों ने भाग लिया। इसी सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की नींव पड़ी। भारत और चीन भी इसके प्रथम सदस्यों में शामिल थे, लेकिन उस समय दोनों ही परतंत्र देशों की स्थिति में थे और संस्थाओं की संरचना मुख्यतः अमेरिका और इंग्लैंड के हितों के अनुरूप बनाई गई थी।
इससे पहले तक वैश्विक मुद्रा व्यवस्था गोल्ड स्टैंडर्ड और ब्रिटिश पाउंड स्टरलिंग पर आधारित थी। नियम यह था कि जितनी विदेशी मुद्रा छपेगी, उतना सोना सरकार के पास भंडारित होना चाहिए। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन और यूरोप बुरी तरह टूट चुके थे। उनके पास न तो सोना बचा था और न ही पूँजी। इसके उलट अमेरिका सबसे धनी राष्ट्र बन चुका था और दुनिया का लगभग दो-तिहाई सोना उसके पास था।
ब्रेटन वुड्स में यह तय हुआ कि अमेरिकी डॉलर को सोने से जोड़ा जाएगा - 1 औंस सोना=35 डॉलर। साथ ही, बाकी देशों की मुद्राएँ डॉलर से जुड़ेंगी। इस प्रकार डॉलर पहली बार वैश्विक एंकर मुद्रा बन गया।
1971ः निक्सन शॉक और फिएट डॉलर का युग
1960 के दशक तक आते-आते अमेरिका पर वियतनाम युद्ध और घरेलू सामाजिक कार्यक्रमों का भारी वित्तीय बोझ बढ़ गया। डॉलर की छपाई तेज हो गई, लेकिन सोने का भंडार उतना नहीं बढ़ा। फ्रांस जैसे देशों ने डॉलर को सोने में बदलने की माँग शुरू कर दी।
15 अगस्त 1971 को राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अचानक डॉलर को सोने से अलग कर दिया। इसे निक्सन शॉक कहा गया। इसके बाद डॉलर एक फिएट करेंसी बन गया, यानी जिसकी कीमत केवल सरकार और बाजार के भरोसे पर आधारित थी।
हालांकि यह कदम डॉलर पर अविश्वास बढ़ाने वाला था, लेकिन दुनिया के पास विकल्प नहीं था। हालांकि आईएमएफ के द्वारा एसडीआर के रूप में एक करेंसी जारी की गई, किंतु व्यापारिक लेन-देन में उसकी स्वीकार्यता नहीं हुई। अमेरिका की अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी थी, व्यापार का केंद्र वहीं था और सैन्य शक्ति भी अद्वितीय थी। इसलिए डॉलर का प्रभुत्व बना रहा।
पेट्रोडॉलर सिस्टमः तेल और डॉलर का गठबंधन
1970 के दशक में अमेरिका ने सऊदी अरब और ओपेक देशों से समझौता किया कि तेल का व्यापार केवल डॉलर में होगा। इसके बदले अमेरिका ने मध्य-पूर्व की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली।
इस समझौते ने डॉलर को नया जीवन दिया। चूँकि तेल हर देश की बुनियादी आवश्यकता है, इसलिए सभी देशों को तेल खरीदने के लिए डॉलर की आवश्यकता पड़ती थी। इसी कारण डॉलर की माँग लगातार बढ़ती रही और यह व्यवस्था पेट्रोडॉलर सिस्टम के नाम से प्रसिद्ध हुई।
आज भी तेल, प्राकृतिक गैस, कोयला, अनाज और धातुओं जैसी प्रमुख कमोडिटीज़ का अंतरराष्ट्रीय व्यापार लगभग पूरी तरह डॉलर में होता है। एक अध्ययन के अनुसार लगभग 85 प्रतिशत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तथा अन्य लेन-देन डालर में ही होता है। (चार्ट-1)
डॉलर की सर्वोच्चताः 1980 से 2000 तक
1980 और 1990 के दशक में अमेरिका की वित्तीय बाज़ार प्रणाली ने डॉलर को सबसे सुरक्षित निवेश माध्यम बना दिया। आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थानों में भी डॉलर का ही दबदबा रहा। 2000 तक आते-आते दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में रखे जाने लगे। अंतरराष्ट्रीय ऋण, व्यापारिक अनुबंध और वैश्विक निवेश लगभग सभी डॉलर पर आधारित थे। किंतु पिछले 20-25 वर्षों में डालर का अनुपात विदेशी मुद्रा भण्डार के रूप में घटता जा रहा है और वर्तमान में यह सिर्फ 58 प्रतिशत ही रह गया है। वर्तमान समय में जैसे-जैसे डालर की साख गिरती जा रही है, विश्व के अधिकांश केंद्रीय बैंक अमरीकी ब्रांड बेचकर सोने में विनियोजन कर रहे हैं। (चार्ट-2)
डॉलर के उतार-चढ़ाव
अमेरिका का बढ़ता ऋण और वित्तीय संकट की जड़ें
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अमेरिका अपनी समृद्धि को बनाए रखने के लिए लगातार ऋण और डॉलर छापने पर निर्भर है। यही कारण है कि दुनिया के कई केंद्रीय बैंक डॉलर पर भरोसा घटा रहे हैं और अपने भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।
ट्रम्प टैरिफ और डॉलर पर असर
2025 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने व्यापक टैरिफ नीति लागू की - लगभग सभी आयात पर न्यूनतम 10 प्रतिशत टैरिफ। यह नीति घरेलू उद्योग को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई थी, लेकिन वैश्विक निवेशकों ने इसे अमेरिका की आर्थिक नीति की अस्थिरता और अलगाववाद के रूप में देखा।
केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की बढ़ती माँग
वर्ष कुल खरीद (टन) प्रमुख खरीदार देश
2022 ~ 1,080 टन चीन, तुर्की, भारत, मिस्र
2023 ~ 1,100 टन चीन, भारत, रूस, तुर्की
2024 ~ 950 टन चीन, भारत, सऊदी अरब, ब्राजील
आज का दौरः वि-डॉलरीकरण की लहर
निष्कर्षः बहुध्रुवीय मुद्रा व्यवस्था की ओर
डॉलर ने पिछले 80 वर्षों से वैश्विक रिज़र्व मुद्रा की भूमिका निभाई है। लेकिन अब वि-डॉलरीकरण की गति तेज हो रही है। अमरीका स्वयं भी अपनी आन्तरिक मौद्रिक नीति में परिवर्तन कर अपने ऋण को कम करने की चेष्टा में है। क्रिप्टो करेंसी का षडयंत्र चल रहा है, जिससे विश्व को सावधान रहने की आवश्यकता है।
निकट भविष्य (10-15 वर्षों) में डॉलर की पकड़ कमजोर हो सकती है, परंतु पूरी तरह समाप्त होना कठिन है। इसके तीन कारण हैंः
फिर भी, चीन का युआन, यूरोप का यूरो और भारत का रुपया आने वाले दशकों में मिलकर एक बहुध्रुवीय मुद्रा व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं।
(लेखक स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक है।)
स्रोत और संदर्भ