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फिर बाहर आया बीटी बैंगन का जिन्न

Admin October 01, 2020

बीटी बैंगन पर आगे बढ़ने के पहले सरकार देखें कि किसानों का हित प्रभावित ना हो, उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर कोई विपरीत असर ना हो, देश की व्यापारिक संरचना को हानि ना हो। इसके अलावा विरासत में वर्षों से चली आ रही फसलों का अस्तित्व संकट में न पड़ने पाए। — अनिल तिवारी

 

ना-ना कहते केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने बीटी बैंगन की दो किस्मों के जमीनी परीक्षण के लिए हाँ कर दी है। बीटी बैंगन के जेनेटिकली मॉडिफाइड परीक्षण के लिए केंद्रीय पर्यावरण वन और जलवायु मंत्री प्रकाश जावेडकर के द्वारा पूर्व में कई बार अनुमति नहीं दिए जाने के आश्वासन को दरकिनार कर मंत्रालय के अधीन काम कर रही जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति ने जीएम फसल बीटी बैंगन परीक्षण को हरी झंडी दे दी है। सरकार के इस कदम से वैज्ञानिक और जन सरोकार से जुड़े संगठनों के कान खड़े हो गए हैं। संगठनों ने इसे राष्ट्रीय हित के विपरीत बताया है।  

स्वदेशी जागरण मंच ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है तथा कहा है कि लंबे अरसे से ठंडे बस्ते में पड़े मामले में समिति आखिर इतनी उतावली क्यों है? जबकि दुनियाभर में जीएम फसलों का भारी विरोध हो रहा है। प्रतिकूल प्रभाव वाली जीएम फसलों से विकसित देश किनारा कर रहे हैं। ऐसे में सरकार को वैज्ञानिक सोच के साथ ही आगे बढ़ना चाहिए। 


बीटी बैंगन के विरोध में

  • बीटी बैंगन से फसलों की जैव विविधता को नुकसान पहुंच सकता है। परीक्षण के अभाव में यह इंसानों की सेहत के लिए भी खतरों की तरह है। पहले यह जरूरी है कि अन्य जीव और मनुष्य पर इसकी व्यापक परीक्षण किए जाए।
  • बीटी बैगन के प्रभाव को जानने के लिए परीक्षण चूहों पर किए गए हैं, इससे उनके फेफड़ों और आमाश्य में विकार पाया गया।
  • अभी तक अनेक स्थानों पर अन्य जीएम फूड के प्रयोग से लोगों में बहुत दिन बाद भी एलर्जी से दुष्प्रभाव पाए गए हैं। हालांकि कोई यह नहीं जानता कि इनके परीक्षण प्रयोग कब कहां और किस तरह के लोगों पर किए गए।
  • जेनेटिकली मॉडिफाइड बीटी बैंगन जैसे उत्पाद और फसलें मनुष्यों में ऐसे आनुवंशिक परिवर्तन ला सकती हैं, जिनका परिणाम मानव सभ्यता के लिए दुखदाई हो सकता है।
  • इससे देश में बैगन की परंपरागत प्रजाति नष्ट हो जाएगी और किसानों के समक्ष इतने तरीके का संकट आ सकता है।
  • देसी कपास के पास उगाई गई बीटी कपास के मामलों में इस प्रकार का खतरा पाया गया है, जहां बीटी की कुसंगति से देशी कपास पिट गई।
  • इस समूची प्रक्रिया के पीछे दुनिया में कीटनाशक दवाओं का हर साल अरबों डॉलर का धंधा करने वाली कंपनियों का मायाजाल है, न कि उत्पादन बढ़ाने की कोई सदिच्छा।
  • जीएम फसलें अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगी और देश की राष्ट्रीय जैव विविधता तथा आत्मनिर्भरता को भी समाप्त कर देगी।
  • जिन खाद्य पदार्थों के जीन में बदलाव किया जाता है, उसे सेहत ही नहीं मनुष्य की अनुवांशिकी को भी नुकसान हो सकता है।

बीटी बैंगन के पक्ष में

  • दुनिया में पारंपरिक खाद्यान्न की सकल उत्पादकता जिस तरह घट रही है उससे आने वाले समय में जीएम फसलें ही हमारी जरूरत पूरी कर सकेंगी।  बैंगन जैसे आम उपयोग के उत्पाद के परिष्कृत रूप बीटी बैंगन की खेती देश में बढ़ती आबादी की खाद्य आवश्यकताओं के लिए जरूरी है। यह कीट प्रतिरोधी होने के बावजूद खाने के लिए सुरक्षित है।
  • जिन-जिन देशों में जीएम संवर्धित फसलों की खेती हो रही है वहां देखा गया है कि इसमें जैविक बदलाव के चलते घातक बैक्टीरिया नष्ट हो गए, जबकि इनसे इंसानों के लिए प्रोटीन की तरह का पूरक आहार सुलभ हुआ। जीएम के उत्पादन में अधिक पौष्टिकता होती है और यह मनुष्य पर अन्य प्रकार के रोगों का असर रोकने में सहायक होगी।
  • जैविक तकनीक से विकसित बीटी बैगन जैसी फसलों से सेहत पर तो कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, यह भूमि की उर्वरता को भी कम सोखती हैं। इससे भविष्य में उर्वरकों का इस्तेमाल घटेगा, कृषकों की आय में इजाफा होगा।
  • जीएम फसलें प्राकृतिक तौर पर प्री-सिक्योर होने से न तो कृषक बर्बाद होंगे  और न ही उनकी फसलें चौपट होगी। कीटनाशकों के प्रयोग पर होने वाला उनका भारी धन भी बचेगा।
  • जीएम फसलों पर कीटों का कोई प्रभाव न होने से फसलों के बचाव के लिए किसानों द्वारा खर्च की जाने वाली भारी धनराशि बचेगी और उत्पादन भी बढ़ेगा।

जैनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति द्वारा परीक्षण की अनुमति मिलने के बाद बीटी बैंगन पर एक बार फिर चर्चा गरम है। सवाल किया जा रहा है कि जब भारत में मानवीय स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के अनुकूल स्वदेशी प्रजाति का बैंगन उपलब्ध है तो फिर बीटी बैंगन की जरूरत ही क्या है? उत्पादकता बढ़ाने के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जीएम फसलों के पक्ष में चलाया जा रहा अभियान हमारी बीज संप्रभुता को हड़पने की कोशिश की तरह है। उत्पादन बढ़ाने के तर्क पर हमारे यहां बीटी कपास की शुरुआत हुई। कहा गया कि इसकी खेती में लागत भी कम होगी और मुनाफा ज्यादा होगा, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि कपास की खेती में लगातार लागत बढ़ रही है, मुनाफा घट रहा है और सबसे बढ़कर चिंता की बात यह है कि कर्ज के जाल में फंसे किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। 

मालूम हो कि विश्व में ऐसा कोई जीएम खाद्यान्न नहीं है कि जो उत्पादन क्षमता को बढ़ाता हो। हकीकत यह है कि जीएम फसलें उत्पादन क्षमता को कम करती हैं। दशकों से अमेरिकी कृषि विभाग स्वीकार करता आया है कि जीएम मक्का और जीएम सोया की उत्पादकता सामान्य प्रजाति से कम होती है।  बढ़ती आबादी के लिए उत्पादकता बढ़ाने का यह तरीका आज भी बेईमानी है, क्योंकि दुनिया में खाद्यान्न की कोई कमी नहीं है। 

समू़ची धरती पर लगभग 7 अरब लोग रहते हैं जबकि हम इतना अनाज पैदा करते हैं कि 12 करोड़ लोगों का पेट भरा जा सके। यदि दुनिया की डेढ़ अरब आबादी भूखी सोती है तो इसकी वजह खाद्यान्न की कमी नहीं बल्कि इसका बेतरतीब वितरण है। भारत में कुल आबादी की एक तिहाई संख्या बाजार में उपलब्ध होने पर भी अनाज खरीद नहीं पाती। गरीब जनता तो सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों से मिलने वाले दो-तीन रुपए प्रति किलो आटा चावल बमुश्किल ही खरीद पाती है, इसलिए सवाल उत्पादन का नहीं, वितरण  का है।

पूर्व में गलत परीक्षण के आधार पर बीटी कपास को अनुमति दी गई। उम्मीद थी कि इससे कपास में वृद्धि होगी, लेकिन परिणाम उल्टा रहा। रासायनिक छिड़काव कर फसल बचाने की कोशिश की गई जो कि अन्य रूपों में मानव जाति के लिए बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने अपने एक अध्ययन से यह प्रमाणित किया है कि  बीटी जैविक उत्पाद के दरमियान माइक्रोफ्लोरा नामक रासायनिक रिसाव होता है, यह जड़ से होते हुए पूरे पौधे में फैलता है। इसमें चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा में बीटी कपास के पत्ते खाने से जानवरों की मौत हो गई। मनुष्य के शरीर पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। जैविक रूप से उत्पादित खाद्यान्न से भारी मात्रा में कचरा पैदा होता है, जिसे किसी रसायन से काबू में नहीं लाया जा सकता। दुनिया के तकरीबन 26 देशों की जमीन जीएम फसलों के कारण बंजर होने की कगार पर है। अमेरिका में इस तरह की फसलों की मनाही है, क्योंकि सामान्य रूप से बीटी और जीएम फसलें सेहत पर प्रतिकूल असर डालती हैं। खुद मोनसेंटो कंपनी ने चूहों पर किए गए परीक्षण में पाया था कि उनके शरीर में कई अंग मसलन किडनी, लीवर, पाचन तंत्र में गड़बड़ी आई, प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ा। 

गौरतलब है कि आलू, प्याज, टमाटर के बाद बैंगन ही भारत में ज्यादा उपलब्ध सब्जी है। लेकिन बैंगन की फसल को कीड़े लगने का खतरा रहता है। यह कीड़े किसानों के लिए मुश्किल खड़ा करते हैं, क्योंकि इनसे बचाव के लिए दवाओं का छिड़काव करना पड़ता है। भारत में इसे आगे कर बीटी बैंगन की बात शुरू की गई और कहा गया कि बीटी बैंगन में नुकसान कम होंगे और हमारे यहां माहीको तथा भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने बीटी बैंगन की प्रजातियां विकसित की है। महाराष्ट्र की कंपनी माहीको  ई1 के साथ क्राई1 एसी जींस पर विकसित किया है, जिसे पिछले कई वर्षों से पड़ोसी देश बांग्लादेश में उगाया जा रहा है। वहीं आईएआरआई ने देसी तरीकों से इवेंट 141 को विकसित किया है।  दो दशक पहले इनकी मंजूरी के लिए प्रयास प्रारंभ हुए। एआईआर ने 2001 से 2004 के बीच ट्रांसजेनिक बीटी बैंगन का विकास किया तथा 2005 में बेजो शीतल सीड्स प्राइवेट लिमिटेड को अध्ययन के लिए सौंपा। 2010 में इसका पेटेंट मंजूर हुआ। इस बीच बीएसएसपीएल में बनारस और गुंटूर में जैविक सुरक्षा का परीक्षण शुरू किया, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। 2010 में स्वदेशी जागरण मंच व अन्य राष्ट्रीय संगठनों के भारी विरोध को देखते हुए सरकार ने जन सरोकार को ध्यान में रखकर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था।

चार साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कथन से कि ‘प्राचीन भारत में भी जेनेटिक इंजीनियरिंग का प्रयोग होता होगा’, के बाद प्रयास तेज हो गए। जीईएसी ने बैंगन के साथ-साथ चना, कपास, चावल, सरसों के परीक्षण की भी सिफारिश कर दी। पर्यावरण मंत्री ने संसद के एक लिखित जवाब में कहा कि जीएम फसलों से मिट्टी और मनुष्य के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव के प्रमाण नहीं है। 2 साल पहले सितंबर 2018 में माहीको के अनुरोध पर बीटी बैंगन के पक्ष में बातें शुरू हुई। जन संगठनों और किसान संगठनों ने जीईएसी की सिफारिशों का विरोध किया है तथा कहा है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं। बीटी बैंगन का उत्पादन तब तक नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि इसके प्रभाव का सही तरीके से वैज्ञानिक परीक्षण ना हो जाए। 

पूर्व के परीक्षण में जब माना गया कि बीटी उत्पादित खाद्यान्नों में इस्तेमाल किए जाने वाले कीटनाशक पदार्थों का प्रभाव पीढ़ी दर पीढ़ी होता है, तो ऐसे में परीक्षण की जल्दबाजी इंसानों के लिए सुरक्षित नहीं है। जहां तक किसान तकनीक के इस्तेमाल का सवाल है तो यह एक मजाक है। क्या तकनीक आम लोगों के हाथ में दे दिया जाना चाहिए, जो दुनिया  कल खत्म होने वाली होगी तो आज ही खत्म हो सकती है। हम जानते हैं कि सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, पर  कोई  पीना छोड़ देता है क्या? वैसे तो सरकारी आदेश से हर पैकेट पर चेतावनी लिखी होती है स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है पर क्या कोई सिगरेट पीना छोड़ देता है। इस चेतावनी के बावजूद सिगरेट की बिक्री में वृद्धि ही हुई है। लेकिन सरकार  सेहत का हवाला देकर सिगरेट पीने पर पाबंदी लगाती है तो क्या यह निर्णय गलत है। ठीक  इसी तरह बीटी बैंगन या अन्य जीएम उत्पादों को वैकल्पिक हाथों में सरकार को नहीं देना चाहिए, क्योंकि लाभ कमाने वाली कंपनियां तरह तरह का लालच देकर किसानों को फंसाने से बाज नहीं आएंगी। दरअसल भारत कृषि के नजरिए से विविधता वाला देश है। भारतीय जमीन में इतने प्रकार के कीट है कि किसी भी फसल को  हर  कीट से सुरक्षित रखना संभव नहीं है। 

हमारे देश में  ब्रीडिंग के दूसरे तरीकों के नतीजे बेहतर रहे हैं।  वैसे तो हमें बीटी फसलों के इस्तेमाल की आवश्यकता ही नहीं, लेकिन किन्ही कारणों से अगर यह  करना भी पड़े तो हमें कुछ बातों को गंभीरता से संज्ञान में लेना चाहिए। पहला, किसानों का हित प्रभावित ना हो। दूसरा, उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर कोई असर ना हो। तीसरा, देश की व्यापारिक संरचना को हानि ना हो। इसके अलावा विरासत में वर्षों से चली आ रही फसलों का अस्तित्व संकट में न पड़ने पाए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।) 

 

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