विकसित देशों में भी डिजिटल व्यसन-वृत्ति के प्रति सजगता बढ़ रही है। सबसे पहले अपने ही परिवार समूहों में कुटुंब प्रबोधन की आवश्यकता है तभी इसको आगे ले जा सकेंगे।- विनोद जौहरी
सोशल मीडिया और डिजिटल इकोसिस्टम के दुष्प्रभावों पर लंबे समय से हो रही चर्चा अब घर के अंदर आकर परिवारों के लिए गहरी चिंता का विषय बन चुकी है और व्यसन-वृत्ति बनकर विशेषकर हमारे युवा वर्ग और छोटे बच्चों के जीवन पर खतरे के रूप में मंडरा रही है। जीवन की निजता अब कोई विकल्प नहीं रह गयी है। इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों के प्रयोग के लिए कम से कम इतनी बड़ी क़ीमत चुकाना किसी भी मापदंड से क्षम्य नहीं है। अपने ही परिवारों में एक वर्ष का नवजात शिशु स्मार्टफोन पर नन्ही-सी अंगुली स्क्रॉल करता है और उसके लिए हठ करता है तो दो-तीन वर्ष बाद उसकी यही प्रवृत्ति उसके मानसिक और शारीरिक विकास में बाधक बनती है। माता-पिता भी अपने छोटे बच्चों को विद्यालय में मोबाइल स्मार्टफोन दे देते हैं और विद्यालय में अध्यापक व्हाट्सएप समूह बनाकर होमवर्क और अन्य शैक्षणिक गतिविधियां करते हैं तो इस प्रकार से बहुत छोटी आयु से ही माता-पिता-गुरु सब मिलकर इस डिजिटल व्यसन-वृत्ति को परोक्ष अपरोक्ष रूप से बढ़ावा दे रहे हैं। कोरोना काल में स्मार्ट कक्षाओं के नाम पर विद्यार्थियों ने विशेष रूप से इस विशेष रुचि लेना प्रारंभ किया है। जहां शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल क्रांति ने इसमें विशाल विस्तार किया है, वहीं छात्र कहीं से भी, कैसा भी ज्ञानार्जन बिना रोक-टोक कर रहे हैं भले ही इसकी सत्यता प्रमाणित हो न हो। इस दिशा में गेमिंग प्लेटफार्म बालकों, युवाओं, प्रौढ़ एवं वृद्धों के लिए अपनी निजी सूचना, बैंक खातों आदि को शेयर करना और घंटों तनावपूर्ण रहना उनके मूल्यवान जीवन के क्षरण के कारक हैं। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म, एजुकेशनल वैबसाइट और गेमिंग एप्लीकेशन के माध्यम से छात्र अपनी निजी जानकारी साझा कर रहे हैं, उनको नहीं पता कि वह किस प्रकार और कहां एकत्रित हो रही है और विज्ञापनों, साइबर ठगी और निजी जीवन में उसका किस प्रकार से दुरुपयोग हो रहा है।
बालकों और युवा वर्ग को डिजिटल व्यसन-वृत्ति में धकेलने के लिए वर्तमान में विद्यालयों में उनकी शिक्षा पद्धति जो शिक्षण को डिजिटल माध्यमों पर अतिरेक निर्भरता भी उत्तरदायी है। इसका एक पक्ष यह भी है कि इन शैक्षणिक डिजिटल माध्यमों में शिक्षा और डाटा प्रोफाइलिंग का भेद मिट रहा है और छात्रों का ज्ञानार्जन सोशल मीडिया के अधीन हो गया है।
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 का उल्लेख आवश्यक है। मुख्य रूप से यह भारतीय नागरिकों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता पर जोर देता है। यह कानून डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को उपयोगकर्ताओं का डेटा जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने के लिए बाध्य करता है और डेटा की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी नागरिकों के हाथ में सौंपता है। यह कानून मुख्य रूप से कुछ विशिष्ट बातों पर जोर देता है। कोई भी कंपनी या संस्थान किसी व्यक्ति की स्पष्ट अनुमति के बिना डेटा एकत्र या उपयोग नहीं कर सकता। नागरिकों को अपने डेटा तक पहुँचने, उसे सही करने, या काम पूरा हो जाने पर उसे हटाने का अधिकार प्राप्त है। 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का डेटा इस्तेमाल करने के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य है। बच्चों की ट्रैकिंग या लक्षित विज्ञापनों पर सख्त रोक है। कंपनियों को डेटा सुरक्षित रखने के लिए कड़े उपाय करने होंगे और डेटा लीक होने की स्थिति में संबंधित बोर्ड को तुरंत सूचित करना होगा।
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम 2023 की धारा 9 बच्चों और विशेष रूप से अक्षम व्यक्तियों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा से संबंधित है। 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे का डेटा का प्रसंस्करण करने से पहले, डेटा फिड्यूशरी को उनके माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सत्यापन योग्य सहमति प्राप्त करना अनिवार्य है। माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति का यह नियम उन व्यक्तियों पर भी लागू होता है, जो स्थायी रूप से अक्षम हैं और सहमति देने में असमर्थ हैं। कोई भी डेटा फिड्यूशरी ऐसी किसी भी डेटा प्रोसेसिंग गतिविधि में शामिल नहीं हो सकता, जिससे बच्चों के कल्याण पर कोई भी प्रतिकूल या हानिकारक प्रभाव पड़े। इसके अलावा 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को लक्षित करके विज्ञापन या ट्रैकिंग करने पर कठोर प्रतिबंध है। नियमों का उल्लंघन करने या डेटा लीक होने पर कंपनियों पर 50 करोड़ रूपये से लेकर 250 करोड़ रूपये तक का भारी अर्थदंड लगाने का प्रावधान है। यथार्थ में इन डिजिटल माध्यमों में एप्रूवल देने की प्रक्रिया में सभी वांछित जानकारी बिना किसी सजगता के साझा कर दी जाती है और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम 2023 का अनुपालन और क्रियान्वयन एवं प्रबंधन बहुत कठिन है। परंतु क्या वास्तव में इस अधिनियम का पालन हो रहा है और क्या हम वास्तव में अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति सजग हैं?
फूड डिलीवरी के डिजिटल प्लेटफार्म की बाढ़ सी आ गयी है और घर की रसोई का सम्मान और पवित्रता की रक्षा करना कठिन हो रहा है। दिल्ली में औसतन 100 घरों की आवासीय सोसायटियों में दिन भर मे पचास से अधिक फूड डिलीवरी होती है। भोजन किस माध्यम से, कहां, किन पदार्थों से और किस सुरक्षा के अंतर्गत तैयार हो रहा है, इन मानकों का कोई मापदंड नहीं पालन होता और विशेषकर युवा वर्ग में इसके प्रति विशेष आकर्षण है। रात बारह बजे भी फूड डिलीवरी हो रही है। पूरी रात फूड डिलीवरी की भी भरपूर सुविधा उपलब्ध है। इसको लेकर स्वास्थय पर कितना घातक प्रभाव पड़ रहा है, इसका आंकलन भी आवश्यक है।
मनोरंजन के डिजिटल साधनों, ओटीटी, वैब सीरीज, रील्स, यूट्यूब, नेटफ्लिक्स और टिकटाक जैसे माध्यमों ने परिवारों, छोटी आयु के बालकों और युवा वर्ग पर विपरीत प्रभाव डाला है जिससे उनके व्यक्तित्व पर हठधर्मिता, फोकस की कमी, बैचेनी, क्रोध, स्मरण शक्ति का क्षरण, दूसरों की नकल करने की प्रवृत्ति, हीन भावना, अकेलेपन की प्रवृत्ति आदि साधारण रूप से देखने को मिल रहे हैं और अभिभावक परेशान हैं। छात्रों में शोध, पुस्तकों के प्रति रुचि और उनके संचार कौशल का क्षरण हो रहा है और उनके सामान्य व्यवहार में इसके लक्षण दिखाई दे रहे हैं।
कृत्रिम मेधा (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के दुरुपयोग ने सत्य और असत्य का भेद समाप्त कर दिया है। ‘डीपफेक’ इसी का उदाहरण है। यहां तक कि माननीय उच्चतम न्यायालय ने चेतावनी दी है कि न्यायिक प्रक्रियाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को सावधानी से प्रयोग किया जाये जिससे एआई जेनेरेटेड न्यायिक रेफरेंस की असत्यता पर सजग रहा जाये।
डिजिटल व्यसन-वृत्ति को दूर करने का दायित्व केवल सरकार का नहीं है। सामाजिक सजगता और जागरूकता को बड़े स्तर प्रचारित करने की आवश्यकता है। विद्यालयों में शिक्षा पद्धति में बड़े सुधारों की आवश्यकता है। लचर कानून किसी की रक्षा नहीं करते बल्कि इसके दुरुपयोग को बढ़ावा देते हैं। विकसित देशों में भी डिजिटल व्यसन-वृत्ति के प्रति सजगता बढ़ रही है। सबसे पहले अपने ही परिवार समूहों में कुटुंब प्रबोधन की आवश्यकता है तभी इसको आगे ले जा सकेंगे।

