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कृत्रिम बुद्धिमत्ताः भारत के बढ़ते कदम और अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियां

By Dr. Dhanpat Ram Agarwal • 20 Apr 2026
कृत्रिम बुद्धिमत्ताः भारत के बढ़ते कदम और अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियां

भारत यदि अनुसंधान, सेमीकंडक्टर निर्माण, स्टार्ट-अप नवाचार और कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करता है, तो वह भविष्य की वैश्विक एआई अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर सकता है। - डॉ. धनपतराम अग्रवाल

 

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अब केवल तकनीकी प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रही। यह खेती, शिक्षा, स्वास्थय, वित्त, न्याय, रक्षा और सृजनात्मक कला, सभी क्षेत्रों में प्रवेश कर चुकी है। भारत में भी एआई अपनाने की गति तेज है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की फ्यूचर ऑफ जॉबस रिपोर्टस 2025 के अनुसार भारतीय कंपनियाँ सेमीकंडक्टर, क्वांटम एनक्रिप्शन और एआई प्रणालियों में वैश्विक औसत से अधिक निवेश कर रही हैं। 35 प्रतिशत भारतीय नियोक्ता सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी अपनाने की योजना बना रहे हैं - यह वैश्विक औसत से काफी अधिक है। पिछली औद्योगिक क्रांतियों ने मुख्यतः शारीरिक श्रम को प्रभावित किया था। आईएमएफ ने 2024 की अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि एआई पिछले स्वचालन से भिन्न है - यह ‘संज्ञानात्मक कार्यों’ (कॉगनेटिव फंक्शन) को भी प्रभावित करती है। इसका अर्थ है कि उच्च-कौशल व्यवसाय भी जो पहले स्वचालन से सुरक्षित माने जाते थे, अब व्यवधान के दायरे में हैं। विश्व बैंक ने अक्टूबर 2025 में कहा कि एआई में ‘नॉन-रूटीन, व्हाईट कॉल्लर सर्विस सेक्टर जॉब्स’ को विस्थापित करने की क्षमता है।

सेमीकंडक्टर और वैश्विक ”चिप युद्ध“

एआई उद्योग के विकास के साथ सेमीकंडक्टर उद्योग का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है। उन्नत एआई चिप्स के बिना बड़े एआई मॉडल का विकास संभव नहीं है।

इसी कारण अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। अमेरिका ने उन्नत चिप तकनीक पर निर्यात नियंत्रण लागू किए हैं ताकि चीन की तकनीकी प्रगति को सीमित किया जा सके। दूसरी ओर चीन अपने घरेलू सेमीकंडक्टर उद्योग को विकसित करने के लिए भारी निवेश कर रहा है।

इस प्रतिस्पर्धा को कई विश्लेषक ‘चीप वार’ या ‘सेमीकंडक्टर जियोपॉलिटिक्स’के रूप में वर्णित करते हैं।

वैश्विक एआई कंपनियाँ और तकनीकी शक्ति

एआई उद्योग में कुछ कंपनियाँ अत्यधिक प्रभावशाली भूमिका निभा रही हैं। माईक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेजन, एनवीडिया और मेटा जैसी कंपनियाँ एआई अनुसंधान, क्लाउड अवसंरचना और डेटा संसाधनों में अग्रणी हैं।

इन कंपनियों के पास विशाल डेटा सेट, सुपरकंप्यूटिंग संसाधन और अरबों डॉलर का निवेश है। एआई मॉडल प्रशिक्षण की अत्यधिक लागत के कारण छोटी कंपनियों के लिए इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो जाता है।

इस कारण कई विशेषज्ञ एआई उद्योग को तकनीकी एकाधिकार (टेक्नोलॉजी ऑलिजोपोली) के रूप में देखते हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नैतिक और सामाजिक प्रश्न

कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास जितनी तेजी से हो रहा है, उतनी ही तेजी से इसके नैतिक और सामाजिक प्रश्न भी सामने आ रहे हैं। एआई तकनीक के माध्यम से निर्णय लेने की प्रक्रिया स्वचालित होती जा रही है। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि मशीन द्वारा लिए गए निर्णय कितने निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह हैं।

एआई आधारित एल्गोरिद्म अक्सर बड़े डेटा सेट पर प्रशिक्षित होते हैं। यदि प्रशिक्षण डेटा में किसी प्रकार का पक्षपात मौजूद हो, तो एआई प्रणाली भी उसी प्रकार के पक्षपाती निर्णय दे सकती है। इसे एल्गोरिद्मिक पक्षपात (एलगोरिथमिक बीएज) कहा जाता है। उदाहरण के रूप में नौकरी चयन, ऋण स्वीकृति या आपराधिक न्याय प्रणाली में एआई आधारित निर्णयों के दौरान भेदभाव की आशंका व्यक्त की जाती रही है।

एक अन्य महत्वपूर्ण चिंता डीपफेक तकनीक से जुड़ी है। एआई के माध्यम से अत्यंत यथार्थवादी नकली वीडियो और ऑडियो तैयार किए जा सकते हैं। यह तकनीक यदि गलत हाथों में चली जाए तो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, चुनावों और सामाजिक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

डेटा गोपनीयता भी एआई युग की एक प्रमुख चुनौती है। एआई मॉडल प्रशिक्षण के लिए विशाल मात्रा में डेटा की आवश्यकता होती है, जिसमें अक्सर व्यक्तिगत और संवेदनशील जानकारी शामिल होती है। यदि इन डेटा का दुरुपयोग हो जाए तो नागरिकों की निजता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

एआई का उपयोग सैन्य तकनीकों में भी बढ़ रहा है। स्वायत्त हथियार प्रणालियाँ (आटोनोम्यूज विपंश) ऐसे हथियार हैं जो बिना मानव हस्तक्षेप के लक्ष्य चुनने और हमला करने में सक्षम हो सकते हैं। इस कारण कई विशेषज्ञ एआई आधारित सैन्य प्रणालियों को वैश्विक सुरक्षा के लिए संभावित जोखिम मानते हैं।

वैश्विक स्तर पर एआई नियमन की आवश्यकता

इन नैतिक और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण विश्व स्तर पर एआई नियमन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने एआई के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग के लिए नीतिगत ढाँचे विकसित करना शुरू कर दिया है।

एआई नियमन का उद्देश्य तकनीकी नवाचार को रोकना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि एआई तकनीक मानव समाज के हित में और सुरक्षित ढंग से विकसित हो।

यूरोपीय संघ का एआई एक्ट

यूरोपीय संघ ने एआई नियमन के क्षेत्र में सबसे व्यापक पहल की है। ईयू ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस एक्ट नामक एक विस्तृत कानून तैयार किया है जो एआई प्रणालियों को जोखिम के आधार पर वर्गीकृत करता है।

अमेरिका की एआई नीति

अमेरिका का दृष्टिकोण यूरोपीय संघ से कुछ अलग है। अमेरिका आमतौर पर तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ सुरक्षा और नैतिकता के बीच संतुलन बनाने की नीति अपनाता है।

एआई उद्योग में पूंजी शक्ति और धनिक वर्ग का प्रभाव

कृत्रिम बुद्धिमत्ता उद्योग के विकास में पूंजी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। बड़े एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए अत्यधिक कंप्यूटिंग शक्ति और विशाल डेटा संसाधनों की आवश्यकता होती है। इन संसाधनों की लागत इतनी अधिक होती है कि केवल बड़ी तकनीकी कंपनियाँ और निवेशक ही इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश कर सकते हैं।

आज एआई उद्योग में निवेश मुख्यतः कुछ बड़े कॉर्पोरेट समूहों और अरबपति निवेशकों द्वारा किया जा रहा है। माईक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेजन और मेटा जैसी कंपनियाँ एआई अनुसंधान और विकास में अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं।

इसी प्रकार कई प्रसिद्ध उद्यमी और निवेशक भी एआई उद्योग में सक्रिय हैं। एलन मस्क, बिल गेट्स, जेफ बेजोस और सैम ऑल्टमैन जैसे व्यक्तियों का एआई उद्योग में महत्वपूर्ण प्रभाव माना जाता है।

एआई मॉडल प्रशिक्षण के लिए आवश्यक डेटा सेंटर, सुपरकंप्यूटिंग अवसंरचना और चिप्स अत्यंत महंगे होते हैं। इस कारण एआई उद्योग में बड़ी कंपनियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रवृत्ति पर ध्यान नहीं दिया गया तो एआई उद्योग कुछ बड़ी कंपनियों के नियंत्रण में केंद्रित हो सकता है।

भारत की संरचनात्मक शक्तियाँ

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वैश्विक विकास के संदर्भ में भारत एक उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा जा रहा है। यद्यपि अमेरिका और चीन इस क्षेत्र में अग्रणी माने जाते हैं, फिर भी भारत के पास कई ऐसे संरचनात्मक लाभ हैं जो उसे भविष्य में एआई क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान दिला सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण शक्ति भारत की जनसंख्या और डेटा विविधता है। भारत एक बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक समाज है, जहाँ सैकड़ों भाषाएँ और विविध सामाजिक परिस्थितियाँ मौजूद हैं। यह विविधता एआई मॉडल प्रशिक्षण के लिए अत्यंत समृद्ध डेटा स्रोत प्रदान करती है। भाषा आधारित एआई प्रणालियों के विकास में यह विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

दूसरी महत्वपूर्ण शक्ति भारत की तकनीकी प्रतिभा (टेलेंट पूल) है। भारत विश्व के सबसे बड़े इंजीनियरिंग और तकनीकी प्रतिभा स्रोतों में से एक है। हर वर्ष लाखों इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ भारत के विश्वविद्यालयों से स्नातक होते हैं। इनमें से कई वैश्विक तकनीकी कंपनियों में कार्य कर रहे हैं और एआई अनुसंधान में योगदान दे रहे हैं।

तीसरा महत्वपूर्ण तत्व भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डिजिटल पब्लिक इंस्फ्रास्ट्रक्चर) है। पिछले एक दशक में भारत ने डिजिटल शासन और डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। आधार, यूपीआई और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म ने डिजिटल अर्थव्यवस्था को व्यापक आधार प्रदान किया है।

डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और एआई

भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना एआई विकास के लिए एक अनूठा मॉडल प्रस्तुत करती है। आधार प्रणाली ने भारत में डिजिटल पहचान का एक व्यापक ढाँचा स्थापित किया है। इसके माध्यम से करोड़ों नागरिकों को डिजिटल पहचान प्रदान की गई है।

इसी प्रकार यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ने डिजिटल भुगतान प्रणाली को सरल और व्यापक बनाया है। आज भारत में प्रतिदिन करोड़ों डिजिटल भुगतान यूपीआई के माध्यम से किए जाते हैं। यह डिजिटल डेटा एआई आधारित वित्तीय सेवाओं के विकास के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।

इसके अतिरिक्त ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ओएनडीसी) जैसे प्लेटफॉर्म डिजिटल व्यापार के क्षेत्र में नए अवसर उत्पन्न कर रहे हैं। इस प्रकार भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना एआई आधारित नवाचार के लिए एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करती है।

भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति

एआई उद्योग के विकास के लिए सेमीकंडक्टर अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसी कारण भारत सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत की है। इस मिशन का उद्देश्य भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण और चिप डिजाइन उद्योग को विकसित करना है। भारत में कई कंपनियाँ सेमीकंडक्टर निर्माण और डिजाइन के क्षेत्र में निवेश कर रही हैं। यदि यह प्रयास सफल होते हैं तो भारत एआई आपूर्ति श्रृंखला में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

रोजगार और कौशल पर प्रभाव

एआई के कारण रोजगार संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकता है। कुछ पारंपरिक नौकरियाँ स्वचालन के कारण कम हो सकती हैं, लेकिन डेटा वैज्ञानिक, एआई इंजीनियर और मशीन लर्निंग विशेषज्ञ जैसे नए पेशे तेजी से उभर रहे हैं। इसलिए शिक्षा प्रणाली और कौशल विकास कार्यक्रमों को नई तकनीकी आवश्यकताओं के अनुसार विकसित करना आवश्यक है।

पर्यावरणीय प्रभाव

एआई मॉडल प्रशिक्षण और बड़े डेटा सेंटरों के कारण ऊर्जा खपत बढ़ सकती है। इसलिए भविष्य में ’ग्रीन एआई’ की अवधारणा महत्वपूर्ण होती जा रही है, जिसमें ऊर्जा.दक्ष एल्गोरिद्म और नवीकरणीय ऊर्जा आधारित डेटा सेंटर विकसित किए जाते हैं।

भविष्य की दिशा

कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास आने वाले दशकों में विश्व की आर्थिक और तकनीकी संरचना को गहराई से प्रभावित करेगा। एआई आधारित स्वचालन, डेटा विश्लेषण और निर्णय प्रणाली उद्योग, शिक्षा और शासन के स्वरूप को बदल सकते हैं। इस परिवर्तन के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि एआई तकनीक का उपयोग किस प्रकार किया जाएगा। यदि एआई केवल कुछ बड़ी कंपनियों या शक्तिशाली देशों के नियंत्रण में केंद्रित हो जाती है, तो इससे वैश्विक असमानता बढ़ सकती है। इसके विपरीत यदि एआई को जिम्मेदारी और नैतिकता के साथ विकसित किया जाए, तो यह मानव समाज के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकती है।

निष्कर्ष

कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधुनिक युग की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी क्रांतियों में से एक है। यह आर्थिक विकास, वैज्ञानिक अनुसंधान और सामाजिक परिवर्तन के नए अवसर प्रदान करती है। साथ ही इसके साथ नैतिक जोखिम, डेटा गोपनीयता, रोजगार परिवर्तन और तकनीकी शक्ति के केंद्रीकरण जैसी चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं।

विश्व के विभिन्न देशों ने एआई नियमन और नीति निर्माण के माध्यम से इन चुनौतियों का समाधान खोजने का प्रयास शुरू कर दिया है। यूरोपीय संघ का एआई एक्ट और अमेरिका की एआई सुरक्षा नीतियाँ इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

भारत के पास एआई विकास के लिए कई महत्वपूर्ण संसाधन हैं, जिनमें डेटा विविधता, तकनीकी प्रतिभा और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना प्रमुख हैं। यदि भारत अनुसंधान, सेमीकंडक्टर निर्माण, स्टार्ट-अप नवाचार और कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करता है, तो वह भविष्य की वैश्विक एआई अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर सकता है।       

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