वास्तविक राजनीतिक इच्छाशक्ति और न्यायसंगत समझौते के अभाव में डब्ल्यूटीओ स्वयं उन असमानताओं का शिकार बनता जा रहा है, जिन्हें समाप्त करने के उद्देश्य से इसकी स्थापना की गई थी। - अनिल तिवारी
कैमरून की राजधानी याउंडे में आयोजित विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक जिनेवा में फिर मिलेंगे के वादे के साथ बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गयी। चार दिनों तक चली इस हाई-प्रोफाइल बैठक में दुनिया भर के व्यापार मंत्रियों ने कृषि, ई-कॉमर्स, बहुपक्षीय समझौते, विवाद निपटान प्रणाली, विशेष एवं विभेदक व्यवहार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आदि विषयों पर चर्चा कर आम राय बनाने की कोशिश की। वैश्विक स्तर पर व्यापार बढ़ाने के लिए बात तो बहुत हुई पर कोई बात बनी नहीं। भारत की ओर से उठाए गए कृषि सब्सिडी और आजीविका से जुड़े मत्स्य क्षेत्र के मामले को फिलहाल अगली बैठक तक के लिए मुल्तवी कर दिया गया लेकिन ई-कॉमर्स से जुड़े डिजिटल सामानों पर सीमा शुल्क न लगाने की समय सीमा को आगे बढ़ाने पर कोई आम सहमति नहीं बन सकी।
ज्ञात हो कि साल 1998 से ही दुनिया भर के देश इंटरनेट के जरिए होने वाले लेन-देन, व्यापार पर कोई आयात शुल्क नहीं लगाते थे। इसे ’ई-कॉमर्स मोरटोरियम’ कहा जाता है। इस बार अमेरिका और कई विकसित देश चाहते थे कि इस प्रतिबंध को अगले 5 साल के लिए और बढ़ा दिया जाए। भारत इसका विरोध करता रहा है। सम्मेलन के दौरान भारत के साथ-साथ ब्राजील और तुर्की जैसे विकासशील देशों के कड़े रुख के कारण इस पर फैसला नहीं हो सका।
भारत ने हमेशा इस प्रतिबंध का विरोध किया है। भारत का तर्क है कि डिजिटल सेवाओं और सामानों का व्यापार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन टैक्स न लगा पाने के कारण विकासशील देशों को भारी वित्तीय नुकसान हो रहा है। अनुमानों के मुताबिक, इस प्रतिबंध की वजह से भारत को हर साल लगभग 500 मिलियन डॉलर (करीब 4,000 करोड़ रुपये) के राजस्व का नुकसान होता है। विकासशील देशों का मानना है कि इस टैक्स से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल वे अपने डिजिटल बुनियादी ढांचे को सुधारने में कर सकते हैं।
अब जबकि यह रोक (मोरटोरियम) तकनीकी रूप से 31 मार्च 2026 को समाप्त हो गया है, इसलिए सदस्य देशों को अब यह अधिकार मिल गया है कि वे डिजिटल ट्रांसमिशन पर टैक्स लगा सकते हैं। हालांकि इसका सीधा असर नेटफ्लिक्स, स्पॉटिफाई जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स और ऑनलाइन गेमिंग या सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने वाले उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है, क्योंकि कंपनियां टैक्स का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं, लेकिन बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा स्थगन कानून का आड़ लेकर की जा रही बड़ी लूट पर अंकुश लगेगा।
यह संजोग ही है की 26 मार्च से शुरू हुई बैठक में ई-कॉमर्स पर 26 साल पुरानी सीमा शुल्क छूट खत्म हो गई है, जिससे भारत सहित विभिन्न देशों के लिए डिजिटल सेवाओं पर कस्टम ड्यूटी लगाने का रास्ता खुल गया है।
दरअसल, यह व्यवस्था 1998 से लागू है, जिसके तहत डिजिटल डाउनलोड और स्ट्रीमिंग जैसी इलेक्ट्रानिक सेवाओं पर सीमा शुल्क नहीं लगाया जाता। तब इसे दो साल के लिए लागू किया गया था और बाद में हर दो साल में इसे बढ़ाया जाता रहा। इस तरह के शुल्क में छूट का सबसे अधिक लाभ अमेरिका की बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों, जैसे गूगल और मेटा, को मिलता है। बैठक में इस मुद्दे पर अमेरिका और विकासशील देशों के बीच मतभेद सामने आए।
भारत सहित कुछ देश इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे या केवल दो साल का विस्तार चाहते थे, जबकि अमेरिका इसे पांच साल तक बढ़ाने की मांग कर रहा था।
सम्मेलन के दौरान भारत का पक्ष रखते हुए केंद्रीय वाणिज्य मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि सर्वसम्मति आधारित निर्णय लेना विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की वैधता का आधार है, और यह महत्वपूर्ण है कि डब्ल्यूटीओ प्रत्येक सदस्य देश के उस संप्रभु के अधिकारों को अनदेखा न करे कि वे उन नियमों का पालन न करें जिनसे वे सहमत नहीं हैं। सर्वसम्मति से निर्णय लेने में आने वाली चुनौतियों पर नियंत्रण पाने के लिए विश्वास के पुनर्निर्माण के महत्व को रेखांकित करते हुए, भारत ने इस बात पर बल दिया कि डब्ल्यूटीओ को वर्तमान गतिरोध और इसके मूल कारणों का सावधानीपूर्वक आकलन करना चाहिए, साथ ही यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चर्चाएँ पारदर्शी, समावेशी और सदस्य-संचालित हों। भारत ने यह भी बताया कि एक एकीकृत बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली अपने संस्थागत ढांचे के भीतर विखंडन के साथ फल-फूल नहीं सकती।
’समान अवसर के मुद्दों’ पर केंद्रीय मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि चर्चाओं में उरुग्वे राउंड से उत्पन्न असमानताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए। भारत ने खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक सुरक्षा मानक (पीएसएच) और कपास पर एसएसएम जैसे लंबे समय से लंबित मुद्दों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर दिया, साथ ही संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने के लिए नए मुद्दों पर भी विचार किया। विवाद निपटान प्रणाली की निरंतर कमियों को उजागर करते हुए, भारत ने इस बात पर जोर दिया कि प्रभावी न्यायनिर्णय के बिना, नियम अपनी प्रवर्तनीयता खो देते हैं, जिससे छोटे देशों को असमान रूप से नुकसान होता है। भारत ने व्यापार प्रतिशोध को उचित ठहराने या वैध घरेलू नीतियों को चुनौती देने के लिए पारदर्शिता का दुरुपयोग करने के खिलाफ भी चेतावनी दी। इसके बजाय, इसे सार्थक और सतत् क्षमता निर्माण सहायता के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि सभी सदस्य निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से दायित्वों को पूरा कर सकें। भारत ने सभी सदस्यों के लिए उत्पादक क्षमता निर्माण, रोजगार सृजन और वैश्विक व्यापार में सार्थक रूप से भाग लेने के लिए उचित अवसर के महत्व पर भी बल दिया।
कृषि भारत के डब्ल्यूटीओ एजेंडा का प्रमुख हिस्सा रहा जिसमें खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडार को डब्ल्यूटीओ के अनुरूप मानने की प्रमुख मांग शामिल है। मुख्य समस्या डब्ल्यूटीओ के दोषपूर्ण सब्सिडी फॉर्मूले में निहित है, जो 1986-88 की संदर्भ कीमतों का उपयोग करता है और भारत के समर्थन अनुमानों को सात से आठ गुना बढ़ा देता है, जिससे यह कृत्रिम रूप से सीमा उल्लंघन के करीब पहुंच जाता है। लेकिन अमेरिका और यूरोपीय संघ इस फॉर्मूले में संशोधन करने में रुचि नहीं रखते और व्यापार विकृति के जोखिमों का हवाला देते हुए व्यापक छूटों का विरोध करते हैं, जिसके चलते भारत के पास 2013 से केवल एक अस्थायी ‘शांति खंड’ ही बचा है। हालांकि इस मुद्दे पर आगे की चर्चा जिनेवा में होने वाली अगली बैठक के दौरान किए जाने की बात कही गई है।
मोटे तौर पर सम्मेलन के हासिल को देखें तो सर्वसम्मति की कमी के कारण दशकों पुराने ई-कॉमर्स पर रोक समाप्त होने से सैद्धांतिक रूप से डब्ल्यूटीओ सदस्य अब इलेक्ट्रॉनिक प्रसारणों पर कर लगाने से कानूनी रूप से प्रतिबंधित नहीं रहेंगे। इसी के साथ व्यापार-संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकार (ट्रिप्स) समझौते के तहत गैर-उल्लंघन संबंधी शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा उपाय भी समाप्त हो गए।
विकासशील देश ऐतिहासिक रूप से सार्वजनिक स्वास्थय में नीतियों के स्थान की रक्षा के लिये इस सुरक्षा उपाय पर निर्भर रहे हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि अनिवार्य लाइसेंसिंग जैसे डब्ल्यूटीओ- अनुपालक उपायों को आसानी से चुनौती नहीं दी जा सकती है।
भारत और अन्य विकासशील देशों का तर्क है कि व्यापार के भौतिक वस्तुओं से डिजिटल प्रारूपों में स्थानांतरित होने के कारण यह स्थगन उनके भविष्य के कर आधार को कमजोर करता है। वे इसके दायरे पर भी सवाल उठाते हैं। अधिकांश विकासशील देशों का मानना है कि डिजिटल रूप से प्रदान की जाने वाली सेवाएं इस स्थगन से बाहर हैं, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी इन्हें इसमें शामिल करना चाहते हैं।
मत्स्य सब्सिडी के मोर्चे पर मंत्रीगण दूरस्थ जल में मछली पकड़ने वाले बेड़े के लिये सब्सिडी कम करने पर बातचीत जारी रखने पर सहमत हुए, जिसका उद्देश्य 15वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में ठोस सिफारिशें करना है।
भारत ने डब्ल्यूटीओ ढाँचे में चीन के नेतृत्व वाले आईएफडी समझौते को शामिल करने का दृढ़ता से विरोध किया और कहा कि यह डब्ल्यूटीओ की कार्यात्मक सीमाओं और मूलभूत बहुपक्षीय सिद्धांतों को खतरे में डालता है।
बहुपक्षीय ई-कॉमर्स कर प्रतिबंध की समाप्ति के बावजूद भाग लेने वाले देशों के गठबंधन (66 सदस्य, वैश्विक व्यापार के लगभग 70 प्रतिशत को कवर करते हुए) ने बहुपक्षीय डब्ल्यूटीओ समझौते पर इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स में प्रगति की।
यह समझौता डेटा प्रवाह, ऑनलाइन लेनदेन और उपभोक्ता संरक्षण सहित डिजिटल व्यापार के लिये सामान्य वैश्विक नियम स्थापित करना चाहता है। भारत और अफ्रीकी देशों ने खाद्य सुरक्षा के लिये सार्वजनिक भंडारण पर एक स्थायी समाधान की दृढ़ता से मांग की है, जिससे डब्ल्यूटीओ नियमों के अंतर्गत दंडित किये बगैर घरेलू खाद्य सब्सिडी में लचीलेपन की अनुमति मिल सके।
विकासशील देश बाज़ार पहुँच संबंधी बाधाओं, जलवायु आघातों और विकसित देशों में उच्च असंतुलित करने वाली सब्सिडियों के कारण होने वाली असमानताओं का सामना करना जारी रखते हैं। विकसित देशों ने सार्वजनिक भंडारण पर लचीलेपन का विस्तार करने के लिये बहुत कम समर्थन दिखाया हैं।
विकासशील देशों ने 1995 में बौद्धिक संपदा और सेवाओं पर कड़े नियमों को स्वीकार किया था, जिसके बदले उन्हें संक्रमण काल की लंबी अवधि और नीतिगत स्वतंत्रता जैसी लचीली व्यवस्थाएं मिली थीं। अब यह समझौता तनाव में है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ का तर्क है कि बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अब ऐसे लाभ नहीं मिलने चाहिए और वे चाहते हैं कि एसडीटी मुख्य रूप से सबसे कम विकसित देशों तक ही सीमित रहे। भारत का कहना है कि विकास में अंतर अभी भी बहुत अधिक है और मूल समझौते पर पुनर्विचार किए बिना एसडीटी को हटाने से व्यवस्था और भी अधिक असमान हो जाएगी। यह विवाद निष्पक्षता और वैधता के मूल में है।
इसी तरह निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार भी विवादास्पद मुद्दा है। विकसित देश तर्क देते हैं कि सर्वसम्मति का सिद्धांत प्रगति को धीमा करता है और वे अधिक लचीले दृष्टिकोणों की वकालत करते हैं, जिसमें बहुपक्षीय संगठनों पर अधिक निर्भरता शामिल है। भारत और अन्य देश सर्वसम्मति को इस प्रणाली की नींव मानते हैं, जो यह सुनिश्चित करती है कि सभी सदस्य देशों, चाहे वे बड़े हों या छोटे, उनको समान अधिकार प्राप्त हों।
कुल मिलाकर सम्मेलन ने केवल एक संस्थागत संकट ही नहीं, बल्कि डब्ल्यूटीओ के भीतर दृष्टि के संकट को भी उजागर किया है। जहाँ विकसित देश त्वरित, डिजिटल-प्रथम व्यापार नियमों को आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं विकासशील देश अभी भी खाद्य सुरक्षा और अपनी गति से विकास करने के अधिकार के लिये संघर्ष कर रहे हैं। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि वास्तविक राजनीतिक इच्छाशक्ति और न्यायसंगत समझौते के अभाव में डब्ल्यूटीओ स्वयं उन असमानताओं का शिकार बनता जा रहा है, जिन्हें समाप्त करने के उद्देश्य से इसकी स्थापना की गई थी।

